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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
  • ९।४५ § ९०८ ] नवमोऽध्यायः ३५१

योगेन सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति । ततस्तदनन्तरं समुच्छिन्नक्रियानिवर्तिध्यानमारभते ।
समुच्छिन्नप्राणापानप्रचारसर्वकायवाङ्मनोयोगसर्वप्रदेशपरिस्पन्दक्रियाव्यापारत्वात् समुच्छिन्न-
क्रियानिवर्तीत्युच्यते । तस्मिन्समुच्छिन्नक्रियानिवर्तिनि ध्याने सर्वबन्धास्रवनिरोधसर्वशेषकर्मशातन-
सामर्थ्योपपत्तेरयोगिकेवलिनः संपूर्णयथाख्यातचारित्रज्ञानदर्शनं सर्वसंसारदुःखजालपरिष्वङ्गोच्छेद-
जननं साक्षान्मोक्षकारणमुपजायते । स पुनरयोगकेवली भगवांस्तदा ध्यानातिशयाग्निनिर्दग्धसर्व- ५
मलकळङ्कबन्धनो निरस्तकिट्टधातुपाषाणजात्यकनकवल्लब्धात्मा परिनिर्वाति । तदेतद् द्विविधं
तपोऽभिनवकमास्रवनिरोधहेतुत्वात्संवरकारणं प्राक्तनकर्मरजोविधूनननिमित्तत्वान्निर्जराहेतुरपि
भवति ।
§ ९०७. अत्राह सम्यग्दृष्टयः किं सर्वे समनिर्जरा आहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्य-
त्रोच्यते— १०
सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्त-
मोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥४५॥
§ ९०८. त एते दश सम्यग्दृष्ट्यादयः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः । तद्यथा—भव्यः पञ्चेन्द्रिय-
संज्ञी पर्याप्तकः पूर्वोक्तकाललब्ध्यादिसहायः परिणामविशुद्ध्या वर्धमानः क्रमेणापूर्वकरणादिसोपान-
पङ्क्त्योत्प्लवमानो बहुतरकर्मनिर्जरो भवति । स एव पुनः प्रथमसम्यक्त्वप्राप्तिनिमित्तसन्निधाने १५
सति सम्यग्दृष्टिर्भवन्नसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहकर्मविकल्पाप्रत्याख्याना-

करके तथा शेष चार कर्मोंकी स्थितिको समान करके अपने पूर्व शरीरप्रमाण होकर सूक्ष्म काय-
योगके द्वारा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानको स्वीकार करते हैं। इसके बाद चौथे समुच्छिन्न क्रिया-
निवर्ति ध्यानको आरम्भ करते हैं। इसमें प्राणापानके प्रचाररूप क्रियाका तथा सब प्रकारके
काययोग, वचनयोग और मनोयोगके द्वारा होनेवाली आत्मप्रदेश परिस्पन्द रूप क्रियाका उच्छेद २०
हो जानेसे इसे समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान कहते हैं। इस समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यानमें सब
प्रकारके कर्मबन्धके आस्रवका निरोध हो जानेसे तथा बाकीके बचे सब कर्मों के नाश करनेकी
शक्तिके उत्पन्न हो जानेसे अयोगिकेवलीके संसारके सब प्रकारके दुःखजालके सम्बन्धका उच्छेद
करनेवाला सम्पूर्ण यथाख्यातचारित्र, ज्ञान और दर्शनरूप साक्षात् मोक्षका कारण उत्पन्न होता है।
वे अयोगिकेवली भगवान् उस समय ध्यानातिशयरूप अग्निके द्वारा सब प्रकारके मल-कलंकबन्धन- २५
को जलाकर और किट्ट धातु व पाषाणका नाशकर शुद्ध हुए सोनेके समान अपने आत्माको प्राप्तकर
परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह दोनों प्रकारका तप नूतन कर्मोंके आस्रवके निरोधका
हेतु होनेसे संवरका कारण है और प्राक्तन कर्मरूपी रजके नाश करनेका हेतु होनेसे निर्जराका भी
हेतु है।
§ ९०७. यहाँ कहते हैं कि सब सम्यग्दृष्टि क्या समान निर्जरावाले होते हैं या कुछ विशेषता ३०
है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धिवियोजक, दर्शनमोहक्षपक, उपशमक, उपशान्त-
मोह, क्षपक, क्षीणमोह और जिन ये क्रमसे असंख्यगुण निर्जरावाले होते हैं ॥४५॥
§ ९०८. सम्यग्दृष्टि आदि ये दश क्रमसे असंख्येयगुण निर्जरावाले होते हैं। यथा—जिसे
पूर्वोक्त काललब्धि आदिकी सहायता मिली है और जो परिणामोंकी विशुद्धि द्वारा वृद्धिको प्राप्त हो ३५
रहा है ऐसा भव्य पञ्चेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक जीव क्रमसे अपूर्वकरण आदि सोपान पंक्तिपर चढ़ता
हुआ बहुतर कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला होता है। सर्वप्रथम वह ही प्रथम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके
निमित्त मिलनेपर सम्यग्दृष्टि होता हुआ असंख्येयगुण कर्मनिर्जरावाला होता है। पुनः वह ही

३५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४५ § ९०८ –
वरणक्षयोपशमनिमित्तपरिणामप्राप्तिकाले विशुद्धिप्रकर्षयोगात् श्रावको भवन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो
भवति । स एव पुनः प्रत्याख्यानावरणक्षयोपशमकारणपरिणामविशुद्धियोगाद् विरतव्यपदेशभाक्
सन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनरनन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभानां वियोजनपरो
भवति यदा तदा परिणामविशुद्धिप्रकर्षयोगात्ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनर्दर्शन-
५ मोहप्रकृतित्रयतृणनिचयं निर्दधक्षन् परिणामविशुद्ध्यतिशययोगाद्दर्शनमोहक्षपकव्यपदेशभाक्१
पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । एवं सः क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा श्रेण्यारोहणाभिमुखश्चारित्र-
मोहोपशमं प्रति व्याप्रीयमाणो विशुद्धिप्रकर्षयोगादुपशमकव्यपदेशमनुभवन् पूर्वोक्तादसंख्येयगुण-
निर्जरो भवति । स एव पुनरशेषचारित्रमोहोपशमनिमित्तसंनिधाने परिप्राप्तोपशान्तकषाय-
व्यपदेशः पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहक्षपणं प्रत्यभिमुखः परिणाम-
१० विशुद्ध्या वर्द्धमानः क्षपकव्यपदेशमनुभवन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स यदा निःशेष-
चारित्रमोहक्षपणकारणपरिणामाभिमुखः क्षीणकषायव्यपदेशमास्कन्दन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो
भवति । स एव द्वितीयशुक्लध्यानानलनिव्दग्धघातिकर्मनिचयः सन् जिनव्यपदेशभाक् पूर्वोक्ताद-
संख्येयगुणनिर्जरो भवति ।
चारित्र मोहनीय कर्मके एक भेद अप्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामोंकी प्राप्तिके
१५ समय विशुद्धिका प्रकर्ष होनेसे श्रावक होता हुआ उससे संख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः
वह ही प्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामोंकी विशुद्धिवश विरत संज्ञाको प्राप्त
होता हुआ उससे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही जब अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान,
माया और लोभकी विसंयोजना करता है तब परिणामोंकी विशुद्धिके प्रकर्षवश उससे असंख्येयगुण
निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही दर्शनमोहनीयत्रिकरूपी तृणसमूहको भस्मसात् करता हुआ
२० परिणामोंकी विशुद्धिके अतिशयवश दर्शनमोह क्षपक संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहलेसे असंख्येयगुण
निर्जरावाला होता है। इस प्रकार वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर श्रेणिपर आरोहण करनेके सम्मुख
होता हुआ तथा चारित्र मोहनीयके उपशम करनेके लिए प्रयत्न करता हुआ विशुद्धिके प्रकर्षवश
उपशमक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता
है। पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयके उपशमके निमित्त मिलनेपर उपशान्तकषाय संज्ञाको
२५ प्राप्त होता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही
चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके लिए सम्मुख होता हुआ तथा परिणामोंकी विशुद्धिसे वृद्धिको प्राप्त
होकर क्षपक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला
होता है। पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके कारणोंसे प्राप्त हुए परिणामोंके
अभिमुख होकर क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त करता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येय गुण
३० निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही द्वितीय शुक्लध्यान रूपी अग्निके द्वारा घातिकर्म समूहका
नाश करके जिन संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला
होता है।
विशेषाथ—यहाँ मुख्य रूपसे गुणश्रेणि निर्जराके दस स्थानोंका निर्देश किया गया है।
असंख्यात गुणितक्रम श्रेणिरूपसे कर्मोंकी निर्जरा होना गुणश्रेणिनिर्जरा है। यह गुणश्रेणि निर्जरा
३५ सर्वदा नहीं होती किन्तु उपशमना और क्षपणाके कारणभूत परिणामोंके द्वारा ही गुणश्रेणि रचना
होकर यह निर्जरा होतो है। गुणश्रेणि रचना दो प्रकारको होती है—एक तो गलितावशेष गुणश्रेणि
रचना और दूसरी अवस्थित गुणश्रेणि रचना । यह कहाँ किस प्रकारकी होती है इसे लब्धिसार
क्षपणासारसे जान लेना चाहिए । यहाँ इतना ही विशेष वक्तव्य है कि यहाँ जो दस स्थान बतलाये
१.-भाक् तेष्वेव पूर्वो-मु० ।
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  • ९।४६ § ९१० ] नवमोऽध्यायः ३५३
    § ९०९. आह सम्यग्दर्शनसंनिधानेऽपि यद्यसंख्येयगुणनिर्जरत्वात्परस्परतो न साम्यमेषां किं
    तर्हि श्रावकवदमी विरतादयो गुणभेदान्न निर्ग्रन्थतामर्हन्तीति । उच्यते, नैतदेवम् । कुतः । यस्माद्
    गुणभेदादन्योऽन्यविशेषेऽपि नैगमादिनयव्यापारात्सर्वेऽपि हि भवन्ति—
    पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥४६॥
    § ९१०. उत्तरगुणभावैनापेतमनसो व्रतेष्वपि क्वचित्कदाचित्परिपूर्णतामपरिप्राप्नुवन्तोऽ- ५
    विशुद्धपुलाकसादृश्यात्पुलाका इत्युच्यन्ते । नैर्ग्रन्ध्यं प्रति स्थिता अखण्डितव्रताः शरीरोपकरणविभू-
    षानुवर्तिनोऽविविक्तपरिवारा³ मोहशबलयुक्ता बकुशाः । शबलपर्यायवाची बकुशशब्दः । कुशीला
    द्विविधाः—प्रतिसेवनाकुशीलाः कषायकुशीला इति । अविविक्तपरिग्रहाः परिपूर्णोभयाः कथंचिदुत्तर-
    गुणैर्विराधिनः प्रतिसेवनाकुशीलाः । वशीकृतान्यकषायोदयाः संज्वलनमात्रतन्त्राः कषायकुशीलाः ।
    उदकदण्डराजिवदनभिव्यक्तोदयकर्मणः ऊर्ध्वं मुहूर्तादुद्भिद्यमानकेवलज्ञानदर्शनभाजो निर्ग्रन्थाः । १०
    प्रक्षीणघातिकर्माणः केवलिनो द्विविधाः स्नातकाः । त एते पञ्चापि निर्ग्रन्थाः । चारित्रपरिणामस्य
    प्रकर्षाप्रकर्षभेदे सत्यपि नैगमसंग्रहादिनयापेक्षया सर्वेऽपि ते निर्ग्रन्था इत्युच्यन्ते ।
    हैं उनमें उत्तरोत्तर गुणश्रेणिनिर्जराके लिए असंख्यातगुणा द्रव्य प्राप्त होता है किन्तु आगे-आगे
    गुणश्रेणिका काल संख्यातगुणा हीन-हीन है। अर्थात् सम्यग्दृष्टिको गुणश्रेणि निर्जरामें जो अन्तर्मुहूर्त
    काल लगता है उससे श्रावकको संख्यात गुणा हीन काल लगता है पर सम्यग्दृष्टि गुणश्रेणि द्वारा १५
    जितने कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा करता है उससे श्रावक असंख्यात गुणे कर्मपरमाणुओंकी निर्जरा करता
    है। इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए।
    § ९०९. कहते हैं सम्यग्दर्शनका सान्निध्य होनेपर भी यदि असंख्येयगुण निर्जराके कारण
    ये परस्परमें समान नहीं हैं तो श्रावकके समान ये विरत आदिक भी केवल गुणभेदके कारण
    निर्ग्रन्थपनेको नहीं प्राप्त हो सकते हैं, इसलिए कहते हैं कि यह बात ऐसी नहीं है क्योंकि यतः २०
    गुणभेदके कारण परस्पर भेद होनेपर भी नैगमादि नयकी अपेक्षा वे सभी होते हैं—
    पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक ये पाँच निर्ग्रन्थ हैं ॥४६॥
    § ९१०. जिनका मन उत्तरगुणोंकी भावनासे रहित है, जो कहीं पर और कदाचित् व्रतोंमें
    भी परिपूर्णताको नहीं प्राप्त होते हैं वे अविशुद्धपुलाक (तुच्छ धान्य) के समान होनेसे पूलाक कहे
    जाते हैं। जो निर्ग्रन्थ होते हैं, व्रतोंका अखण्ड रूपसे पालन करते हैं, शरीर और उपकरणोंकी शोभा २५
    बढ़ानेमें लगे रहते हैं, परिवारसे घिरे रहते हैं और विविध प्रकारके मोहसे युक्त होते हैं वे बकुश
    कहलाते हैं। यहाँ पर बकुश शब्द 'शबल' (चित्र-विचित्र) शब्दका पर्यायवाची है। कुशील दो
    प्रकारके होते हैं—प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील। जो परिग्रहसे घिरे रहते हैं, जो मूल और
    उत्तरगुणोंमें परिपूर्ण हैं लेकिन कभी-कभी उत्तरगुणोंकी विराधना करते हैं वे प्रतिसेवनाकुशील
    कहलाते हैं। जिन्होंने अन्य कषायोंके उदयको जीत लिया है और जो केवल संज्वलन कषायके ३०
    अधीन हैं। वे कषायकुशील कहलाते हैं। जिस प्रकार जलमें लकड़ीसे की गयी रेखा अप्रकट रहती
    है उसी प्रकार जिनके कर्मोंका उदय अप्रकट हो और जो अन्तर्मुहूर्तके बाद प्रकट होनेवाले केवल-
    ज्ञान और केवलदर्शनको प्राप्त करते हैं वे निर्ग्रन्थ कहलाते हैं। जिन्होंने चार घातिया कर्मोंका नाश
    कर दिया है ऐसे दोनों प्रकारके केवली स्नातक कहलाते हैं। ये पाँचों ही निर्ग्रन्थ होते हैं। इनमें
    चारित्ररूप परिणामोंकी न्यूनाधिकताके कारण भेद होनेपर भी नैगम और संग्रह आदि नयोंकी ३५
    अपेक्षा वे सब निर्ग्रन्थ कहलाते हैं ।
    १. -भावनोपेत-मु० । २. शुद्धाः पुलाक-मु० । ३. -वारा मोहछेदशवल-आ०, दि० १ । -वारानु मोहसवल
    -दि० २ । ४. -विरोधिनः मु० ।
    ४५
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३५४ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४७ § ९११ -
§ ९११. तेषां पुलाकादीनां भूयोऽपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपादस्थानविकल्पतः साध्याः ॥ ४७ ॥
§ ९१२. त एते पुलाकादयः संयमादिभिरष्टभिरनुयोगैः साध्या व्याख्येयाः । तद्यथा—पुलाक-
बकुशप्रतिसेवनाकुशीला द्वयोः संयमयोः सामायिकच्छेदोपस्थापनयोर्वर्तन्ते । कषायकुशीला
द्वयोः संयमयोः परिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययोः पूर्वयोश्च । निर्ग्रन्थस्नातका एकस्मिन्नेव यथा-
ख्यातसंयमे सन्ति ।
§ ९१३. श्रुतं—पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीला उत्कर्षेणाभिन्नाक्षरदशपूर्वधराः । कषाय-
कुशीला निर्ग्रन्थाश्चतुर्दशपूर्वधराः । जघन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु । बकुशकुशीलनिर्ग्रन्थानां
श्रुतमष्टौ प्रवचनमातरः । स्नातका अपगतश्रुताः केवलिनः ।
§ ९१४. प्रतिसेवना—पञ्चानां मूलगुणानां रात्रिभोजनवर्जनस्य च पराभियोगाद् बला-
दन्यतमं प्रतिसेवमानः पुलाको भवति । बकुशो द्विविधः—उपकरणबकुशः शरीरबकुशश्चेति ।
तत्रोपकरणबकुशो बहुविशेषयुक्तोपकरणाकांक्षी । शरीरसंस्कारसेवी शरीरबकुशः । प्रतिसेवना-
कुशीलो मूलगुणानविराधयन्नुत्तरगुणेषु कांचिद्विराधनां प्रतिसेवते । कषायकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकानां
प्रतिसेवना नास्ति ।
§ ९१५. तीर्थमिति सर्वे सर्वेषां तीर्थकराणां तीर्थेषु भवन्ति ।
§ ९१६. लिङ्गं द्विविधं—द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं चेति । भावलिङ्गं प्रतीत्य सर्वे पञ्च निर्ग्रन्था
लिङ्गिनो भवन्ति । द्रव्यलिङ्गं प्रतीत्य भाज्याः ।
§ ९११. अब उन पुलाक आदिके सम्बन्धमें पुनरपि ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थानके भेदसे इन निर्ग्रन्थोंका
व्याख्यान करना चाहिए ॥४७॥
§ ९१२. ये पुलाक आदि संयम आदि आठ अनुयोगोंके द्वारा साध्य हैं अर्थात् व्याख्यान
करने योग्य हैं । यथा—पुलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील सामायिक और छेदोपस्थापना इन
दो संयमोंमें रहते हैं । कषायकुशील पूर्वोक्त दो संयमोंके साथ परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय
इन दो संयमोंमें रहते हैं । निर्ग्रन्थ और स्नातक एक मात्र यथाख्यात संयममें रहते हैं ।
§ ९१३. श्रुत—पुलाक, बकुश और प्रतिसेवनाकुशील उत्कृष्ट रूपसे अभिन्नाक्षर दश
पूर्वधर होते हैं । कषायकुशील और निर्ग्रन्थ चौदह पूर्वधर होते हैं । जघन्य रूपसे पुलाक श्रुत
आचार वस्तुप्रमाण होता है । बकुश, कुशील और निर्ग्रन्थोंका श्रुत आठ प्रवचनमातृका प्रमाण
होता है । स्नातक श्रुतज्ञानसे रहित केवली होते हैं ।
§ ९१४. प्रतिसेवना—दूसरोंके दबाववश जबरदस्तीसे पाँच मूलगुण और रात्रिभोजन
वर्जन व्रतमें से किसी एककी प्रतिसेवना करनेवाला पुलाक होता है । बकुश दो प्रकारके होते हैं,
उपकरणबकुश और शरीरबकुश । उनमें से अनेक प्रकारकी विशेषताओंको लिये हुए उपकरणोंको
चाहनेवाला उपकरणबकुश होता है तथा शरीरका संस्कार करनेवाला शरीरबकुश होता है ।
प्रतिसेवना कुशील मूलगुणोंकी विराधना न करता हुआ उत्तरगुणोंकी विराधनाकी प्रतिसेवना
करनेवाला होता है । कषायकुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातकोंके प्रतिसेवना नहीं होती ।
§ ९१५. तीर्थ—ये सब निर्ग्रन्थ सब तीर्थंकरोंके तीर्थोंमें होते हैं ।
§ ९१६. लिंग—लिंग दो प्रकारका है, द्रव्यलिंग और भावलिंग । भावलिंगकी अपेक्षा
पाँचों ही साधु निर्ग्रन्थ लिंगवाले होते हैं । द्रव्यलिंग अर्थात् शरीरकी ऊँचाई, रंग व पीछी आदि-
की अपेक्षा उनमें भेद है ।
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Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text, Hindi translation, and footnotes from the image:

– ९।४७ § ९१९ ] नवमोऽध्यायः ३५५
§ ९१७. लेश्याः—पुलाकस्योत्तरास्तिस्रः बकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोः षडपि$^१$। कषायकुशी-
लस्य चतस्र उत्तराः । सूक्ष्मसांपरायस्य निर्ग्रन्थस्नातकयोश्च शुक्लैव केवला । अयोगा अलेश्याः ।
§ ९१८. उपपादः—पुलाकस्योत्कृष्ट उपपाद उत्कृष्टस्थितिदेवेषु सहस्रारे । बकुशप्रतिसेवना-
कुशीलयोर्द्वाविंशतिसागरोपमस्थितिषु आरणाच्युतकल्पयोः । कषायकुशीर्लानिर्ग्रन्थयोस्त्रयस्त्रिंश-
त्सागरोपमस्थितिषु सर्वार्थसिद्धौ । सर्वेषामपि जघन्यः सौधर्मकल्पे द्विसागरोपमस्थितिषु । स्नात-
कस्य निर्वाणमिति ।
§ ९१९. स्थानम्—असंख्येयानि संयमस्थानानि कषायनिमित्तानि भवन्ति । तत्र सर्वजघ-
न्यानि लब्धिस्थानानि पुलाककषायकुशीलयोः । तौ युगपदसंख्येयानि स्थानानि गच्छतः । ततः
पुलाको व्युच्छिद्यते । कषायकुशीलस्ततोऽसंख्येयानि स्थानानि गच्छत्येकाकी । ततः कषायकुशील-
प्रतिसेवनाकुशीलबकुशा युगपदसंख्येयानि स्थानानि गच्छन्ति । ततो बकुशो व्युच्छिद्यते । ततोऽ- १०
प्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा प्रतिसेवनाकुशीलो व्युच्छिद्यते । ततोऽप्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा
कषायकुशीलो व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमकषायस्थानानि निर्ग्रन्थः प्रतिपद्यते । सोऽप्यसंख्येयानि
स्थानानि गत्वा व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमेकं स्थानं गत्वा स्नातको निर्वाणं $^२$प्राप्नोतीत्येतेषां संयम-
लब्धिरनन्तगुणा भवति ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां नवमोऽध्यायः समाप्तः ।
§ ९१७. लेश्या—पुलाकके आगेकी तीन लेश्याएँ होती हैं। बकुश और प्रतिसेवना कुशील- १५
के छहों लेश्याएँ होती हैं। कषायकुशीलके अन्तकी चार लेश्याएँ होती हैं । सूक्ष्मसाम्पराय कषाय-
कुशीलके तथा निर्ग्रन्थ और स्नातकके केवल शुक्ल लेश्या होती है और अयोगी लेश्यारहित
होते हैं ।
§ ९१८. उपपाद—पुलाकका उत्कृष्ट उपपाद सहस्रार कल्पके उत्कृष्ट स्थितिवाले देवोंमें
होता है । बकुश और प्रतिसेवना कुशीलका उत्कृष्ट उपपाद आरण और अच्युत कल्पमें बाईस २०
सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। कषायकुशील और निर्ग्रन्थका उत्कृष्ट उपपाद सर्वार्थसिद्धिमें
तैंतीस सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। इन सभीका जघन्य उपपाद सौधर्म कल्पमें दो सागर
की स्थितिवाले देवोंमें होता है । तथा स्नातक मोक्ष जाते हैं ।
§ ९१९. स्थान—कषायनिमित्तक असंख्यात संयमस्थान होते हैं । पुलाक और कषाय-
कुशीलके सबसे जघन्य लब्धिस्थान होते हैं । वे दोनों असंख्यात स्थानोंतक एक साथ जाते हैं । २५
इसके बाद पुलाककी व्युच्छित्ति हो जाती है । आगे कषायकुशील असंख्यात स्थानोंतक अकेला
जाता है । इससे आगे कषायकुशील, प्रतिसेवना कुशील और बकुश असंख्यात स्थानोंतक एक
साथ जाते हैं । यहाँ बकुशकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर
प्रतिसेवना कुशीलकी व्युच्छित्ति हो जाती है। पुनः इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर कषाय
कुशीलकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे आगे अकषाय स्थान हैं जिन्हें निर्ग्रन्थ प्राप्त होता है । ३०
उसकी भी असंख्यातस्थान आगे जाकर व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे आगे एक स्थान जाकर
स्नातक निर्वाणको प्राप्त होता है । इनकी संयमलब्धि अनन्तगुणी होती है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धिनामक तत्त्वार्थवृत्तिका नौवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
१. षडपि । कृष्णलेश्यादित्रितयं तयोः कथमिति चेदुच्यते-तयोरुपकरणासक्तिसंभवादात्तंर्ध्यानं कदाचित्संभवति,
आर्तध्यानेन च कृष्णादिलेश्यात्रितयं संभवतीति । कषाय-मु० । २. प्राप्नोति तेषां मु० । ३५

अथ दशमोऽध्यायः
§ ९२०. आह, अन्ते निर्दिष्टस्य मोक्षस्येदानीं स्वरूपाभिधानं प्राप्तकालमिति । सत्यमेवम् ।
मोक्षप्राप्तिः केवलज्ञानावाप्ति¹पूर्विकेति केवलज्ञानोत्पत्तिकारणमुच्यते—
मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ॥ १॥
§ ९२१. इह वृत्तिकरणं न्याय्यम् । कुतः । लघुत्वात् । कथम्² । एकस्य ‘क्षय’शब्दस्या-
करणाद् विभक्त्यन्तरनिर्देशस्य चाभावात् ‘च’ शब्दस्य चाप्रयोगाल्लघु सूत्रं भवति ‘मोहज्ञानदर्शना-
वरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ इति । सत्यमेतत्, क्षयक्रमप्रतिपादनार्थो वाक्यभेदेन निर्देशः क्रियते ।
प्रागेव मोहं क्षयमुपनीयान्तर्मुहूर्तं क्षीणकषायव्यपदेशमवाप्य ततो युगपज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां
क्षयं कृत्वा केवलमवाप्नोति इति । तत्क्षयो³ हेतुः केवलोत्पत्तेरिति हेतुलक्षणो विभक्तिनिर्देशः कृतः ।
कथं प्रागेव मोहः क्षयमुपनीयते इति चेदुच्यते—भव्यः सम्यग्दृष्टिः परिणामविशुद्ध्या वर्धमानोऽ-
संयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तगुणस्थानेषु कस्मिंश्चिन्मोहस्य सप्त प्रकृतीः क्षयमुपनीय
क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा क्षपकश्रेण्यारोहणाभिमुखोऽधःप्रवृत्तकरणमप्रमत्तस्थाने प्रतिपद्यापूर्वकरण-
प्रयोगेणापूर्वकरणक्षपकगुणस्थानव्यपदेशमनुभूय तत्राभिनवशुभाभिसन्धितानूतनपापप्रकृतिस्थित्यनु-
§ ९२०. कहते हैं कि अन्तमें कहे गये मोक्षके स्वरूपके कथनका अब समय आ गया है ।
यह कहना सही है तथापि केवलज्ञानकी उत्पत्ति होने पर ही मोक्षकी प्राप्ति होती है इसलिए पहले
केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कारणोंका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मोहका क्षय होनेसे तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका क्षय होनेसे केवल-
ज्ञान प्रकट होता है ॥१॥
§ ९२१. इस सूत्रमें समास करना उचित है क्योंकि इससे सूत्र लघु हो जाता है । शंका—
कैसे ? प्रतिशंका—क्योंकि ऐसा करनेसे एक क्षयशब्द नहीं देना पड़ता है और दूसरो विभक्तिके
निर्देशका अभाव हो जानेसे ‘च’ शब्दका प्रयोग नहीं करना पड़ता है इसलिए सूत्र लघु हो जाता
है । यथा—‘मोहज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ । समाधान—यह कहना सही है तथापि
क्षयके क्रमका कथन करनेके लिए वाक्योंका भेद करके निर्देश किया है। पहले ही मोहका क्षय
करके और अन्तर्मुहूर्त कालतक क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त होकर अनन्तर ज्ञानावरण, दर्शनावरण
और अन्तराय कर्मका एक साथ क्षय करके केवलज्ञानको प्राप्त होता है । इन कर्मोंका क्षय केवल-
ज्ञानकी उत्पत्तिका हेतु है ऐसा जानकर ‘हेतुरूप’ विभक्तिका निर्देश किया है। शंका—पहले ही
मोहके क्षयको कैसे प्राप्त होता है ? समाधान—वृद्धिको प्राप्त होता हुआ असंयत सम्यग्दृष्टि, संयता-
संयत, प्रमत्तसंयत, और अप्रमत्तसंयत इन चार गुणस्थानोंमें-से किसी एक गुणस्थानमें मोहनीयकी
सात प्रकृतियोंका क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर क्षपकश्रेणिपर आरोहण करनेके लिए
सम्मुख होता हुआ अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें अधःप्रवृत्तकरणको प्राप्त होकर अपूर्वकरणके प्रयोग
द्वारा अपूर्वकरणक्षपकगुणस्थान संज्ञाका अनुभव करके और वहाँपर नूतन-परिणामोंकी विशुद्धिवश
१. –ज्ञानाप्ति–आ० । २. कथम् ? क्षय–मु० । ३. तत्क्षयहेतुः केवलोत्पत्तिरिति मु०, ता० ।

  • १०।२ § ९२३ ] दशमोऽध्यायः ३५७
    भागो विवर्धितशुभकर्मानुभवोऽनिवृत्तिकरणप्राप्त्याऽनिवृत्तिबादरसांपरायक्षपकगुणस्थानमधिरुह्य
    तत्र कषायाष्टकं नष्टं कृत्वा नपुंसकवेदनाशं समापाद्य स्त्रीवेदमुन्मूल्य नोकषायषट्कं पुंवेदे प्रक्षिप्य
    क्षपयित्वा पुंवेदं क्रोधसंज्वलने, क्रोधसंज्वलनं मानसंज्वलने, मानसंज्वलनं मायासंज्वलने, माया-
    संज्वलनं$^१$ च लोभसंज्वलने क्रमेण बादरकृष्टिविभागेन विलयमुपनीय लोभसंज्वलनं तनूकृत्य सूक्ष्म-
    सांपरायक्षपकत्वमनुभूय निरवशेषं मोहनीयं निर्मूलकषायं कषित्वा क्षीणकषायतामधिरुह्यावतारित- ५
    मोहनीयभार उपान्त्यप्रथमे समये निद्राप्रचले प्रलयमुपनीय पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शना-
    वरणानां पञ्चानामन्तरायाणां$^२$ चान्तमन्ते समुपनीय$^३$ तदनन्तरं ज्ञानदर्शनस्वभावं केवलपर्यायम-
    प्रतर्क्यविभूतिविशेषमवाप्नोति ।
    § ९२२. आह कस्माद्धेतोर्मोक्षः किंलक्षणश्चेत्यत्रोच्यते—
    बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥ २ ॥ १०
    § ९२३. मिथ्यादर्शनादिहेत्वभावादभिनवकर्मभावः पूर्वोदितनिर्जराहेतुसंनिधाने चार्जित-
    कर्मनिरासः । ताभ्यां बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यामिति हेतुलक्षणविभक्तिनिर्देशः । ततो भवस्थिति-
    हेतुसमीकृतशेषकर्मविस्थस्य$^४$ युगपदात्यन्तिकः$^५$ कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः प्रत्येत्यव्यः । कर्माभावो
    द्विविधः—यत्नसाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुषामभावो न यत्नसाध्यः
    असत्त्वात् । यत्नसाध्य इत ऊर्ध्वमुच्यते—असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिषु चतुर्षु गुणस्थानेषु कस्मिंश्चि- १५
    पापप्रकृतियोंकी स्थिति और अनुभागको कृश करके तथा शुभकर्मोंके अनुभागकी वृद्धि करके अनिवृत्ति-
    करणकी प्राप्ति द्वारा अनिवृत्तिबादरसाम्पराय क्षपकगुणस्थानपर आरोहण करके तथा वहाँ आठ
    कषायोंका नाश करके तथा नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे नाश करके, छह नोकषायका पुरुषवेद
    में संक्रमण द्वारा नाश करके तथा पुरुषवेदका क्रोधसंज्वलनमें, क्रोधसंज्वलनका मानसंज्वलनमें,
    मानसंज्वलनका मायासंज्वलनमें और मायासंज्वलनका लोभसंज्वलनमें क्रमसे बादरकृष्टिविभागके २०
    द्वारा संक्रमण करके तथा लोभसंज्वलनको कृश करके, सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकत्वका अनुभव करके,
    समस्त मोहनीयका निर्मूल नाश करके, क्षीणकषाय गुणस्थानपर आरोहण करके, मोहनीयके
    भारको उतारकर क्षीणकषाय गुणस्थानके उपान्त्य समयमें निद्रा और प्रचलाका नाश करके तथा
    अन्तिम समयमें पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय कर्मोंका अन्त करके
    तदनन्तर ज्ञानदर्शनस्वभावरूप केवल पर्यायको प्राप्त होता है । २५
    § ९२२. कहते हैं कि किस कारणसे मोक्ष प्राप्त होता है और उसका लक्षण क्या है यह
    बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जरासे सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है ॥२॥
    § ९२३. मिथ्यादर्शनादिक हेतुओंका अभाव होनेसे नूतन कर्मोंका अभाव होता है और पहले
    कही गयी निर्जरारूप हेतुके मिलनेपर अर्जित कर्मोंका नाश होता है। इन दोनोंसे 'बन्धहेत्वभाव- ३०
    निर्जराभ्याम्' यह हेतुपरक विभक्तिका निर्देश है। जिसने भवस्थितिके हेतुभूत आयुकर्मके बराबर
    शेष कर्मोंकी स्थितिको कर लिया है उसके उक्त कारणोंसे एक साथ समस्त कर्मोंका आत्यन्तिक
    वियोग होना मोक्ष है ऐसा जानना चाहिए। कर्मका अभाव दो प्रकारका है—यत्नसाध्य और अय-
    त्नसाध्य । इनमें से चरम देहवालेके नरकायु, तिर्यंचायु और देवायुका अभाव यत्नसाध्य नहीं होता,
    क्योंकि उसके उनका सत्त्व नहीं उपलब्ध होता । यत्नसाध्य अभाव इससे आगे कहते हैं—असंयत- ३५
    १. –लनं लोभ–मु० । २. –याणामन्त–मु० । ३. समुपगमय्य तद–मु०, ता० । ४. –वस्थितस्य मु०, ता० ।
    ५. –दात्यतीकृतकृ–मु० ।

३५८ सर्वार्थसिद्धौ [ १०।२ § ९२३ -
तत्सप्रकृतिकक्षयः क्रियते । निद्रानिद्राप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धिनरकगतितिर्यग्गत्येकद्वित्रिचतुरिन्द्रिय-
जातिनरकगतितिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यातोपोद्योतस्थावरसूक्ष्मसाधारणसंज्ञिकानां षोडशानां कर्म-
प्रकृतीनामनिवृत्तिबादरसांपरायस्थाने युगपत्क्षयः क्रियते । ततः परं तत्रैव कषायाष्टकं नष्टं
क्रियते । नपुंसकवेदः स्त्रीवेदश्च¹ क्रमेण तत्रैव क्षयमुपयाति । नोकषायषट्कं च सहैकेनैव प्रहारेण
५ विनिपातयति । ततः पुंवेदसंज्वलनक्रोधमानमायाः क्रमेण तत्रैवात्यन्तिकं ध्वंसमास्कन्दन्ति । लोभ-
संज्वलनः सूक्ष्मसांपरायान्ते यात्यन्तम् । निद्राप्रचले क्षीणकषायवीतरागच्छद्मस्थस्योपान्त्यसमये
प्रलयमुपव्रजतः । पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शनावरणानां पञ्चानामन्तरायाणां च तस्यैवान्त्य-
समये प्रक्षयो भवति । अन्यतरवेदनीयदेवगत्यौदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणशरीरपञ्चबन्धन-
पञ्चसंघातसंस्थानषट्कौदारिकवैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गषट्संहननपञ्चप्रशस्त वर्णपञ्चाप्रशस्त-
१० वर्णगन्धद्वयपञ्चप्रशस्तरसपञ्चाप्रशस्तरसस्पर्शाष्टकदेवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वा-
सप्रशस्ताप्रशस्तविहायोगत्यपर्याप्तप्रत्येकशरीरस्थिरास्थिरशुभाशुभदुर्भगसुस्वरदुःस्वरानादेयायशः-
कीर्तिनिर्माणनामनीचैर्गोत्राख्या द्वासप्ततिप्रकृतयोऽयोगकेवलिन उपान्त्यसमये विनाशमुपयान्ति ।
अन्यतरवेदनीयमनुष्यायुर्मनुष्यगतिपञ्चेन्द्रियजातिमनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यत्रसबादरपर्याप्तकसुभगा-
देययशःकीर्तितीर्थंकरनामोच्चैर्गोत्रसंज्ञिकानां त्रयोदशानां प्रकृतीनामयोगकेवलिनश्चरमसमये व्यु-
१५ च्छेदो भवति ।
सम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमेंसे किसी एक गुणस्थानमें सात प्रकृतियोंका क्षय करता है ।
पुनः निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति, तिर्यंचगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति,
त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप,
उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण नामवाली सोलह कर्मप्रकृतियोंका अनिवृत्तिबादरसाम्पराय
२० गुणस्थानमें एक साथ क्षय करता है। इसके बाद उसी गुणस्थानमें आठ कषायोंका नाश करता
है । पुनः वहींपर नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे क्षय करता है । तथा छह नोकषायोंको एक
ही प्रहारके द्वारा गिरा देता है। तदनन्तर पुरुषवेद संज्वलनक्रोध, संज्वलनमान और संज्वलनमाया
वहाँपर क्रमसे अत्यन्त क्षयको प्राप्त होते हैं। तथा लोभसंज्वलन सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके
अन्तमें विनाशको प्राप्त होता है। निद्रा और प्रचला क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थगुणस्थानके
२५ उपान्त्य समयमें प्रलयको प्राप्त होते हैं। पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय
कर्मोंका उसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें क्षय होता है। कोई एक वेदनीय, देवगति, औदारिक
शरीर, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर, तैजसशरीर, कार्मण शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात,
छह संस्थान, औदारिक शरीर अंगोपांग, वैक्रियिकशरीर अंगोपांग, आहारक शरीर अंगोपांग,
छह संहनन, पाँच प्रशस्तवर्ण, पाँच अप्रशस्तवर्ण, दो गन्ध, पाँच प्रशस्तरस, पाँच अप्रशस्तरस, आठ
३० स्पर्श, देवगति, प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, अप्र-
शस्तविहायोगति, अपर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर,
अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र नामवाली बहत्तर प्रकृतियोंको अयोगकेवली गुण-
स्थानके उपान्त्य समयमें विनष्ट करता है तथा कोई एक वेदनीय मनुष्य आयु, मनुष्यगति, पंचे-
न्द्रियजाति, मनुष्यगति-प्रायोग्यानुपूर्वी, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशःकीर्ति, तीर्थंकर
३५ और उच्चगोत्र नामवाली तेरह प्रकृतियोंका अयोगकेवली गुणस्थानके

