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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( १७७ )
सुखलाभाभावादपुरुषार्थत्वमिति चेन्नद्वैवि-
ध्यात् ॥६॥
अर्थ-जबकि किसी को भी सुख प्राप्त नहीं होता तो मुक्ति
के वास्ते उपाय करना निष्फल है, क्योंकि मुक्ति में भी सुख नहीं
प्राप्त हो सकता, ऐसा न समझना चाहिये । सुख भी दो प्रकार
के हैं-एक मोक्ष है, वह सुख और प्रकार का है, उसमें किसी प्रकार
के दुःख का मेल नहीं है। दूसरा सांसारिक सुख है, वह और ही
प्रकार का है, क्योंकि उस में दुःख मिले हुये रहा करते हैं ।
निगुर्णत्वमात्मनोऽसङ्गत्वदिश्रुतेः ॥१०॥
अर्थ-मुक्ति अवस्था में आत्मा निर्गुण रहता है । सांसा-
रिक दशा में लौकिक सुख आत्मा को बाधा पहुँचाते हैं मुक्ति
अवस्था में आत्मा को असंग अर्थात् विकृति के संग से रहित
श्रुतियों द्वारा सुना गया है ।
परधर्मत्वेऽपि तत्सिद्धिरविवेकात् ॥११॥
अर्थ-यद्यपि सांसारिक दशा में गुणों का सर्वदा पुरुष में
ही बोध होता है, परन्तु उस प्रकार का बोध अविवेक से पैदा
होता है, क्योंकि जो अविवेकी है वही सांसारिक कर्मों को पुरुष-
कृत मानते हैं, परन्तु वास्तव में वह प्रकृति और पुरुष के संयोग
से होते हैं ; इसलिये संयोगजन्य हैं ।
अनादिरविवेकोऽन्यथा दोषद्वयप्रसक्तेः ॥१२॥
अर्थ-अविवेक को प्रवाहरूप से अनादि मानना चाहिये,
यदि सादि मानोगे तो यह प्रश्न उत्पन्न होगा कि उसको किसने
पैदा किया ? यदि प्रकृति और पुरुष से पैदा हुआ तब उनसे ही
पैदा हुआ और उनका ही बंध करे, यह दोष होगा । दूसरा यह

( १७८ )
प्रश्न हो सकता है—यदि कर्मों से इसकी उत्पत्ति मानें तो इस
प्रश्न को अवकाश मिलता है कि कर्म किससे उत्पन्न हुये हैं;
इसलिये इन दोनों दोषों के दूर करने के लिये अविवेक को
अनादि मानना चाहिये ।
न नित्यः स्यादात्मवदन्यथानुच्छित्तिः ॥१३॥
अर्थ—अविवेक नित्य नहीं हो सकता । यदि नित्य ही
माना जायगा तो उसका नाश हो सकेगा; जैसे—आत्मा का
नाश नहीं होता है और उस अविवेक के नाश न होने से मुक्ति
न हो सकेगी, इसलिये अविवेक को प्रवाहरूप से अनादि
( अनित्य ) मानना चाहिये ।
प्रतिनियतकारणनाश्यत्वमस्य ध्वान्तवत् ॥१४॥
अर्थ—यह अविवेक भी प्रतिनियत कारण से नाश हो जाता
है, इसलिये अनित्य है; जैसे—अँधेरा प्रकाश रूप प्रतिनियत
कारण से नाश हो जाता है, इसलिये वह अविवेक नित्य नहीं
हो सकता ।
प्र०—प्रतिनियत कारण किसको कहते हैं ?
उ०—जिससे उस कार्य की उत्पत्ति वा नाश होजाय, जैसा—
अन्धेरे के दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये ।
अत्रापि प्रतिनियमोऽन्वयव्यतिरेकात् ॥१५॥
अर्थ—इस अविवेक के नाश करने में भी प्रतिनियत ( जिस
से अवश्य नाश हो जाय ) अन्वय व्यतिरेक से निश्चय कर लेना
चाहिये । वह अन्वय यही है कि विवेक के होने से इसका नाश
और विवेक के न होने से अविवेक का होना प्रतीत होता है, यही
अन्वय व्यतिरेक कहने का तात्पर्य है ।

( १७६ )
प्रकारान्तरासम्भवादविवेक एव बंधः ॥१६॥
अर्थ—सिवाय अविवेक के जब कोई और प्रकार बन्ध में
हेतु नहीं दीखता तो ऐसा मानना ही ठीक है कि अविवेक ही
बन्ध है और विवेक ही मोक्ष है। कोई वादी इन तीन सूत्रों से
जोकि आगे कहे जायेंगे मुक्ति सम्बन्ध में पूर्व-पक्ष करता है।
प्र०—न मुक्तस्य पुनर्बन्धयोगोऽप्यनावृत्ति-
श्रुत्तेः ॥ १७ ॥
अर्थ—मुक्त को फिर बन्ध योग नहीं होता अर्थात् जो मुक्त
हो चुका है वह फिर नहीं बंध सकता है ; क्योंकि “नस पुनरा-
वर्त्तते” ( वह फिर नहीं आता है )। इम श्रुति से मुक्त होने पर
नहीं आता, ऐसा सिद्ध होता है।
अपुरुषार्थत्वमन्यथा ॥ १८ ॥
अर्थ—यदि मुक्त का बन्ध योग माना जाय तो अपुरुषार्थत्व
सिद्ध होता है।
अविशेषापत्तिरुभयोः ॥ १६ ॥
अर्थ—बद्ध और मुक्त में अविशेषापत्ति अर्थात् बराबरी
प्राप्त होती है ; क्योंकि जो मुक्त नहीं है वह अब बँधा हुआ है
और जो मुक्त हो जायगा उसको फिर बन्ध प्राप्त हो जायगा।
उ०—मुक्तिरन्तरायध्वस्तेर्न परः ॥ २० ॥
अर्थ—जिस प्रकार कि मुक्ति का वादी ने पूर्व-पक्ष किया,
उस प्रकार की मुक्ति को आचार्य नहीं मानते, किन्तु अन्तरायों के
( विघ्नों के ) ध्वंस ( नाश ) हो जाने के सिवाय और किसी
प्रकार की मुक्ति आचार्य नहीं मानते।

--- अर्थ- ऊ . . . न किया वह योग्य
नहीं, क्योंकि वेदों म अनन्ता . . . को भी पुनरावृत्ति
लिखी है कि मुक्त फिर लौट आता है । शङ्कराचार्य ने भी इस
श्रुति का अर्थ इस कल्प में लौटना माना है ; इसलिये मुक्ति से
फिर बँधता नहीं, ऐसा कहना योग्य नहीं हो सकता । दूसरा
यह जो दोष कहा कि पुनर्बन्ध होने से बद्ध मुक्त दोनों बराबर हो
जायेंगे, सो भी योग्य नहीं ; क्योंकि जो मनुष्य रोगी है उसकी
बराबरी नीरोगी के साथ किसी प्रकार नहीं हो सकती और जो
नीरोगी है वह भी कालान्तर ( कुछ दिनों के बाद ) में रोगी हो
सकता है ; परन्तु यह विचार करके यह भविष्यत् ( अगाड़ी के
समय में ) रोगी होगा, अतः रोगी के ही बराबर है, उसके
साथ भी रोगी का-सा व्यवहार नहीं कर सकते । इसलिये न तो
मुक्त की पुनरावृत्ति मानने से श्रुति से विरोध प्राप्त होता है और
न युक्ति से ही विरोध होता है ।
अधिकारित्रैविध्यान्न नियमः ॥ २२ ॥
अर्थ—उत्तम, मध्यम, अधम, तीन प्रकार के अधिकारी होते
हैं, इस कारण यह कोई नियम नहीं है कि श्रवण, मनन आदि
संयोगों से सबही की मुक्ति हो ।
दाढर्यार्थमुत्तरेषाम् ॥ २३ ॥
अर्थ—जो अज्ञ हैं उनको दृढ़ता के लिये उचित है कि
श्रवण, मनन आदि योग के अंगों का अनुष्ठान करें तो कुछ
दिनों के बाद मुक्ति को प्राप्त हो सकेंगे।
स्थिरसुखमासनमिति न नियमः ॥ २४ ॥
अर्थ—जिसमें सुख स्थिर हो वोही आसन है, इस बात को

( १८१ )
पहिले कह आये हैं, अतः पद्मासन, मयूरासन इत्यादिक भी मोक्ष
के साधन हैं, या योग के अङ्गों में उनकी गिनती है, यह नियम
नहीं है।
ध्यानं निर्विषयं मनः ॥ २५ ॥
अर्थ—जिसमें मन निर्विषय हो जाय उसी का नाम ध्यान
है, और यह ध्यान ही समाधि का लक्षण है। अब समाधि
और सुषुप्ति के भेद को दिखाते हैं।
उभयथाप्यविशेषश्चैन्नैवमुपरागनिरोधाद्विशेषः२६
अर्थ—समाधि और सुषुप्ति इन दोनों में अविशेष अर्थात्
समानता है, ऐसा नहीं कहना चाहिये। क्योंकि समाधि में
उपराग ( विषय-वासना ) को रोकना पड़ता है, इसलिए सुषुप्ति
की अपेक्षा समाधि विशेष है।
निःसंगेऽप्युरागोऽविवेकात् ॥ २७ ॥
अर्थ—यद्यपि पुरुष निःसंग है तथापि अविवेक के कारण
उसमें विषयों की वासनाएं मननी चाहियें।
जवास्फटिकयोखिनोपरागःकिन्त्वभिमानः॥२८॥
अर्थ—जैसे जवा का फूल और स्फटिकमणि को धोरे रखने
से उपराग होता है, वैसा उपराग पुरुष में नहीं है, किंतु
अविवेक के कारण से पुरुष में विषय-वासनाओं का अभिमान
कहना चाहिये।
ध्यानधारणाभ्यासवैराग्यादिभिस्तन्निरोधः ॥२९
अर्थ—ध्यान, धारणा, अभ्यास, वैराग्य आदिकों से विषय-
वासनाओं का निरोध ( रुकावट ) हो सकता है।

( १८२ )
लयविक्षेपयोर्व्यावृत्त्येत्याचार्याः ॥ ३० ॥
अर्थ—लय ( सुषुप्ति ) विक्षेप ( स्वप्न इन दोनों अवस्थाओं
के निवृत्त होने से विषय-वासनाओं का निरोध हो जाता है, यह
आचार्यों का मत है ।
न स्थाननियमश्चित्तप्रसादात् ॥ ३१ ॥
अर्थ—समाधि आदि के करने के वास्ते स्थान का कोई
नियम नहीं है, जहाँ चित्त प्रसन्न हो वहीं समाधि हो सकती है।
प्रकृतेराद्योपादानतान्येषां कार्यत्वश्रुतेः ॥ ३२ ॥
अर्थ—उपादान कारण प्रकृति को ही माना है, महदादिकों को
प्रकृति का कार्य माना है ।
नित्यत्वेऽपि नात्मनो योग्यत्वा भावात् ॥ ३३ ॥
अर्थ—आत्मा नित्य भी है तो भी उसको उपादान कारण
कहना केवल भूल है। क्योंकि जो बातें उपादान कारण में होती
हैं वे बातें आत्मा में नहीं दीखतीं ( स्पष्ट भाव यह है ) यदि
आत्मा ही सबका उपादान कारण होती तो पृथिवी आदि सब
चैतन्य होने चाहिये थे ; परन्तु यह बात देखने में नहीं आती ।
श्रुतिविरोधान्न कुतर्कापसदस्यात्मलाभः ॥३४॥
अर्थ—जो मनुष्य श्रुतियों के विरोध से आत्मा के संबंध में
कुतर्क ( खोटे प्रश्न ) करते हैं उनको किसी प्रकार आत्मा का
ज्ञान नहीं होता है ।
पारम्पर्येऽपि प्रधानानुवृत्तिरणुवत् ॥ ३५ ॥
अर्थ—परम्परा सम्बन्ध से भी प्रकृति को ही सबका कारण
मानना चाहिये ; जैसे—घटादिकों के कारण अणु हैं और अणुओं

( १८३ )
का कारण परमाणु है, इसी तरह परम्परा सम्बन्ध से भी सबका
कारण प्रकृति ही है ।
सर्वत्र कार्यदर्शनाद्विभुत्वम् ॥ ३६ ॥
अर्थ—प्रकृति के कार्य सब जगह दीखते हैं इस कारण प्रकृति
विभु है ।
गतियोगेऽप्याद्यकारणताहानिरणुवत् ॥ ३७ ॥
अर्थ—यद्यपि शरीर में गमनादि क्रियाओं का योग है तो भी
उसका आद्य कारण ( पहिला सबब ) अवश्य मानना होगा ;
जैसे—अणु यद्यपि सूक्ष्म हैं तथापि उनका कारण अवश्य ही
माना जाता है ।
प्रसिद्धाधिक्यं प्रधानस्य न नियमः ॥ ३८ ॥
अर्थ—प्रसिद्धता तो प्रकृति को दीखती है, इससे अधिक
द्रव्यों को मानने का नियम ठीक नहीं है, क्योंकि कोई तो नौ
द्रव्य मानते हैं, कोई सोलह द्रव्य मानते हैं, इस कारण उनका
कोई नियम ठीक नहीं है, और प्रकृति के सब कार्य दीख रहे हैं ;
इसलिये उसके ही कारण मानना चाहिये ।
सत्वादीनामतद्धर्मत्वं तद्रू पत्वात् ॥ ३६ ॥
अर्थ—सत्व, रज, तम, यह प्रकृति के धर्म नहीं हैं, किंतु प्रकृति
के रूप हैं। सत्यादि रूप ही प्रकृति है ।
अनुपभोगेऽपि पुमर्थं सृष्टिःप्रधानस्योष्ट्रकुंकुम
वहनवत् ॥ ४० ॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति अपनी सृष्टि का आप भोग नहीं करती
तथापि उसकी सृष्टि पुरुष के लिये है ; जैसे—ऊँट अपने स्वामी के
लिये केशर को लेजाता है, ऐसे ही प्रकृति भी सृष्टि करती है ॥

( १८४ )
कर्मवैचित्र्यात् सृष्टिवैचित्र्यम् ॥४१॥
अर्थ—प्रत्येक मनुष्य के कर्मों की वासनायें भिन्न-भिन्न प्रकार
की होती हैं, इसी कारण से प्रकृति की सृष्टि भी अनेक प्रकार
की होती है, एक-सी नहीं होती है ।
साम्यवैषम्याभ्यां कार्यद्वयम् ॥४२॥
अर्थ—समता और विषमता के कारण उत्पत्ति और प्रलय
होते हैं। जब प्रकृति की समता होती है तब उत्पत्ति, और जब
विषमता होती है, तब प्रलय होता है। यही बात संसार में दीख
रही है कि जिन दो औषध ( दवाइयों ) को बराबर भाग मिलाकर
यदि खाया जाता है तो लाभ होता है और कमती-बढ़ती मिला-
कर खाने से बिगाड़ होता है ।
विमुक्तबोधान्न सृष्टिः प्रधानस्य लोकवत् ॥४३॥
अर्थ—जब प्रकृति को इस बात का ज्ञान हो जाता है यह पुरुष
मुक्त हो गया, फिर उसके वास्ते सृष्टि को नहीं करती है, यह बात
लोक के समान समझनी चाहिये ; जैसे—कोई मनुष्य किसी को
बंधन में से छुड़ाने का उपाय करता है, जब वह उसको उस बंधन
से छुड़ा देता है तो उस उपाय से निश्चिन्त हो बैठता है ; क्योंकि
जिसके लिये उपाय किया था वह कार्य पूरा होगया ।
अन्योपसर्पणेऽपि मुक्तोपभोगो निमित्ता-
भावात् ॥४४॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति अविवेकियों को बद्ध करती है, परन्तु
मुक्त को बद्ध नहीं करती ; क्योंकि जिस निमित्त से प्रकृति अविवे-
कियों को बद्ध करती थी वह अविवेक जीवों में नहीं रहता है ।

