शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
रहरनुमा घोड़े की
तस्वीर
पुर्गया घोड़े की तस्वीर
चांद सूरततील की दोभंवरी
वाले घोड़े की
तस्वीर
एक भौरी कनपटी के नीचे गिलान
दुगनी भौंरी
सांपन भौंरी
सीने की
भौंरी
आदम मार
अगू भौंरी
इन भोरियों को अशुभ कहते हैं
१३५
देव मुनि गौरोदार घोड़े का निशान जामाक पों गिर
कटोली भौंरी
नाक की भौंरे
देव मुनि
सिंहन खूंटी
उरवाड़
भौंरी का निशान
स्याह गालू घोड़े की तस्वीर
फूलदार घोड़े की तस्वीर उसका हाथ सफेद हो
उसको हाथवरद कहते हैं
कुशादार घोड़े की तस्वीर
चकार घोड़े की तस्वीर
कपाती दुम्म घोड़े की तस्वीर
(४१)
यह मूरत फिर की देखो
उस तसबीर से १० मुकाम उल्टे भौंरियों के
मालूम होते हैं
जौनी भौंरी लगे ऐब दार
सीने की दोनों उलटी भौंरी
कुख की भौंरी ऐबदार
दोनों उलटी भौंरी
तरकादन घोड़े की तसबीर
घोड़ा सवार के अख्ति-
यार में नहीं होता
आंस्तारफोड़ा
गठाभौरी
दाव भयैतो
नंगभोर नोमका
चित्र देख पाठ
पान खांद
एक कनपटी का नागत
जिसका खुर
सवार का तरास है
खूंटाउखाड़ भोरी
सुजवल भौरी
सांपन का चिन्ह
हारदास्त
खुरौ उप्पाड
नवभोर भौरी
यह घोड़ा ब्राह्मण वर्ण है
शुभ है
यह घोड़ा क्षत्री वर्ण है यह युद्ध में
शुभ है
अथ शालिहोत्र प्रारम्भः
मंगलाचरणम् ।
❁ दोहा ❁
परब्रह्मको ध्यान करि, सब देवन सिर नाय ॥
शालिहोत्र वर्णन करूं, भाषा ललित बनाय ॥
प्रिय सजनो! परमात्मा ने अपनी सृष्टि में एक अद्भुत पशु जिसे
घोडा कहते हैं और वह बग्घी इक्का टमटम आदि सवारियों में
जोते जाते हैं इस घोडेसे संसार के अनेकों कार्य सिद्ध होते हैं
जैसे घोडेपर व्यापारी लोग नाज लादते हैं, यह सवारीके लिये
बहुत ही लाभदायक है घोडा चलने में तेज होताहै कहीं २ के
घोडे ऐसे वीर होते हैं जो अपने स्वामी का विपत्ति समय में
बडा काम करते हैं जैसे दरिया के अत्यन्त वेग में पार जाना कठिन
हो जाता है परन्तु घोडा ऐसा बहादुर होता है, जो मालिक को
पीठपर चढाकर पारकर देता है यहां तक कि यह चोर बदमाशों
से समय पड जानेपर बचा सक्ता हैक्योंकि घोडेकी दौडमें पकड-
ना मुश्किल हो जाता है इसलिये राजा महाराजा अमीर साहू-
कार आदि घोडेकी बड़ी कदर करते हैं किसी समय घोडा बी-
मार होजाता है तो बिना दवा के रोग से प्रायः मर जाते हैं इस
लिये इस पुस्तक में उनके लक्षण शुभ अशुभका वर्णन करके उ-
नकी चिकित्सा भलीभांति लिखी गई है जिससे घोडे सहज में
२ शालिहोत्रम् ।
चारोग्य होसकते हैं इसलिये घोडों के पालनेवाले महाशयों के
लाभार्थ यह पुस्तक अनेक ग्रंथोंसे संग्रहकी गई है. यह पुस्तक
प्रत्येक मनुष्यको लेकर रखना चाहिये और एकबार पढजाने से
भलीभांति ज्ञान होसकता है कि अमुक घोड़ोंके अमुक रोग हो-
गया है और अमुक औषधि का सेवन करना चाहिये.
भारतवर्ष में बहुत प्राचीन काल में शालिहोत्र नामक कोई
महान् अश्ववैद्य हुए थे, उनने इस विद्या में बडी पारदर्शिता
प्राप्त कीथी और इस विषयमें जो ग्रन्थ उन्होंने संस्कृत भाषामें
लिखा था वह उन्हीं के नाम से विख्यात होगया. अर्थात् अश्व-
विद्या पर अन्य महात्माओं के बनाये हुए ग्रन्थभी शालिहोत्र
कहलाने लगे ।
संस्कृतभाषा में घोडे चार प्रकार के लिखे हैं. यथाः-उत्तम,
मध्यम, अधम और अधमाधम ।
जिन घोडों के सिखाने में परिश्रम अधिक नहीं होता है, स-
हज में सीख लेते हैं; और जिनका स्वभाव भी नम्र होता है.
अपने स्वामी के मनोनुकूल काम करते हैं न चलनेमें अडते हैं;
न पीछे को हटते हैं, ऐसे उत्तम उत्तम लक्षणों से युक्त उत्तम होते
हैं, तथा इन लक्षणों से हीन होने पर उत्तरोत्तर मध्यम हैं अधम
और अधमाधम जाने जाते हैं ।
घोडों के रङ्ग-संस्कृत में घोडोंके रङ्ग सात प्रकारके लिखे हैं
जैसे:-सफेद, लाल, पीला, सारङ्ग, (विचित्रवर्ण) कबुशी,नील
और कृष्ण । इनमें से सफेद रङ्ग का घोडा सबसे उत्तम होता
है सर्वाङ्गश्वेत घोडा राजाओं के लिये प्रशस्त होता है !
सफेद रंग बर्फ के ढेले के सदृश होता है, लालवर्ण कुंकुम के
शालिहोत्रम् । ३
समान होता है, पीला रंग हल्दी के समान और सारङ्ग चित्रवि-
चित्र रङ्ग होता है, जिसे कबरा कहते हैं । कपिलवर्ण पिशंग
कहाता है, दूब के समान रंगवाले को नीलक तथा जामुन के
फल के सदृश रंग काला होता है ।
जिस घोडे में पीली दमक मारती हो और पांव उसके सफेद
हो, तथा नेत्र काले हों उसे चक्रवाक कहते हैं यह घोडा राजा-
ओं के योग्य होता है ।
जिस घोडे के मुख पर चन्द्रमाकी किरण के समान आवर्त
अर्थात् भोंरी हो, जामुन के फल के समान आकृति हो, पांव
सफेद हों उसे मल्लिक कहते हैं ।
जिस घोडे का सब रंग सफेद हो, केवल एक कान काला हो
उसे श्याम कर्ण कहते हैं, प्राचीन समय में यही घोड़ा अश्वमेध
यज्ञ के काम में आता था ।
जिसका सम्पूर्ण वर्ण सफेद हो परन्तु पांव काले हों, यह यम-
दूत संज्ञक घोडा अशुभ होता है ।
जिसके पांव सफेद हों, पूंछ, छाती, मुख और सिर के बाल
काले हों वह अष्ट मंगल कहाता है ।
जिसके रोम देखने से वर्ण की प्रतीति न हो सकती हो वह
पुष्य संज्ञक कहाता है यह घोडा रखने योग्य नहीं होता है ।
जिस घोडे के पांव सफेद और मुख मध्यम होता है उसे पञ्च-
कल्याण बोलते हैं, यह घोड़ा शुभ होता है ।
शुभाशुभ लक्षण-जिन घोडों के मुख दीर्घ परन्तु सूक्ष्म मास
से युक्त होते हैं वे घोडे शुभ होते हैं । जिनके कंधे ऊँचे; मुख
४ शालिहोत्रम् ।
दीर्घ ग्रीवादीर्घ वाल कटिप्रदेश गोल और पुष्ट, सुघटित पुष्ट
और मांस से गर्दन पर सघन रहित, अगले पांव टेढे और चक्रा-
कार खुर, वक्षस्थल चौडी, कान छोटे, पार्श्व छोटी तालु लाल
दंत पंक्ति शिखराकार सुडौल दीप्तिमान, खाल कोमल, ऊपर
नीचे के ओष्ठ ताम्रवर्ण, जिह्वा लाल, नासिका का रंग लाल,
शरीर न अत्यन्त मोटा आंख चौड़ी, ललाई लिये हुए, अयाल
के बाल कोमल; इन लक्षणों से युक्त घोडे शुभ होते हैं ।
आवर्त अर्थात् भौरियों का वर्णन-इस देश में अच्छे बुरे घोडे
की पहिचान प्रायः भौरियों से हुआ करती है ये घोडेके अंग
प्रत्यंग में हुआ करती हैं जैसे अंगों में होता है उसी अंग के
अनुसार उनको शुभाशुभ फल कहते हैं, यदि शुभ अंगों में हो
तो शुभावर्त और अशुभ अंगों में हो तो अशुभावर्त होते हैं।
भौरियों के मुख्य स्थान बारह हैं, जैसे ललाट, मस्तक, ग्रीवा
हृदय, पाद, मणिबंध, नाभि; स्कन्ध, कण्ठ, मुख, कुक्षि, और
तीनों छिद्र । रोमों के गोल घुमाव को आवर्त कहते हैं।
शुभ आवर्तों के लक्षण-जिस घोडे के नासिका के अग्र भाग
में एक, ललाट के अग्रभाग में एक, कनपटी में एक, कान में
एक और मस्तक में एक गोलाकार भ्रमरी होती है वह घोड़ा
उत्तम होता है ।
जिसके हृदय, स्कंध, कंठ कटि, नाभि, कुक्षि और पार्श्व भाग
में भ्रमरी होती है वे मध्यम होते हैं।
जिसके ललाट में दो आवर्त और तीसरा समुद्रम हो वह
घोड़ा सबसे उत्तम और पूर्ण आयुवाला होता है ।
शालिहोत्रम् । ५
जिसके मस्तक पर एकके ऊपर एक लगा तार तीन आवर्त
हों तो उसे निश्रेय वा निश्रेणी कहते है, यह घोडा बल और
वृद्धि करने वाला होता है ।
जिसके कंठमें उत्तरोत्तर तीन आवर्त होते हैं वह भी उत्तम
होता है जिस घोडेकी पीठके बांसे पर एक आवर्त होता है,
वह अशुभ और भ्रमोत्पादक होता है ।
जिसके लिलाट में चन्द्र सूर्य नामक दो आवर्त हों और पास
पास हो तौ राज्य की वृद्धि कराने वाला होता है ।
जिसके बांये कपोलपर एक आवर्त होता है वह घोडा यम
कहता है यह अपने मालिक का नाश चाहता है ।
जिसके दक्षिण कपोल पर एक आवर्त होता है. उसे शिव कहते
हैं यह सुखकारक और अपने मालिक को शुभ होता है ।
जिस घोडे के कान के मूलमें और कानके मध्यमें एक एक
आवर्त होता हे उसे विजय कहते हैं. यह संग्राम में विजय
सूचक होता है ।
जिसके स्कंध प्रदेश में एक कमलाकार आवर्त होता है वह
पद्म संज्ञक स्वामी को शुभकारक होता है ।
जिसकी नासिका के मध्य भागमें एक अथवा तीन आवर्त
हों उस घोडे को चक्रवर्ती कहते है यह घोडा राजाओं के योग्य
होता है ।
जिसके कंठ भाग में एक बडा भारी आवर्त दिखाई देता हो
वह चिन्तामणि नाम घोडा बडा शुभ होता है ।
जिसके तालुपर दो आवर्त होते हैं उसका नाम शुक्ल है
यह घोडा शुभ होता है ।
६ शालिहोत्रम् ।
जिस घोडे की कुक्षिपर एक आवर्त्त होता है वह शीघ्र ही
मर जाता है और यदि एकही स्थान पर ऐसे दो घोडे होंतो
मालिक को भी भारी होते हैं ।
जिस घोडे के जानुपर एक आवर्त्त होता है उसका मालिक
क्लेशयुक्त होकर सदा प्रदेश में वास करता है
जिसके मेढ्रके नीचे आवर्त होता है वह अशुभ है ।
जिसकी त्रिवली में आवर्त होता है वह उत्तम होता है और
उसे श्रीपार्श्व कहते हैं ।
अशुभ घोडों के लक्षण–जिस घोडेकी जिव्हा काली होता है,
वह कृष्णजिव्हा कहलाता है, जिसके तालुमें काला रंग होता है
वह कृष्णतालु, जिसके दांत छोटे बडे, ऊँचे नीचे होते हैं वह
कराली, जिसका संपूर्ण देह एक पांव दूसरे रंगका वह मुशली
कहाता है, जिसके छेदन दंत चार या पांच हों वह हीन दन्त,
और जिसके सात वा आठ दंत हों वह अधिक दन्त कहाता है
जिसके कानके पास आवर्त होता है वह शृंगी है, ये छः प्रकार
के घोडे अपने स्वामी का अनिष्ट चाहते हैं ॥
जिसका एक अंडकोष बढ गया हो वह एकाण्ड कहाता है,
जिसके दोनों अंड बडे हैं। वह जातकांड, जिसका कोई अंग
हीन हो वह हीनाङ्ग जिसका कोई अंग अत्यंत बढ गया हो
वह अधिकांग कहाता है ये चारों प्रकारके घोडे अशुभ समझे
जावे हैं ॥
जिसका सब देह एक रंग का और सिर काले रंग का होता है
प्रथम अध्याय: अश्व-लक्षण, आवर्त (भँवरी) एवं वर्ण-परीक्षा
शालिहोत्रम् । ७
वह तीसरी कहाता हे जिसके अंडकोषके दोनों आगे दो थन होते हैं
वह स्तनी वा स्थलो कहलाता है जिसका एक पांव श्वेतवर्ण और
शेष तीनों पांव किसी और रंगके होते हैं वह आर्जिल कहलाता हैं।
जिसके पांव और गामचीमें भिन्न भिन्न रंगकी रेखा होती है
उसे राजारपाद कहते हैं जिसकी एक आंखकी पुतली काली
और दूसरी आंखकी पुतली पिंगल अर्थात् नीलवर्ण होती हैं उसे
ताक्षी कहते हैं। ये सब घोडे भी अशुभ समझे जाते हैं।
इनके सिवाय घंटी, वदनी और कांचाक्षी आदि घोडे भी
अशुभ होते हैं।
जो घोडा चलने में दुम घुमाता है, वा मारने से पीछे को
हटता है वा दो पैर उठाकर कूदने वा पिछली दुलत्तिया झाड-
ताहै उत्तम नहीं समझा जाता है।
जिस घोडेके खुर सफेद होते हैं वह अच्छा नहीं होता क्योंकि
सफेद खुर नरम होता है।
शुभ घोडोंके लक्षण-जो घोडा अगले पांवसे पृथ्वीको खोदता
है, चलने में अपने स्वामी के मनोनुकूल चलता है, न कभी
अड़ता है, न पीछे को हटता है, वही घोड़ा उत्तम समझा
जाता है।
अश्वशाला-अश्वशाला को घुडसाल भी कहते हैं, घुडशाल
चौडे मैदानों में बनवाना चाहिये जहां किसी प्रकार की शरदी
न रहती हो और भूमिभी बहुत रेतीली वा कंकरीली नहो, हवा
और धूप बे रोक टोक आतीहो। घोडे रखनेके मकान ऐसे होने
चाहिये जो वडे वडे एकही पंक्तिमें हो और उनमें चारों ओर
८ शालिहोत्र ।
बहुतसी खिडकियां भी हों जिनमें होकर हवा वार पार निकल
जातो हो । हरएक घोडेके लिये उसमें कोठरियां भी जुदी २ होवें
जिनमें घोडों के दोनों ओर दीवारें कुछ ऊँची होनी चाहिये और
ऊपरसे खुलारहे तो कोई हरकत नही । हरएक कमरेमें कोयलों
की एक टोकरी लटका देनी चाहिये और ये कोयले हर पन्द्रवें
दिन बदल देने चाहिये । पेशाब निकल जानेके लिये मोरियोंका
प्रबन्ध अच्छा रहना चाहिये जिससे मकानमें दुर्गन्ध न बढै लीद
को उसी दम हटवाते रहें । मकानकी गच घोडेकी छातीकी ओर
कुछ ऊँचो और पीछे को ढालू होना चाहिये. यदि मकान मैला
न होगा तो मच्छर मक्खियां उसे अधिक दुःख न देंगी इस मकान
की दीवारें छठे महिने चुने से पुतवा देना उचित है ।
जिन घोडोंको किसी प्रकारका रोग होजाय उसको स्वस्थ घोड़ों
से थलग करदिया जावे। जिससे वह शेष जानवरोंमें न फैलने पावै
सांयकाल के समय घोडे के नीचे सूखी घास का विस्तर बना देवें
पृथ्वीपर घासकी तह आठ दस अंगुलकी होवे जिससे कड़ी पृ-
थ्वी उसमें गढने न पावे और घासमें भी कोई कठोर वस्तु नहो
जिससे घोडे को कष्ट हो, यह घास दिन निकलते ही उठा देनी
चाहिये और रातमें जितनी घास लीद और पेशावसे खराब हो
गई हो उसको सर्वथा दूरकर देवे पीछे उसमें उतनीही नई घास
मिलाकर विस्तर बनादेवे । जाडेकी ऋतुमें ठंडसे बचानेके लिये
खिडकियों पर परदे लटका देने चाहिये जिससे ठण्डी हवा
भातर न घुसने पावे और घोडेकी पीठपर कंबल वा और कोई
गरम कपड़ा डाल देवे जिससे ठण्ड न लगे । वर्षाऋतुमें रक्षाकी
शालिहोत्रम् । ६
अधिक आवश्यकता है मलमूत्र और सडी घासको बहुत दूर
फेंकवाना चाहिये क्योंकि सडाहटके कारण मच्छर मक्खी इकट्ठे
होकर पशुको बडा कष्ट पहुंचाते हैं उनको दूर रखने के लिये
कोई पतला कपडा घोडे पर डाल देना चाहिये ।
खाने पीनेका वर्णन-सबसे उत्तम खानेकी वस्तु घोडे के लिये
सूखी दूब है. इससे किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुंचती और
यह हर समय देनेके योग्य है, घोडा इससे बहुत प्रसन्न रहता है
दूबको लाकर धोडालनी चाहिये और फिर सुखाकर घोडे को
खिलावे । घोडेके पेटमें इतनी अधिक जगह नहीं होती है कि
वह एक दमसे इतनी घास खाले जो बहुत देरतक काम देसके
इस लिये थोडी थोडी देरके पीछे थोडी थोडी घास देनी चाहिये,
इससे अधिक लाभ होगा, अजीर्ण आदि उदर रोग न होने पा-
वेंगे । कभी २ थोडी गाजर खिला देनेसे घोडे को अत्यन्त लाभ
होगा । परन्तु बहुत गाजर खिलाना हानि कारक है इससे पेट
फूलने का डर रहता है ।
घोडेकी शारीरिक शक्ति बढाने के लिये दिनमें दो बार दाना
देना चाहिये. दानेके लिये चना सबके उत्तम वस्तु है, बेदला वा
दला हुआ चना कुछ देर भिगोकर तोबडे में भरकर घोडेके मुखसे
बांध दिया जाता है इस दाने के साथ कभी थोडासा नमक भी
मिलाकर दिया जाता है। प्राचीन कालमें घोडोंके बांधने के स्थान
में सैन्धव नमकके बडे बडे ढेले रक्खे जाते थे. जिन्हें घोडा जब
चाहता था चाट लिया करता था ।
पीनेके लिये निर्मल पानी देना चाहिये. वर्षाऋतुमें नदीका पा
१० शालिहोत्रम् ।
नी पिलाना ठीक नहीं है, ऐसे तालाब और पोखरों का पानी
भी न पिलाना चाहिये, जिनमें धोबी कपडे धोते हों वा गन्दा
पानी उनमें जाता हो, घोडके बीमार होजाने का डर रहता है ।
