शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ें२ शालिहोत्रम् ।
चारोग्य होसकते हैं इसलिये घोडों के पालनेवाले महाशयों के
लाभार्थ यह पुस्तक अनेक ग्रंथोंसे संग्रहकी गई है. यह पुस्तक
प्रत्येक मनुष्यको लेकर रखना चाहिये और एकबार पढजाने से
भलीभांति ज्ञान होसकता है कि अमुक घोड़ोंके अमुक रोग हो-
गया है और अमुक औषधि का सेवन करना चाहिये.
भारतवर्ष में बहुत प्राचीन काल में शालिहोत्र नामक कोई
महान् अश्ववैद्य हुए थे, उनने इस विद्या में बडी पारदर्शिता
प्राप्त कीथी और इस विषयमें जो ग्रन्थ उन्होंने संस्कृत भाषामें
लिखा था वह उन्हीं के नाम से विख्यात होगया. अर्थात् अश्व-
विद्या पर अन्य महात्माओं के बनाये हुए ग्रन्थभी शालिहोत्र
कहलाने लगे ।
संस्कृतभाषा में घोडे चार प्रकार के लिखे हैं. यथाः-उत्तम,
मध्यम, अधम और अधमाधम ।
जिन घोडों के सिखाने में परिश्रम अधिक नहीं होता है, स-
हज में सीख लेते हैं; और जिनका स्वभाव भी नम्र होता है.
अपने स्वामी के मनोनुकूल काम करते हैं न चलनेमें अडते हैं;
न पीछे को हटते हैं, ऐसे उत्तम उत्तम लक्षणों से युक्त उत्तम होते
हैं, तथा इन लक्षणों से हीन होने पर उत्तरोत्तर मध्यम हैं अधम
और अधमाधम जाने जाते हैं ।
घोडों के रङ्ग-संस्कृत में घोडोंके रङ्ग सात प्रकारके लिखे हैं
जैसे:-सफेद, लाल, पीला, सारङ्ग, (विचित्रवर्ण) कबुशी,नील
और कृष्ण । इनमें से सफेद रङ्ग का घोडा सबसे उत्तम होता
है सर्वाङ्गश्वेत घोडा राजाओं के लिये प्रशस्त होता है !
सफेद रंग बर्फ के ढेले के सदृश होता है, लालवर्ण कुंकुम के