  • १०१४ § ९२७ ] दशमोऽध्यायः ३५९
    § ९२४. आह, किमासां पौद्गलिकीनामेव द्रव्यकर्मप्रकृतीनां निरासान्मोक्षोऽवसीयते उत
    भावकर्मणोऽपीत्यत्रोच्यते—
    औपशमिकादिभव्यत्वानां च ॥ ३ ॥
    § ९२५. किम् । 'मोक्षः' इत्यनुवर्तते । भव्यत्वग्रहणमन्यपारिणामिकनिवृत्त्यर्थम् । तेन पारि-
    णामिकेषु भव्यत्वस्यौपशमिकादीनां च भावानाम्भावान्मोक्षो भवतीत्यभ्युपगम्यते । ५
    § ९२६. आह, यद्यपवर्गो भावोपरतेः प्रतिज्ञायते नैनु औपशमिकादिभावनिवृत्तितत्सर्व-
    क्षायिकभावनिवृत्तिर्व्यपदेशो मुक्तस्य प्राप्नोतीति । स्यादेतदेवं यदि विशेषो नोच्येत । अस्त्यत्र
    विशेष इत्यपवादविधानार्थमिदमुच्यते—
    अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ॥ ४ ॥
    § ९२७. अन्यत्रशब्दापेक्षया 'का'निर्देशः । केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्योऽन्यत्रान्य- १०
    स्मिन्नयं विधिरिति । यदि चत्वार एवावशिष्यन्ते, अनन्तवीर्यादीनां निवृत्तिः प्राप्नोति । नैष दोषः,
    और किसीके नहीं होता । इनके सिवा शेष प्रकृतियोंका सत्त्व नियमसे होता है । यह जीव गुण-
    स्थान क्रमसे बन्धहेतुओंका अभाव करता है इसलिए क्रमसे नूतन बन्धका अभाव होता जाता है
    और सत्तामें स्थित प्राचीन प्रकृतियोंका परिणाम-विशेषसे क्षय करता जाता है इसलिए सत्तामें
    स्थित कर्मोंका भी अभाव होता जाता है और इस प्रकार अन्तमें सब कर्मोंका वियोग हो जानेसे १५
    यह जीव मुक्त होता है। यहाँ मोक्ष शब्दका प्रयोग कर्म, नोकर्म और भावकर्मके वियोग अर्थमें
    किया गया है । संसारी जीव बद्ध है अतएव वह परतन्त्र है। उसके बन्धनके टूट जाने पर
    वह मुक्त होता है अर्थात् अपनी स्वतन्त्रताको प्राप्त करता है। इस प्रकार मोक्ष क्या है इसका
    निर्देश किया ।
    § ९२४. कहते हैं कि क्या इन पौद्गलिक द्रव्यकर्म प्रकृतियोंके वियोगसे ही मोक्ष मिलता २०
    है या भावकर्मोंके भी अभावसे मोक्ष मिलता है इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
    तथा औपशमिक आदि भावों और भव्यत्व भावके अभाव होनेसे मोक्ष होता है ॥३॥
    § ९२५. क्या होता है ? मोक्ष होता है। यहाँ पर 'मोक्ष' इस पदकी अनुवृत्ति होती है।
    अन्य पारिणामिक भावोंकी निवृत्ति करनेके लिए सूत्रमें भव्यत्व पदका ग्रहण किया है। इससे
    पारिणामिक भावोंमें भव्यत्वका और औपशमिक आदि भावोंका अभाव होनेसे मोक्ष होता है यह २५
    ज्ञात होता है।
    § ९२६. कहते हैं, यदि भावोंके अभाव होनेसे मोक्षकी प्रतिज्ञा करते हो तो औपशमिक
    आदि भावोंकी निवृत्तिके समान समस्त क्षायिक भावोंकी निवृत्ति मुक्त जीवके प्राप्त होती है ?
    यह ऐसा होवे यदि इसके सम्बन्धमें कोई विशेष बात न कही जावे तो । किन्तु इस सम्बन्धमें
    विशेषता है इसलिए अपवादका विधान करनेके लिए यह आगेका सूत्र कहते हैं— ३०
    पर केवल सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व भावका अभाव नहीं होता ॥४॥
    § ९२७. यहाँ पर अन्यत्र शब्दकी अपेक्षा पंचमी विभक्तिका निर्देश किया है। केवल-
    सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व इनके सिवा अन्य भावोंमें यह विधि होती है।
    शंका—सिद्धोंके यदि चार ही भाव शेष रहते हैं तो अनन्तवीर्य आदिकी निवृत्ति प्राप्त होती है।
    १. –यते नत्वौप-मु० । –यतेतदौप– ता० । २. 'कापदाने' –जैनेन्द्र० १, ४, ४१ । 'अपादाने कारके का ३५
    विभक्तिर्भवति ।' – वृत्तिः । प्रतिषु 'को निर्देशः' इति पाठः ।
३६०सर्वार्थसिद्धौ[ १०।५ § ९२८-

ज्ञानदर्शनाविनाभावित्वादनन्तवीर्यादीनामविशेषः, अनन्तसामर्थ्यहीनस्यानन्तावबोधवृत्त्यभावाज्ज्ञान-
¹मयत्वाच्च सुखस्येति। अनाकारत्वान्मुक्तानामभाव इति चेन्न; अतीतानन्तरशरीराकारत्वात्।
§ ९२८. स्यान्मतं, यदि शरीरानुविधायी जीवः, तदभावात्स्वाभाविकलोकाकाशप्रदेशपरि-
माणत्वात्तावद्विसर्पणं प्राप्नोतीति। नैष दोषः। कुतः। कारणाभावात्। नामकर्मसंबन्धो हि
संहरणविसर्पणकारणम्। तदभावात्पुनः संहरणविसर्पणाभावः।
§ ९२९. यदि कारणाभावान्न संहरणं न विसर्पणं तर्हि गमनकारणाभावादूर्ध्वगमनमपि न
प्राप्नोति अधस्तिर्यग्गमनाभाववत्, ततो यत्र मुक्तस्तत्रैवावस्थानं प्राप्नोतीति। अत्रोच्यते—
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्या लोकान्तात् ॥ ५ ॥
§ ९३०. तस्यानन्तरम्। कस्य। सर्वकर्मविप्रमोक्षस्य। आङ्भिविध्यर्थः। ऊर्ध्वं गच्छत्या
लोकान्तात्।
§ ९३१. अनुपदिष्टहेतुकमिदमूर्ध्वगमनं कथमध्यवसातुं शक्यमित्यत्रोच्यते—
पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद् बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च ॥ ६ ॥
§ ९३२. आह, हेत्वर्थः पुष्कलोऽपि दृष्टान्तसमर्थनमन्तरेणाभिप्रेतार्थसाधनाय नालमित्य-
त्रोच्यते—
समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि ज्ञानदर्शनके अविनाभावी अनन्तवीर्य आदिक भी सिद्धोंमें
अवशिष्ट रहते हैं। क्योंकि अनन्त सामर्थ्यसे हीन व्यक्तिके अनन्तज्ञानकी वृत्ति नहीं हो सकती और
सुख ज्ञानमय होता है। शंका—अनाकार होनेसे मुक्त जीवोंका अभाव प्राप्त होता है। समाधान—
नहीं। क्योंकि उनके अतीत अनन्तर शरीरका आकार उपलब्ध होता है।
§ ९२८. शंका—यदि जीव शरीरके आकारका अनुकरण करता है तो शरीरका अभाव
होनेसे उसके स्वाभाविक लोकाकाशके प्रदेशोंके बराबर होनेके कारण जीव तत्प्रमाण प्राप्त होता
है। समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जीवके तत्प्रमाण होनेका कोई प्रमाण नहीं उपलब्ध
होता। नामकर्मका सम्बन्ध जीवके संकोच और विस्तारका कारण है किन्तु उसका अभाव हो जाने
से जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार नहीं होता।
§ ९२९. यदि कारणका अभाव हो जानेसे जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार नहीं
होता तो गमनके कारणका अभाव हो जानेसे जिस प्रकार यह जीव तिरछा और नीचेकी ओर
गमन नहीं करता है उसी प्रकार उसका ऊर्ध्वगमन भी नहीं प्राप्त होता है। इसलिए जिस
स्थानपर मुक्त होता है उसी स्थानपर उसका अवस्थान प्राप्त होता है, ऐसी शंकाके होनेपर
आगेके सूत्र द्वारा उसका समाधान करते हैं।
तदनन्तर मुक्त जीव लोकके अन्त तक ऊपर जाता है ॥५॥
§ ९३०. उसके अनन्तर। शंका—किसके? समाधान—सब कर्मोंके वियोग होनेके। सूत्रमें
'आङ्' पद अभिविधि अर्थमें आया है। लोकके अन्त तक ऊपर जाता है।
§ ९३१. जीव ऊर्ध्वगमन क्यों करता है इसका कोई हेतु नहीं बतलाया, इसलिए इसका
निश्चय कैसे होता है अतः इसी बातका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पूर्वप्रयोगसे, संगका अभाव होनेसे, बन्धनके टूटनेसे और वैसा गमन करना स्वभाव होनेसे
मुक्त जीव ऊर्ध्वगमन करता है ॥६॥
§ ९३२. कहते हैं, पुष्कल भी हेतु दृष्टान्त द्वारा समर्थनके बिना अभिप्रेत अर्थकी सिद्धि
करनेमें समर्थ नहीं होते इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. -मयपर्यायत्वाच्च मु०, ता० । २. अतीतानन्तशरी-मु० । ३. -कर्मसंसर्गो हि ता० ।

आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च ॥ ७ ॥
§ ९३२. पूर्वसूत्रे^१ विहितानां हेतूनामत्रोक्तानां दृष्टान्तानां च यथासंख्यमभिसंबन्धो भवति ।
तद्यथा—कुलालप्रयोगापादितहस्तदण्डचक्रसंयोगपूर्वकं भ्रमणम् । उपरतेऽपि तस्मिन्पूर्वप्रयोगादा-
संस्कारक्षयाद् भ्रमति । एवं भवस्थेनात्मनापवर्गप्राप्तये बहुशो यत्प्रणिधानं तदभावेऽपि तदावेश-
पूर्वकं मुक्तस्य गमनमवसीयते । किं च, असङ्गत्वात् । यथा मृत्तिकालेपजनितगौरवमलाबुद्रव्यं ५
जलेऽधःपतितं जलक्लेदविशिष्टमृत्तिकाबन्धनं लघु सत्तूर्ध्वमेव गच्छति तथा कर्मभाराक्रान्तिवशी-
कृत आत्मा तदावेशवशात्संसारे अनियमेन गच्छति । तत्सङ्गविमुक्त^२स्तूर्ध्वमेवोपयाति । किं च,
बन्धच्छेदात् । यथा बीजकोशबन्धच्छेदादेरण्डबीजस्य गतिर्दृष्टा तथा मनुष्यादिभवप्रापकगतिजाति-
नामादिसकलकर्मबन्धच्छेदान्मुक्तस्य ऊर्ध्वगतिरवसीयते । किं च, तथागतिपरिणामात् । यथा
तिर्यक्प्लवनस्वभावसमीरणसंबन्धनिरुत्सुका प्रदीपशिखा स्वभावादुत्पतति तथा मुक्तात्मापि १०
नानागतिविकारकारणकर्मनिर्वारणे सत्यूर्ध्वगतिस्वभावोऽ^३दूर्ध्वमेवारोहति ।
§ ९३४. आह, यदि मुक्त ऊर्ध्वगतिस्वभावो लोकान्तादूर्ध्वमपि कस्मान्नोत्पततीत्यत्रोच्यते—
धर्मास्तिकायाभावात् ॥ ८ ॥
घुमाये गये कुम्हारके चक्रके समान, लेपसे मुक्त हुई तूमड़ीके समान, एरण्डके बीजके
समान और अग्निकी शिखाके समान ॥७॥ १५
§ ९३३. पिछले सूत्रमें कहे गये सूत्रोंका और इस सूत्रमें कहे गये दृष्टान्तोंका क्रमसे सम्बन्ध
होता है । यथा—कुम्हारके प्रयोगसे किया गया हाथ, दण्ड और चक्रके संयोगपूर्वक जो भ्रमण
होता है उसके उपरत हो जानेपर भी पूर्व प्रयोगवश संस्कारका क्षय होने तक चक्र घूमता रहता
है । इसी प्रकार संसारमें स्थित आत्माने मोक्षकी प्राप्तिके लिए जो अनेक बार प्रणिधान किया है
उसका अभाव होनेपर भी उसके आवेश पूर्वक मुक्त जीवका गमन निश्चित होता है। असंगतवात्— २०
जिस प्रकार मृत्तिकाके लेपसे तूमड़ीमें जो भारीपन आ जाता है उससे जलके नीचे पड़ी हुई तूमड़ी
जलसे मिट्टीके गीले हो जानेके कारण बन्धनके शिथिल होनेसे शीघ्र ही ऊपर ही जाती है उसी
प्रकार कर्मभारके आक्रमणसे आधीन हुआ आत्मा उसके आवेशवश संसारमें अनियमसे गमन करता
है किन्तु उसके संगसे मुक्त होनेपर ऊपर ही जाता है। बन्धच्छेदात्—जिस प्रकार बीजकोषके
बन्धनके टूटनेसे एरण्ड बीजकी ऊर्ध्व गति देखी जाती है उसी प्रकार मनुष्यादि भवको प्राप्त २५
करानेवाले गतिनाम और जातिनाम आदि समस्त कर्मोंके बन्धका छेद होनेसे मुक्त जीवकी ऊर्ध्व-
गति जानी जाती है। तथागतिपरिणामात्—जिस प्रकार तिर्यग्वहन स्वभाववाले वायुके सम्बन्धसे
रहित प्रदीपशिखा स्वभावसे ऊपरकी ओर गमन करती है उसी प्रकार मुक्त आत्मा भी नानागति
रूप विकारके कारणभूत कर्मका अभाव होनेपर ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे ऊपरकी ओर ही आरोहण
करता है। ३०
§ ९३४. कहते हैं कि यदि मुक्तजीव ऊर्ध्व गति स्वभाववाला है तो लोकान्तसे ऊपर भी
किस कारणसे नहीं गमन करता है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
धर्मास्तिकायका अभाव होनेसे मुक्त जीव लोकान्तसे और ऊपर नहीं जाता ॥८॥
१. पूर्वसूत्रोदितानां-मु० । २. -विप्रमुक्तौ तूपर्येवोप-मु० । -विमुक्ते तूपर्येवोप-ता० । -विमुक्तोऽत्र-दि० १,
दि० २ । ३. -भावत्वादू-मु० । ३५
४६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

! Wait, why does it look like दुःषमा? In Digambara Hindi texts, they often write दुःषमा(matching Sanskrit दुःषमा). Wait, let's look at L31: भागमें और दुःषमा-सुषमामें उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है। दुःषमामें उत्पन्न हुआ दुःषमामें सिद्ध Wait, look atदुःषमामें: is there a visarga ः? Yes, two dots are clearly visible! दुःषमामें. Wait, let's look at the character: is it ष? Yes, it is ष! Notice the horizontal line on top and the प-like shape with a crossbar: ष. Wait, why did I think खearlier? The crossbar is faint in some places, but it'sषmatching Sanskritदुःषमायाम्. Let's re-read line 30: सुषमा-दुःषमाके अन्त Line 31:भागमें और दुःषमा-सुषमामें उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है। दुःषमामें उत्पन्न हुआ दुःषमामें सिद्ध Yes, it's definitelyदुःषमा`!

  • Line 32: नहीं होता। इस कालको छोड़कर अन्यकाल में सिद्ध नहीं होता है। संहरणकी अपेक्षा उत्सर्पिणी
  • १०।९ § ९३७ ] दशमोऽध्यायः ३६३
    पुल्लिङ्गेनैव । अथवा निर्ग्रन्थलिङ्गेन । सग्रन्थलिङ्गेन वा सिद्धिर्भूतपूर्वनयापेक्षया । तीर्थेन,१ तीर्थ-
    सिद्धिः द्वेधा, तीर्थंकरेतरविकल्पात् । इतरे द्विविधाः सति तीर्थंकरे सिद्धा असति चेति । चारित्रेण
    केन सिध्यति । अव्यपदेशेनैकचतुःपञ्चविकल्पचारित्रेण वा सिद्धिः । स्वशक्तिपरोपदेशनिमित्त-
    ज्ञानभेदात् प्रत्येकबुद्धबोधितविकल्पः । ज्ञानेन केन । एकेन द्वित्रिचतुर्भिश्च ज्ञानविशेषैः सिद्धिः ।
    आत्मप्रदेशव्यापित्वमवगाहनम् । तद् द्विविधम्, उत्कृष्टजघन्यभेदात् । तत्रोत्कृष्टं पञ्चधनुःशतानि
    पञ्चविंशत्युत्तराणि । जघन्यमर्धचतुर्थारत्नयो देशोनाः । मध्ये विकल्पाः । एकस्मिन्नवगाहे
    सिध्यति । किमन्तरम् । सिध्यतां सिद्धानामनन्तरं२ जघन्येन द्वौ समयौ उत्कृष्टेनाष्टौ । अन्तरं
    जघन्येनैकः समयः उत्कर्षेण षण्मासाः । संख्या, जघन्येन एकसमये एकः सिध्यति । उत्कर्षेणा-
    ष्टोत्तरशतसंख्याः । क्षेत्रादिभेदभिन्नानां परस्परतः संख्याविशेषोऽल्पबहुत्वम् । तद्यथा-प्रत्युत्पन्न-
    नयापेक्षया सिद्धिक्षेत्रे सिध्यन्तीति नास्त्यल्पबहुत्वम् । भूतपूर्वनयापेक्षया तु चिन्त्यते, क्षेत्रसिद्धा
    द्विविधा-जन्मतः संहरणतश्च । तत्राल्पे संहरणसिद्धाः । जन्मसिद्धाः संख्येयगुणाः । क्षेत्राणां
    विभागः कर्मभूमिरकर्मभूमिः समुद्रो द्वीप ऊर्ध्वमधस्तिर्यगिति । तत्र स्तोका ऊर्ध्वलोकसिद्धाः ।
    अधोलोकसिद्धाः संख्येयगुणाः । तिर्यग्लोकसिद्धाः संख्येयगुणाः । सर्वतः स्तोकाः समुद्रसिद्धाः ।
    द्वीपसिद्धाः संख्येयगुणाः । एवं तावदविशेषेण । सर्वतः स्तोका लवणोदसिद्धाः । कालोदसिद्धाः
    अपेक्षा पुलिंगसे ही सिद्धि होती है अथवा निर्ग्रन्थलिंगसे सिद्धि होती है । भूतपूर्वनयकी अपेक्षा सग्रन्थ
    लिंगसे सिद्धि होती है । तीर्थ-तीर्थसिद्धि दो प्रकारकी है-तीर्थंकरसिद्ध और इतरसिद्ध । इतर
    दो प्रकारके हैं, कितने ही जीव तीर्थंकरके रहते हुए सिद्ध होते हैं और कितने ही जीव तीर्थंकरके
    अभावमें सिद्ध होते हैं । चारित्र-किस चारित्रसे सिद्धि होती है ? नामरहित चारित्रसे सिद्धि होती
    है या एक, चार और पाँच प्रकारके चारित्रसे सिद्धि होती है ! प्रत्येकबुद्ध-बोधितबुद्ध-अपनी
    शक्ति रूप निमित्तसे होनेवाले ज्ञानके भेदसे प्रत्येकबुद्ध होते हैं और परोपदेश रूप निमित्तसे होने-
    वाले ज्ञानके भेदसे बोधितबुद्ध होते हैं, इस प्रकार ये दो प्रकारके हैं । ज्ञान-किस ज्ञानसे सिद्धि
    होती है । एक, दो, तीन और चार प्रकारके ज्ञानविशेषोंसे सिद्धि होती है । अवगाहना-आत्म-
    प्रदेशमें व्याप्त करके रहना इसका नाम अवगाहना है । वह दो प्रकारकी है-जघन्य और उत्कृष्ट ।
    उत्कृष्ट अवगाहना पाँच सौ पचीस धनुष है और जघन्य अवगाहना कुछ कम साढ़े तीन अरत्नि
    है । बीचके भेद अनेक हैं । किसी एक अवगाहनामें सिद्धि होती है । अन्तर-क्या अन्तर है ?
    सिद्धिको प्राप्त होनेवाले सिद्धोंका जघन्य अनन्तर दो समय है और उत्कृष्ट अनन्तर आठ समय है ।
    जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । संख्या-जघन्य रूपसे एक
    समयमें एक जीव सिद्ध होता है और उत्कृष्ट रूपसे एक समयमें एक सौ आठ जीव सिद्ध होते हैं ।
    अल्पबहुत्व-क्षेत्रादि भेदोंकी अपेक्षा भेदको प्राप्त हुए जीवोंकी परस्पर संख्याका विशेष प्राप्त
    करना अल्पबहुत्व है । यथा-वर्तमान नयकी अपेक्षा सिद्धिक्षेत्रमें सिद्ध होनेवाले जीवोंका अल्प-
    बहुत्व नहीं है । भूतपूर्व नयकी अपेक्षा विचार करते हैं-क्षेत्रसिद्ध जीव दो प्रकारके हैं-जन्मसिद्ध
    और संहरणसिद्ध । इनमेंसे संहरणसिद्ध जीव सबसे अल्प हैं। इनसे जन्मसिद्ध जीव संख्यातगुणे
    हैं । क्षेत्रोंका विभाग इस प्रकार है-कर्मभूमि, अकर्मभूमि, समुद्र, द्वीप, ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और
    तिर्यग्लोक । इनमें से ऊर्ध्वलोकसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे अधोलोक सिद्ध संख्यातगुणे हैं, इनसे
    तिर्यग्लोकसिद्ध संख्यातगुणे हैं। समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे द्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। यह
    सामान्य रूपसे कहा है । विशेष रूपसे विचार करनेपर लवण समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे
    १. तीर्थेन केन तीर्थेन सिद्धिः मु० । २. सिद्धानामन्तरं मु० ।
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३६४ सर्वार्थसिद्धौ [ १०।९ ६९३८-
संख्येयगुणाः । जम्बूद्वीपसिद्धाः संख्येयगुणाः । धातकीखण्डसिद्धाः संख्येयगुणाः । पुष्करद्वोपार्ध-
सिद्धाः संख्येयगुणा इति । एवं कालादिविभागेऽपि यथागममल्पबहुत्वं वेदितव्यम् ॥१०॥
§ ९३८. स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यै-
र्जैनेन्द्रशासनवरामृतसार ता ।
५ सर्वार्थसिद्धिरिति सद्द्भिरुपात्तनामा
तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥१॥
तत्त्वार्थवृत्तिममुदितां विदितार्थतत्त्वाः
शृण्वन्ति ये परिपठन्ति च धर्मभक्त्या ।
हस्ते कृतं परमसिद्धिसुखामृतं तै-
१० र्मर्त्यामरेश्वरसुखेषु किमस्ति वाच्यम् ॥२॥
येनेदमप्रतिहतं सकलार्थतत्त्व-
मुद्द्योतितं विमलकेवललोचनेन ।
भक्त्या तमद्भुतगुणं प्रणमामि वीर-
माराद्धरामरगणार्चितपादपीठम् ॥३॥
१५ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां दशमोऽध्यायः समाप्तः ।
शुभं भवतु सर्वेषाम् ।
कालोदसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे जम्बूद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे धातकी खंड सिद्ध संख्यात-
गुणे हैं। इनसे पुष्करार्द्धद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार कालादिका विभाग करनेपर भी
आगमके अनुसार अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए ।
२० § ९३८. स्वर्ग और अपवर्गके सुखको चाहनेवाले आर्य पुरुषोंने इस तत्त्वार्थवृत्तिका सर्वार्थ-
सिद्धि यह नाम रखा है। यह जिनेन्द्रदेवके शासनरूपी अमृतका सार है, अतः मनःपूर्वक इसे
निरन्तर धारण करना चाहिए ॥१॥ सब तत्त्वोंके जानकार जो इस तत्त्वार्थवृत्तिको धर्मभक्तिसे
सुनते हैं और पढ़ते हैं मानो उन्होंने परम सिद्धिसुखामृतको अपने हाथमें ही कर लिया है, फिर,
चक्रवर्ती और देवेन्द्रके सुखके विषयमें तो कहना ही क्या है ॥२॥ जिन्होंने अपने विमल केवल-
२५ ज्ञानरूपी नेत्रके द्वारा इस निर्विवाद सकल तत्त्वार्थका प्रकाश किया है, मनुष्यों और देवोंके द्वारा
पूजित अद्भुतगुणवाले उन वीर भगवान् को भक्तिपूर्वक मैं प्रणाम करता हूँ ॥३॥
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
१. - द्वीपसिद्धाः मु० Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

परिशिष्ट १
सूत्रपाठ
प्रथम अध्याय
पैराग्राफ संख्या
१. सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । ४
२. तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । ९
३. तन्निसर्गादधिगमाद्वा । १३
४. जीवाजीवास्त्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् । १७
५. नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः । २१
६. प्रमाणनयैरधिगमः । २३
७. निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः । २५
८. सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च । ३२
९. मतिश्रुतावधिमनःपर्ययै²केवलानि ज्ञानम् १६३
१०. तत्प्रमाणे । १६५
११. आद्ये परोक्षम् ।³ १७३
१२. प्रत्यक्षमन्यत् । १७५
१३. मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम् । १८१
१४. तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् । १८४
१५. अवग्रहेहावाय⁴धारणाः । १८९
१६. बहुबहुविधक्षिप्रानिः⁵सृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् । १९१
१७. अर्थस्य । १९७
१८. व्यञ्जनस्यावग्रहः । १९९
१९. न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् । २०१
२०. श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकदशद्वादशभेदम् । २०५
२१. भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम् ।⁶ २१२
२२. क्षयोपशमनिमित्तः⁷ षड्विकल्पः शेषाणाम् । २१४
२३. ऋजुविपुलमतीमनःपर्ययः ।⁸ २१६
२४. विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः २१९
२५. विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ।⁹ २२१
२६. मतिश्रुतयोर्निबन्धो¹⁰ द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु । २२३
१. आश्रव-हारिभ० । २. मनःपर्य्याय-त० भा० । ३. तत्र आद्ये-हारिभ० । ४.-हेहापाय-त०, मा०,
हारिभ० सि० । तत्त्वार्थवार्तिकमें 'अवाय और अपाय' दोनों पाठ हैं । ५.-निश्चिता-त० मा०, क्षिप्र-
निःसृतानु- स०, श्रितनिश्चितध्रु- सि० वृ० पा० । ६. त० मा० में भवप्रत्ययो इत्यादि सूत्रके स्थान पर
द्विविधोऽवधिः ॥२१॥ भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् ॥२२॥ ऐसे दो सूत्र हैं । ७. यथोक्तनिमित्तः । त० भा० ।
८. -मनःपर्य्यायः । त० भा० । ९.-मनःपर्य्याययोः । त० भा० । १०. सर्वद्रव्ये-त० मा० ।
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३६६ सर्वार्थसिद्धि
२७. रूपिष्ववधेः । २२५
२८. तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ।१ २२७
२९. सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य । २२९
३०. एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः । २३१
३१. मतिश्रुतावधयो२ विपर्ययश्च । २३३
३२. सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् । २३५
३३. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दा३समभिरूढैवंभूता नयाः । २४०
इति प्रथमोऽध्यायः ।
दूसरा अध्याय
१. औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च । २५१
२. द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् । २५४
३. सम्यक्त्वचारित्रे । २५६
४. ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च । २६०
५. ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रिपञ्चभेदाः४,५सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च । २६२
६. गतिकषायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्ध७लेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकषड्भेदाः । २६४
७. जीवभव्याभव्यत्वानि च । २६७
८. उपयोगो लक्षणम् । २७०
९. स९ द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः । २७२
१०. संसारिणो मुक्ताश्च । २७४
११. समनस्कामनस्काः । २८१
१२. संसारिणस्त्रसस्थावराः । २८३
१३. पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ।१० २८५
१४. द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ।११ २८७
१५. पञ्चेन्द्रियाणि । २८९
१६. द्विविधानि । २९१
१७. निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् । २९३
१८. लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् । २९५
१९. स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ।१२ २९७
२०. स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ।१३ २९९
२१. श्रुतमानिन्द्रियस्य । ३०१
१. मनःपर्ययस्य त० भा० । २.-श्रुतिविभंगा विप- हारिभ० । ३.-सूत्रशब्दा नयाः त० भा० । ४.-त०
म० में आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ ॥३५॥ यह सूत्र अधिक है । ५.-दानादिलब्धय-त० भा० । ६-त० सा० में
'यथाक्रमम्' इतना पाठ अधिक है । ७. सिद्धत्व-त० भा० । ८. भव्यत्वादीनि-त० भा० । ९. 'स' पाठ
नहीं है सि० वृ० पा० । १०. 'पृथिव्यम्बुवनस्पतयः स्थावराः' त० भा० । ११. तेजोवायू द्वीन्द्रियादयश्च
त्रसाः त० भा० । १२. 'स्पर्शनरसन'-इत्यादि सूत्रके पूर्व 'उपयोगः स्पर्शादिषु' ।।१९।। यह सूत्र त० भा० में
अधिक है । १३. शब्दास्तेषामर्थाः । त० भा० ।

