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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

३६४ सर्वार्थसिद्धौ [ १०।९ ६९३८-
संख्येयगुणाः । जम्बूद्वीपसिद्धाः संख्येयगुणाः । धातकीखण्डसिद्धाः संख्येयगुणाः । पुष्करद्वोपार्ध-
सिद्धाः संख्येयगुणा इति । एवं कालादिविभागेऽपि यथागममल्पबहुत्वं वेदितव्यम् ॥१०॥
§ ९३८. स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यै-
र्जैनेन्द्रशासनवरामृतसार ता ।
५ सर्वार्थसिद्धिरिति सद्द्भिरुपात्तनामा
तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥१॥
तत्त्वार्थवृत्तिममुदितां विदितार्थतत्त्वाः
शृण्वन्ति ये परिपठन्ति च धर्मभक्त्या ।
हस्ते कृतं परमसिद्धिसुखामृतं तै-
१० र्मर्त्यामरेश्वरसुखेषु किमस्ति वाच्यम् ॥२॥
येनेदमप्रतिहतं सकलार्थतत्त्व-
मुद्द्योतितं विमलकेवललोचनेन ।
भक्त्या तमद्भुतगुणं प्रणमामि वीर-
माराद्धरामरगणार्चितपादपीठम् ॥३॥
१५ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां दशमोऽध्यायः समाप्तः ।
शुभं भवतु सर्वेषाम् ।
कालोदसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे जम्बूद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे धातकी खंड सिद्ध संख्यात-
गुणे हैं। इनसे पुष्करार्द्धद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार कालादिका विभाग करनेपर भी
आगमके अनुसार अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए ।
२० § ९३८. स्वर्ग और अपवर्गके सुखको चाहनेवाले आर्य पुरुषोंने इस तत्त्वार्थवृत्तिका सर्वार्थ-
सिद्धि यह नाम रखा है। यह जिनेन्द्रदेवके शासनरूपी अमृतका सार है, अतः मनःपूर्वक इसे
निरन्तर धारण करना चाहिए ॥१॥ सब तत्त्वोंके जानकार जो इस तत्त्वार्थवृत्तिको धर्मभक्तिसे
सुनते हैं और पढ़ते हैं मानो उन्होंने परम सिद्धिसुखामृतको अपने हाथमें ही कर लिया है, फिर,
चक्रवर्ती और देवेन्द्रके सुखके विषयमें तो कहना ही क्या है ॥२॥ जिन्होंने अपने विमल केवल-
२५ ज्ञानरूपी नेत्रके द्वारा इस निर्विवाद सकल तत्त्वार्थका प्रकाश किया है, मनुष्यों और देवोंके द्वारा
पूजित अद्भुतगुणवाले उन वीर भगवान् को भक्तिपूर्वक मैं प्रणाम करता हूँ ॥३॥
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
१. - द्वीपसिद्धाः मु० Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri