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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 558 में से

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पृष्ठ 472
३६०सर्वार्थसिद्धौ[ १०।५ § ९२८-

ज्ञानदर्शनाविनाभावित्वादनन्तवीर्यादीनामविशेषः, अनन्तसामर्थ्यहीनस्यानन्तावबोधवृत्त्यभावाज्ज्ञान-
¹मयत्वाच्च सुखस्येति। अनाकारत्वान्मुक्तानामभाव इति चेन्न; अतीतानन्तरशरीराकारत्वात्।
§ ९२८. स्यान्मतं, यदि शरीरानुविधायी जीवः, तदभावात्स्वाभाविकलोकाकाशप्रदेशपरि-
माणत्वात्तावद्विसर्पणं प्राप्नोतीति। नैष दोषः। कुतः। कारणाभावात्। नामकर्मसंबन्धो हि
संहरणविसर्पणकारणम्। तदभावात्पुनः संहरणविसर्पणाभावः।
§ ९२९. यदि कारणाभावान्न संहरणं न विसर्पणं तर्हि गमनकारणाभावादूर्ध्वगमनमपि न
प्राप्नोति अधस्तिर्यग्गमनाभाववत्, ततो यत्र मुक्तस्तत्रैवावस्थानं प्राप्नोतीति। अत्रोच्यते—
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्या लोकान्तात् ॥ ५ ॥
§ ९३०. तस्यानन्तरम्। कस्य। सर्वकर्मविप्रमोक्षस्य। आङ्भिविध्यर्थः। ऊर्ध्वं गच्छत्या
लोकान्तात्।
§ ९३१. अनुपदिष्टहेतुकमिदमूर्ध्वगमनं कथमध्यवसातुं शक्यमित्यत्रोच्यते—
पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद् बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च ॥ ६ ॥
§ ९३२. आह, हेत्वर्थः पुष्कलोऽपि दृष्टान्तसमर्थनमन्तरेणाभिप्रेतार्थसाधनाय नालमित्य-
त्रोच्यते—
समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि ज्ञानदर्शनके अविनाभावी अनन्तवीर्य आदिक भी सिद्धोंमें
अवशिष्ट रहते हैं। क्योंकि अनन्त सामर्थ्यसे हीन व्यक्तिके अनन्तज्ञानकी वृत्ति नहीं हो सकती और
सुख ज्ञानमय होता है। शंका—अनाकार होनेसे मुक्त जीवोंका अभाव प्राप्त होता है। समाधान—
नहीं। क्योंकि उनके अतीत अनन्तर शरीरका आकार उपलब्ध होता है।
§ ९२८. शंका—यदि जीव शरीरके आकारका अनुकरण करता है तो शरीरका अभाव
होनेसे उसके स्वाभाविक लोकाकाशके प्रदेशोंके बराबर होनेके कारण जीव तत्प्रमाण प्राप्त होता
है। समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जीवके तत्प्रमाण होनेका कोई प्रमाण नहीं उपलब्ध
होता। नामकर्मका सम्बन्ध जीवके संकोच और विस्तारका कारण है किन्तु उसका अभाव हो जाने
से जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार नहीं होता।
§ ९२९. यदि कारणका अभाव हो जानेसे जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार नहीं
होता तो गमनके कारणका अभाव हो जानेसे जिस प्रकार यह जीव तिरछा और नीचेकी ओर
गमन नहीं करता है उसी प्रकार उसका ऊर्ध्वगमन भी नहीं प्राप्त होता है। इसलिए जिस
स्थानपर मुक्त होता है उसी स्थानपर उसका अवस्थान प्राप्त होता है, ऐसी शंकाके होनेपर
आगेके सूत्र द्वारा उसका समाधान करते हैं।
तदनन्तर मुक्त जीव लोकके अन्त तक ऊपर जाता है ॥५॥
§ ९३०. उसके अनन्तर। शंका—किसके? समाधान—सब कर्मोंके वियोग होनेके। सूत्रमें
'आङ्' पद अभिविधि अर्थमें आया है। लोकके अन्त तक ऊपर जाता है।
§ ९३१. जीव ऊर्ध्वगमन क्यों करता है इसका कोई हेतु नहीं बतलाया, इसलिए इसका
निश्चय कैसे होता है अतः इसी बातका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पूर्वप्रयोगसे, संगका अभाव होनेसे, बन्धनके टूटनेसे और वैसा गमन करना स्वभाव होनेसे
मुक्त जीव ऊर्ध्वगमन करता है ॥६॥
§ ९३२. कहते हैं, पुष्कल भी हेतु दृष्टान्त द्वारा समर्थनके बिना अभिप्रेत अर्थकी सिद्धि
करनेमें समर्थ नहीं होते इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. -मयपर्यायत्वाच्च मु०, ता० । २. अतीतानन्तशरी-मु० । ३. -कर्मसंसर्गो हि ता० ।