सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- १०।९ § ९३७ ] दशमोऽध्यायः ३६३
पुल्लिङ्गेनैव । अथवा निर्ग्रन्थलिङ्गेन । सग्रन्थलिङ्गेन वा सिद्धिर्भूतपूर्वनयापेक्षया । तीर्थेन,१ तीर्थ-
सिद्धिः द्वेधा, तीर्थंकरेतरविकल्पात् । इतरे द्विविधाः सति तीर्थंकरे सिद्धा असति चेति । चारित्रेण
केन सिध्यति । अव्यपदेशेनैकचतुःपञ्चविकल्पचारित्रेण वा सिद्धिः । स्वशक्तिपरोपदेशनिमित्त-
ज्ञानभेदात् प्रत्येकबुद्धबोधितविकल्पः । ज्ञानेन केन । एकेन द्वित्रिचतुर्भिश्च ज्ञानविशेषैः सिद्धिः ।
आत्मप्रदेशव्यापित्वमवगाहनम् । तद् द्विविधम्, उत्कृष्टजघन्यभेदात् । तत्रोत्कृष्टं पञ्चधनुःशतानि
पञ्चविंशत्युत्तराणि । जघन्यमर्धचतुर्थारत्नयो देशोनाः । मध्ये विकल्पाः । एकस्मिन्नवगाहे
सिध्यति । किमन्तरम् । सिध्यतां सिद्धानामनन्तरं२ जघन्येन द्वौ समयौ उत्कृष्टेनाष्टौ । अन्तरं
जघन्येनैकः समयः उत्कर्षेण षण्मासाः । संख्या, जघन्येन एकसमये एकः सिध्यति । उत्कर्षेणा-
ष्टोत्तरशतसंख्याः । क्षेत्रादिभेदभिन्नानां परस्परतः संख्याविशेषोऽल्पबहुत्वम् । तद्यथा-प्रत्युत्पन्न-
नयापेक्षया सिद्धिक्षेत्रे सिध्यन्तीति नास्त्यल्पबहुत्वम् । भूतपूर्वनयापेक्षया तु चिन्त्यते, क्षेत्रसिद्धा
द्विविधा-जन्मतः संहरणतश्च । तत्राल्पे संहरणसिद्धाः । जन्मसिद्धाः संख्येयगुणाः । क्षेत्राणां
विभागः कर्मभूमिरकर्मभूमिः समुद्रो द्वीप ऊर्ध्वमधस्तिर्यगिति । तत्र स्तोका ऊर्ध्वलोकसिद्धाः ।
अधोलोकसिद्धाः संख्येयगुणाः । तिर्यग्लोकसिद्धाः संख्येयगुणाः । सर्वतः स्तोकाः समुद्रसिद्धाः ।
द्वीपसिद्धाः संख्येयगुणाः । एवं तावदविशेषेण । सर्वतः स्तोका लवणोदसिद्धाः । कालोदसिद्धाः
अपेक्षा पुलिंगसे ही सिद्धि होती है अथवा निर्ग्रन्थलिंगसे सिद्धि होती है । भूतपूर्वनयकी अपेक्षा सग्रन्थ
लिंगसे सिद्धि होती है । तीर्थ-तीर्थसिद्धि दो प्रकारकी है-तीर्थंकरसिद्ध और इतरसिद्ध । इतर
दो प्रकारके हैं, कितने ही जीव तीर्थंकरके रहते हुए सिद्ध होते हैं और कितने ही जीव तीर्थंकरके
अभावमें सिद्ध होते हैं । चारित्र-किस चारित्रसे सिद्धि होती है ? नामरहित चारित्रसे सिद्धि होती
है या एक, चार और पाँच प्रकारके चारित्रसे सिद्धि होती है ! प्रत्येकबुद्ध-बोधितबुद्ध-अपनी
शक्ति रूप निमित्तसे होनेवाले ज्ञानके भेदसे प्रत्येकबुद्ध होते हैं और परोपदेश रूप निमित्तसे होने-
वाले ज्ञानके भेदसे बोधितबुद्ध होते हैं, इस प्रकार ये दो प्रकारके हैं । ज्ञान-किस ज्ञानसे सिद्धि
होती है । एक, दो, तीन और चार प्रकारके ज्ञानविशेषोंसे सिद्धि होती है । अवगाहना-आत्म-
प्रदेशमें व्याप्त करके रहना इसका नाम अवगाहना है । वह दो प्रकारकी है-जघन्य और उत्कृष्ट ।
उत्कृष्ट अवगाहना पाँच सौ पचीस धनुष है और जघन्य अवगाहना कुछ कम साढ़े तीन अरत्नि
है । बीचके भेद अनेक हैं । किसी एक अवगाहनामें सिद्धि होती है । अन्तर-क्या अन्तर है ?
सिद्धिको प्राप्त होनेवाले सिद्धोंका जघन्य अनन्तर दो समय है और उत्कृष्ट अनन्तर आठ समय है ।
जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । संख्या-जघन्य रूपसे एक
समयमें एक जीव सिद्ध होता है और उत्कृष्ट रूपसे एक समयमें एक सौ आठ जीव सिद्ध होते हैं ।
अल्पबहुत्व-क्षेत्रादि भेदोंकी अपेक्षा भेदको प्राप्त हुए जीवोंकी परस्पर संख्याका विशेष प्राप्त
करना अल्पबहुत्व है । यथा-वर्तमान नयकी अपेक्षा सिद्धिक्षेत्रमें सिद्ध होनेवाले जीवोंका अल्प-
बहुत्व नहीं है । भूतपूर्व नयकी अपेक्षा विचार करते हैं-क्षेत्रसिद्ध जीव दो प्रकारके हैं-जन्मसिद्ध
और संहरणसिद्ध । इनमेंसे संहरणसिद्ध जीव सबसे अल्प हैं। इनसे जन्मसिद्ध जीव संख्यातगुणे
हैं । क्षेत्रोंका विभाग इस प्रकार है-कर्मभूमि, अकर्मभूमि, समुद्र, द्वीप, ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और
तिर्यग्लोक । इनमें से ऊर्ध्वलोकसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे अधोलोक सिद्ध संख्यातगुणे हैं, इनसे
तिर्यग्लोकसिद्ध संख्यातगुणे हैं। समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे द्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। यह
सामान्य रूपसे कहा है । विशेष रूपसे विचार करनेपर लवण समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे
१. तीर्थेन केन तीर्थेन सिद्धिः मु० । २. सिद्धानामन्तरं मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri