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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 558 में से

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पृष्ठ 473

आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च ॥ ७ ॥
§ ९३२. पूर्वसूत्रे^१ विहितानां हेतूनामत्रोक्तानां दृष्टान्तानां च यथासंख्यमभिसंबन्धो भवति ।
तद्यथा—कुलालप्रयोगापादितहस्तदण्डचक्रसंयोगपूर्वकं भ्रमणम् । उपरतेऽपि तस्मिन्पूर्वप्रयोगादा-
संस्कारक्षयाद् भ्रमति । एवं भवस्थेनात्मनापवर्गप्राप्तये बहुशो यत्प्रणिधानं तदभावेऽपि तदावेश-
पूर्वकं मुक्तस्य गमनमवसीयते । किं च, असङ्गत्वात् । यथा मृत्तिकालेपजनितगौरवमलाबुद्रव्यं ५
जलेऽधःपतितं जलक्लेदविशिष्टमृत्तिकाबन्धनं लघु सत्तूर्ध्वमेव गच्छति तथा कर्मभाराक्रान्तिवशी-
कृत आत्मा तदावेशवशात्संसारे अनियमेन गच्छति । तत्सङ्गविमुक्त^२स्तूर्ध्वमेवोपयाति । किं च,
बन्धच्छेदात् । यथा बीजकोशबन्धच्छेदादेरण्डबीजस्य गतिर्दृष्टा तथा मनुष्यादिभवप्रापकगतिजाति-
नामादिसकलकर्मबन्धच्छेदान्मुक्तस्य ऊर्ध्वगतिरवसीयते । किं च, तथागतिपरिणामात् । यथा
तिर्यक्प्लवनस्वभावसमीरणसंबन्धनिरुत्सुका प्रदीपशिखा स्वभावादुत्पतति तथा मुक्तात्मापि १०
नानागतिविकारकारणकर्मनिर्वारणे सत्यूर्ध्वगतिस्वभावोऽ^३दूर्ध्वमेवारोहति ।
§ ९३४. आह, यदि मुक्त ऊर्ध्वगतिस्वभावो लोकान्तादूर्ध्वमपि कस्मान्नोत्पततीत्यत्रोच्यते—
धर्मास्तिकायाभावात् ॥ ८ ॥
घुमाये गये कुम्हारके चक्रके समान, लेपसे मुक्त हुई तूमड़ीके समान, एरण्डके बीजके
समान और अग्निकी शिखाके समान ॥७॥ १५
§ ९३३. पिछले सूत्रमें कहे गये सूत्रोंका और इस सूत्रमें कहे गये दृष्टान्तोंका क्रमसे सम्बन्ध
होता है । यथा—कुम्हारके प्रयोगसे किया गया हाथ, दण्ड और चक्रके संयोगपूर्वक जो भ्रमण
होता है उसके उपरत हो जानेपर भी पूर्व प्रयोगवश संस्कारका क्षय होने तक चक्र घूमता रहता
है । इसी प्रकार संसारमें स्थित आत्माने मोक्षकी प्राप्तिके लिए जो अनेक बार प्रणिधान किया है
उसका अभाव होनेपर भी उसके आवेश पूर्वक मुक्त जीवका गमन निश्चित होता है। असंगतवात्— २०
जिस प्रकार मृत्तिकाके लेपसे तूमड़ीमें जो भारीपन आ जाता है उससे जलके नीचे पड़ी हुई तूमड़ी
जलसे मिट्टीके गीले हो जानेके कारण बन्धनके शिथिल होनेसे शीघ्र ही ऊपर ही जाती है उसी
प्रकार कर्मभारके आक्रमणसे आधीन हुआ आत्मा उसके आवेशवश संसारमें अनियमसे गमन करता
है किन्तु उसके संगसे मुक्त होनेपर ऊपर ही जाता है। बन्धच्छेदात्—जिस प्रकार बीजकोषके
बन्धनके टूटनेसे एरण्ड बीजकी ऊर्ध्व गति देखी जाती है उसी प्रकार मनुष्यादि भवको प्राप्त २५
करानेवाले गतिनाम और जातिनाम आदि समस्त कर्मोंके बन्धका छेद होनेसे मुक्त जीवकी ऊर्ध्व-
गति जानी जाती है। तथागतिपरिणामात्—जिस प्रकार तिर्यग्वहन स्वभाववाले वायुके सम्बन्धसे
रहित प्रदीपशिखा स्वभावसे ऊपरकी ओर गमन करती है उसी प्रकार मुक्त आत्मा भी नानागति
रूप विकारके कारणभूत कर्मका अभाव होनेपर ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे ऊपरकी ओर ही आरोहण
करता है। ३०
§ ९३४. कहते हैं कि यदि मुक्तजीव ऊर्ध्व गति स्वभाववाला है तो लोकान्तसे ऊपर भी
किस कारणसे नहीं गमन करता है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
धर्मास्तिकायका अभाव होनेसे मुक्त जीव लोकान्तसे और ऊपर नहीं जाता ॥८॥
१. पूर्वसूत्रोदितानां-मु० । २. -विप्रमुक्तौ तूपर्येवोप-मु० । -विमुक्ते तूपर्येवोप-ता० । -विमुक्तोऽत्र-दि० १,
दि० २ । ३. -भावत्वादू-मु० । ३५
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri