शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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दीर्घ ग्रीवादीर्घ वाल कटिप्रदेश गोल और पुष्ट, सुघटित पुष्ट
और मांस से गर्दन पर सघन रहित, अगले पांव टेढे और चक्रा-
कार खुर, वक्षस्थल चौडी, कान छोटे, पार्श्व छोटी तालु लाल
दंत पंक्ति शिखराकार सुडौल दीप्तिमान, खाल कोमल, ऊपर
नीचे के ओष्ठ ताम्रवर्ण, जिह्वा लाल, नासिका का रंग लाल,
शरीर न अत्यन्त मोटा आंख चौड़ी, ललाई लिये हुए, अयाल
के बाल कोमल; इन लक्षणों से युक्त घोडे शुभ होते हैं ।
आवर्त अर्थात् भौरियों का वर्णन-इस देश में अच्छे बुरे घोडे
की पहिचान प्रायः भौरियों से हुआ करती है ये घोडेके अंग
प्रत्यंग में हुआ करती हैं जैसे अंगों में होता है उसी अंग के
अनुसार उनको शुभाशुभ फल कहते हैं, यदि शुभ अंगों में हो
तो शुभावर्त और अशुभ अंगों में हो तो अशुभावर्त होते हैं।
भौरियों के मुख्य स्थान बारह हैं, जैसे ललाट, मस्तक, ग्रीवा
हृदय, पाद, मणिबंध, नाभि; स्कन्ध, कण्ठ, मुख, कुक्षि, और
तीनों छिद्र । रोमों के गोल घुमाव को आवर्त कहते हैं।
शुभ आवर्तों के लक्षण-जिस घोडे के नासिका के अग्र भाग
में एक, ललाट के अग्रभाग में एक, कनपटी में एक, कान में
एक और मस्तक में एक गोलाकार भ्रमरी होती है वह घोड़ा
उत्तम होता है ।
जिसके हृदय, स्कंध, कंठ कटि, नाभि, कुक्षि और पार्श्व भाग
में भ्रमरी होती है वे मध्यम होते हैं।
जिसके ललाट में दो आवर्त और तीसरा समुद्रम हो वह
घोड़ा सबसे उत्तम और पूर्ण आयुवाला होता है ।