कुएका पानी बर्तनमें भरकर दिनमें दो तीनवार पिलाता रहे ।
पानी पिलाकर थोडी देरतक इधर उधर टहलाना बहुत आव-
श्यकीय बात है ।
दिनमें दोनों समय थोडी २ देर तक खुले मैदान में टहलाना
चाहिये, बिलकुल छाया और ठंडकमें बँधे रहने से भी घोडे को
हानि पहुंचती है इसमें सर्दी होनेका डर रहता है इस लिये
थोड़ी देर धूपमें रखना भी गुणदायक होता है ।
स्नानादि विधि-जब घोड़ा परिश्रम करके आता है तब उसके
देहमें पसीने आजाते हैं और धूल उड़कर उसकी देहमें जम जाती
है, जिससे मैला होजाता है इस लिये उस धूलको साफ करना
बहुत आवश्यककीय है इस लिये दोनों समय खुरहरे से साफ
करना चाहिये । खुरहरा करनेसे पहिले लगाम चढाकर गलेको कुछ
खींच देना चाहिये । जो घोडा बदमाश हो और सहजमें खुरहरा न
कराता हो तो लगामको तानकर दुमसे बांध देना चाहिये जिससे
वह मुंहको इधर उधर न फेरसके । प्रथमही घोडेके गले को खुर-
हरेसे साफ करें फिर और और अंगोंको साफ करें और थोडी
थोडी देरमें खुरहरेकी धूल भी बुर्शसे साफ करता रहे क्योंकि
खुरहरेको न झाडने से और २ अङ्गोंमें धूलभर जायगी और
खुरहरेसे साफ करदी जाय तब उसपर बुर्श फेर देना चाहिये ।
इसके पीछे एक साफ कपडे से शरीरको पोंछ देना चाहिये इसी
शालिहोत्रम् । ११
तरह अयाल और दुमके वालों को भी कंघी से साफ कर
देना उचित है !
प्रत्येक साल में दोवार कार्तिक और फाल्गुन के महीनों में
घोडे के पुराने रोम गिर जाते हैं और उनके बदले में नये
आते हैं इस लिये उस समय खुग्हरा न करना चाहिये ।
गर्मी की ऋतुमें बहती हुई स्वच्छ नदी में वा निर्मल तालाब
में घोडे को स्नान कराकर सूखे कपडे से पोंछ देना चाहिये,
परन्तु इस काम को प्रति दिन नहीं करना चाहिये ।
परिश्रम का वर्णन-जिस घोडे पर प्रतिदिन सवारी का काम
न पडता हो तो एक ही स्थान में लगातार कई दिन तक बँधे
रहने से वह बीमार होजाता है, परिश्रम करने की आदत कम
होती है और फिर किसी दिन यकायक अधिक परिश्रम करने
का काम पड़जाय तो भारी हानि की सम्भावना होती है; पैर
फूल जाते हैं वा लँगडाने लगते हैं, फेंफडे में रोग होजाता है
और कभी २ ज्वर भी हो जाता है. इसलिये प्रतिदिन घण्टे दो
घण्टे खुले मैदान में ले जाकर परिश्रम का काम लेना बहुत ही
आवश्यकीय है । प्रतिदिन परिश्रम करते रहने से देह चुस्त
और फुर्तीली बनी रहती है, प्रतिदिन शक्ति बढती चली
जाती है; मिहनत करने से कभी जी नहीं चुराता है, और न
व्याकुल होता है । घुडदौड और शिकार के घोडों से तो ऐसा
परिश्रम कराना बहुत ही आवश्यकीय है । जिसको परिश्रम-
करने की प्रकृति पड़ जाती है वह कभी कोई भारी काम
आ पड़ने पर भी सहज में कर लेते हैं। जो प्रतिदिन
ऐसा ही परिश्रम काम में लाया जाय तो बुढापे में भी
९२ शालिहोत्रम् ।
घोडा वैसाही परिश्रम करते रहते हैं, मिहनतसे परिश्रान्त नहीं