परिशिष्ट १ ३६७
२२. वनस्पत्यन्तानामेकम् ।¹ ३०३
२३. कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि । ३०५
२४. संज्ञिनः समनस्काः । ३०७
२५. विग्रहगतौ कर्मयोगः । ३०९
२६. अनुश्रेणि गतिः । ३११
२७. अविग्रहा जीवस्य । ३१३
२८. विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्थ्यः । ३१५
२९. एकसमयाविग्रहा ।२ ३१७
३०. एकं द्वौ ३ त्रीन्वानाहारकः । ३१९
३१. संमूर्च्छनगर्भोपपादा४ जन्म । ३२१
३२. सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः । ३२३
३३. जरायुजाण्डैजपोतानां गर्भः । ३२५
३४. देवनारकाणामुपपादः६ । ३२७
३५. शेषाणां संमूर्च्छनम् । ३२८
३६. औदारिकवैक्रियिकाहारक⁷तैजसकार्मणानि शरीराणि । ३३०
३७. परं परं सूक्ष्मम् । ३३२
३८. प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात् ३३४
३९. अनन्तगुणे परे । ३३६
४०. अप्रतीघाते८ । ३३८
४१. अनादिसंबन्धे च । ३४०
४२. सर्वस्य । ३४२
४३. तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः । ३४४
४४. निरुपभोगमन्त्यम् । ३४६
४५. गर्भसंमूर्च्छनजमाद्यम् । ३४८
४६. औपपादिकं वैक्रियिकम् ।१० ३५०
४७. लब्धिप्रत्ययं च । ३५२
४८. तैजसमपि ।११ ३५४
४९. शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं १२ प्रमत्तसंयतस्यैव । ३५६
५०. नारकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि । ३५८
५१. न देवाः । ३६०
५२. शेषास्त्रिवेदाः ।१३ ३६२
५३. औपपादिकचरमोत्तमदेहा १४ऽसंख्येय १५वर्षायुषोनपवर्त्यायुषः । ३६४
इति द्वितीयोऽध्यायः ।
१. वाय्वन्तानामेकम् त० भा० । २. एकसमयोऽविग्रहः त० भा० । ३. द्वौ वानाहरकः त० भा० ।
४. —गर्भोपपाता त० भा० । ५. जरायुवण्डपोतजानां त० भा० । ६. नारकदेवानामुपपातः त० भा० ।
७. —वैक्रियाहारक- । त० भा० । ८. अप्रतिघाते । त० भा० । ९. युगपदेकस्या । १०. वैक्रियमौप-
पातिकम् । त० भा० । ११. त० भा० में यह सूत्र नहीं है । १२. चतुर्दशपूर्वधरस्यैव । त० भा० में इतना
पाठ अधिक है । १३. त० भा० में यह सूत्र नहीं है । १४. ‘चरमदेहा’ यह भी पाठान्तर है । स०, त०
वा० । १५. औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषासंख्येय- । त० भा० ।
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३६८ सर्वार्थसिद्धि
तीसरा अध्याय
१. रत्नशर्कराबालुकापङ्कधूमतमोमहातमःप्रभा भूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोधः।१ ३६६
२. २तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् । ३६८
३. ३नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः । ३७०
४. परस्परोदीरितदुःखाः । ३७२
५. संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः । ३७४
६. तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशाष्टाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थितिः । ३७६
७. जम्बूद्वीपलवणादयः४ शुभनामानो द्वीपसमुद्राः । ३७८
८. द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः । ३८०
९. तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः । ३८२
१०. भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि ।५ ३८४
११. तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो ६वर्षधरपर्वताः । ३८६
१२. हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः । ३८८
१३. मणिविचित्रपार्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः । ३९०
१४. पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरोका ह्रदास्तेषामुपरि । ३९२
१५. प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्धविष्कम्भो ह्रदः । ३९४
१६. दशयोजनावगाहः । ३९६
१७. तन्मध्ये योजनं पुष्करम् । ३९८
१८. तद्द्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च । ४००
१९. तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिषदत्काः । ४०२
२०. गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्ता-
रक्तोदाः

परिशिष्ट १ ३६९
३४. पुष्करार्धे च । ४३१
३५. प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्याः । ४३३
३६. आर्या म्लेच्छाश्च¹ । ४३४
३७. भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः । ४३६
३८. नृस्थिती परावरे² त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते । ४३८
३९. तिर्यग्योनिजानां³ च । ४४०
इति तृतीयोऽध्यायः ।
चौथा अध्याय
१. देवाश्चतुर्णिकायाः ।⁴ ४४२
२. आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ।⁵ ४४४
३. दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः । ४४६
४. इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदामरक्ष⁶लोकपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विषिकाश्चै-
कशः । ४४८
५. त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः । ४५०
६. पूर्वयोर्द्वीन्द्राः⁷ । ४५२
७. कायप्रवीचारा आ ऐशानात् । ४५४
८. शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः⁸ । ४५६
९. परेऽप्रवीचाराः । ४५८
१०. भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीपदिकुमाराः । ४६०
११. व्यन्तराः किंनरकिंपुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः । ४६२
१२. ज्योतिष्काः सूर्य्याचन्द्रमसौ¹⁰ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च¹¹ । ४६४
१३. मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके । ४६६
१४. तत्कृतः कालविभागः । ४६८
१५. बहिरवस्थिताः । ४७०
१६. वैमानिकाः । ४७२
१७. कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च । ४७४
१८. उपर्युपरि । ४७६
१९. सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रे¹²ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानत-
प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च¹³। ४७८
२०. स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः । ४८०
२१. गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः । ४८२
१. म्लिशश्च । त० भा०, हारिभ० । २. परापरे । त० भा० । ३. तिर्यग्योनीनां च त० भा० । ४. -श्चतु-
र्निकायाः त० भा० । ५. त० भा० में तृतीयः पीतलेश्यः ऐसा सूत्र है। ६. -पारिषद्यात्म०-त० भा० ।
७. त० भा० में इस सूत्र के आगे 'पीतान्तलेश्याः' सूत्र अधिक है। ८. त० भा० में द्वयोर्द्वयोः इतना पाठ
अधिक है। ९. गान्धर्व०-त० भा० । १०. सूर्य्यश्चन्द्रमसो । त० भा० । ११. प्रकीर्णतारकाश्च । त० भा० ।
१२. -ब्रह्मलोकलान्तकमहाशुक्रसहस्रारेष्वानत-त० भा० । १३. सर्वार्थसिद्धे च त० भा० ।
४७ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३७० सर्वार्थसिद्धि
२२. पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु¹। ४८४
२३. प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः। ४८६
२४. ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः²। ४८८
२५. सारस्वतादित्यवह्नयरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च³। ४९०
२६. विजयादिषु द्विचरमाः। ४९२
२७. औपपादिकमनुष्येभ्यः⁴ शेषास्तिर्यग्योनयः। ४९४
२८. स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिताः।⁵ ४९६
२९. सौधर्मेशानयोः सागरोपमेऽधिके।⁶ ४९८
३०. सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त।⁷ ५००
३१. त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु॑। ५०२
३२. आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ⁹ च। ५०४
३३. अपरा पल्योपममधिकम्¹⁰। ५०६
३४. परतः परतः पूर्वा पूर्वानन्तरा।¹¹ ५०८
३५. नारकाणां च द्वितीयादिषु। ५१०
३६. दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम्। ५१२
३७. भवनेषु च। ५१४
३८. व्यन्तराणां च। ५१६
३९. परा पल्योपममधिकम्। ५१८
४०. ज्योतिष्काणां च।¹² ५२०
४१. तदष्टभागोऽपरा।¹³ ५२२
४२. लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम्।¹⁴ ५२४
इति चतुर्थोऽध्यायः।
पाँचवां अध्याय
१. अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः। ५२६
२. द्रव्याणि।¹⁵ ५२८
३. जीवाश्च। ५३०
१. पीतमिश्र-पद्ममिश्रशुक्ललेश्या द्विद्विचतुश्चतुःशेषेषु इति त० भा० । २. लोकान्तिकाः त० भा० । ३.
व्याबाधमरुतोऽरिष्टाश्च । त० भा० । ४. औपपातिक-त० भा० । ५. इस एक सूत्र के स्थान पर त० भा० में
चार सूत्र हैं। वे इस प्रकार हैं:—स्थितिः॥२९॥ भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपममध्यर्धम्॥३०॥ शेषाणां
पादोने॥३१॥ असुरेन्द्रयोः सागरोपममधिकं च ॥३२॥ ६. त० भा० में इस एक सूत्र के स्थान पर 'सौध-
र्मादिषु यथाक्रमम् ॥३३॥ सागरोपमे ॥३४॥ अधिके ॥३५॥ ऐसे तीन सूत्र हैं। ७. त० भा० में 'सप्त
सानत्कुमारे' ऐसा सूत्र है। ८. त० भा० में 'विशेषत्रिसप्तदशैकादशपञ्चदशभिरधिकानि च' ऐसा सूत्र है।
९. सर्वार्थसिद्धे च त० भा० । १०. -मधिकं च त० भा० । ११. त० भा० में इस सूत्र के पूर्व दो सूत्र और
पाये जाते हैं। वे इस प्रकार हैं—सागरोपमे ॥४०॥ अधिके च॥४१॥ १२. ज्योतिष्काणामधिकम् त० भा०।
१३. इस सूत्रके स्थान पर त० भा० में निम्नलिखित सूत्र हैं:—ग्रहाणामेकम् ॥४९॥ नक्षत्राणामर्धम् ॥५०॥
तारकाणां चतुर्भागः ॥५१॥ जघन्या त्वष्टभागः ॥५२॥ चतुर्थभागः शेषाणाम् ॥५४॥ १४. त० भा० में यह
सूत्र नहीं है। १५. त० भा० में 'द्रव्याणि जीवाश्च' ऐसा दो सूत्रोंके स्थान पर एक सूत्र है।