होते हैं ।
परिश्रम आदि की रीति-घोडे पर सवारी करते ही उसे
बहुत वेग से नहीं चलाना चाहिये, प्रथम ही धीरे धीरे चलावे
फिर वेग से परन्तु रोकने के समय एक साथ रोक भी न लेना
चाहिये, जैसे धीरे धीरे उसका वेग बढाया था वैसे ही धीरे
धीरे उसका वेग कम करके रोकना चाहिये ।
परिश्रम के पीछे उसी समय उसे घुडसाल में ले जाकर न
बांध देना चाहिये, किन्तु स्वच्छ पानी से उसके मुख के फेन
और अंड तथा उसके छोर पास के फेन धोकर इधर उधर
टहलावे, जब पसीना सूख जाय तब घुडसाल में लेजाकर बांध
दे और सूखी घास से उसका शरीर रगड कर कपडे से पोंछ
डाले ऐसा करने से उसकी सब थकावट दूर होजाती है तब
उसकी पिछाडी बांध कर उसके सामने सूखी घास डाल देवे ।
गर्भादि धारण विधि-घोडी सांड़ के अनुसार बच्चा देती है ।
कभी २ गर्भधारण के समय उत्तम जाति का घोडा उसके सम्मुख
लाकर खडाकर देते हैं, इससे भी उत्तम बच्चा होने की संभावना
होती है ।
घोडी के ग्यारह महीने में बच्चा हुआ करता है और पैदा
होते ही खुर से जानु तक जितनी ऊंचाई होती है,
उससे तिगुनी ऊंचाई उस बच्चे की युवावस्था में होती है ।
जब बच्चा पैदा होता है तब उसके मुख के सामने कोई
दांत नहीं होता है । परन्तु जावडे के दोनों किनारों पर दो २
पेषण दंत निकला करते हैं जिन में से एक को प्रथम पेषण
शालिहोत्रम् । १३
दन्त और दूसरे को द्वितीय पेषण दंत कहते हैं । जब बच्चा
सात दिन का हो जाता है तब उसके प्रत्येक जावडे में दो
छेदन दंत निकल आते हैं । जो दांत पैदा होने ही साथ
निकलते हैं उन्हें क्षीर दंत कहते हैं । पांच सप्ताह के पीछे
सामने की ओर दो छेदन दंत तथा एक पेषण दंत और निकल
आता है तथा आठवें महीने में साम्हने की ओर दो छेदन दंत
और निकल आते हैं, इन सब दांतों का रङ्ग अत्यन्त सफेद होता
है और इनके ऊपर एक काले रङ्ग का छोटा गढ़ाभी होता है ।
जब बच्चा बारह महीने का हो जाता है तौ चौथा पेषण दंत
और दो वर्ष में पांचवां और कुछ दिन पीछे छटा दांत निकल
आता है ।
त्रिंशन्मासोद्भवास्सर्वे अखण्डाः परिकीर्तिताः ।
द्वौ स्यातां वाः त्रय स्स्यातामूर्ध्वाधस्तु यथाक्रमम् ॥
ढाई वर्षकी अवस्थासे ऊपर दो तीन महीने निकल जाने पर
बीचके दो छेदन दंत गिरकर उनकी जगह ऊपर नीचेके जावडों
में क्रम से दो और तीन स्थायी दंत निकल आते हैं जिन्हें
अखण्ड बोलते हैं, यह दांत भी सफेद गड्ढेदार होते हैं ।
चतुर्भिर्वत्सरैर्दन्ताश्चत्वारः पतितोत्थिताः ।
पञ्चभिर्हुदन्तेषु जायन्ते त्वथकालिका ॥
जब घोडा साडे तीन वर्ष से ऊपर और चार वर्ष के भीतर
होता है तब उसके दो छेदन दंत और गिर कर दो बडे
दांत ऊपर की ओर और निकल आते हैं और पांचवें
वर्ष के अन्त तक शेष दो दांत निकल आते हैं इसी अवसर
में नेश भी निकल आती हैं । जो नेश निकलती है तौ हरएक