( १८५ )
पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः ॥४५॥
अर्थ—जीव बहुत हैं; क्योंकि प्रत्येक शरीर में उनकी अलग-
अलग व्यवस्था होती है ।
उपाधिश्चेत् तत्सिद्धौ पुनर्द्वैतम् ॥४६॥
अर्थ—यदि ऐसा कहा जाय कि सूर्य एक है, परन्तु उसकी
छाया के अनेकों स्थानों में पड़ने से अनेक सूर्य दीखने लगते हैं;
इसी प्रकार ईश्वर एक है किंतु शरीररूपी उपाधियों के होने
से अनेकता है तो भी ऐसा कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि जो एक
ब्रह्म के सिवाय और दूसरे को मानते ही नहीं है यदि वह लोग
ब्रह्म और उपाधि को मानेंगे तो अद्वैतवाद न रहेगा, किंतु द्वैतवाद
होजायगा ।
द्वाभ्यामपि प्रमाणविरोधः ॥४७॥
अर्थ—यदि दोनों ही मानें तो प्रमाण से विरोध होता है,
क्योंकि यदि उपाधि को सत्य मानें तो जिन प्रमाणों से अद्वैत की
सिद्धि करते हैं उनसे विरोध होगा। यदि उपाधि को मिथ्या मानें
तो जिन प्रमाणों से उपाधि को सिद्ध करते हैं उनसे विरोध
होगा। अब इस विषय पर आचार्य अपना मत कहते हैं:—
द्वाभ्यामप्यविरोधान्न पूर्व्वमुत्तरं च साधकाभा-
वात् ॥४८॥
द्वैत, अद्वैत इन दोनों से हमारा कोई विरोध नहीं है; क्योंकि
ईश्वर अद्वैत तो इसलिये है कि उसके बराबर और कोई नहीं
है। द्वैत इसवास्ते है कि जीव और प्रकृति के गुण ईश्वर की
अपेक्षा और प्रकार के मालूम होते हैं, इसवास्ते ऐसा न कहना

( १८६ )
चाहिये कि पहिला पक्ष सत्य है वा दूसरा ; क्योंकि एक पक्ष
की पुष्टि करने वाला कोई प्रमाण नहीं दीखता, किन्तु जीव और
ईश्वर के पार्थक्य सिद्ध करने वाले प्रमाण दीखते हैं ।
प्रकाशतस्तत्सिद्धौ कर्मकर्तृविरोधः ॥४९॥
अर्थ—ब्रह्म प्रकाशस्वरूप है इसलिये जो चाहे सो कर
सकता है अर्थात् चाहे तो घटादि रूप हो जाय । इस प्रमाण से
यदि ब्रह्म को घटादि रूप कहकर अद्वैतवाद की सिद्धि की जाय तो
कर्त्ता और कर्म का विरोध होगा ; क्योंकि ऐसा कहीं नहीं देखने
में आता कि कर्त्ता कर्म हो गया हो ; जैसे—घट का कर्त्ता कुम्हार
है और उस कुम्हार का कर्म घट ( घड़ा ) है, तो दोनों को भिन्न-
भिन्न पदार्थ मानना होगा, ऐसा नहीं कह सकते कि कुम्हार ही
घट है ।
जड़व्यावृत्तो जड़ं प्रकाशयति चिद्रूपः ॥५०॥
अर्थ—जीव जड़ पदार्थों में मिलकर उनको भी प्रकाश कर
देता है, इसवास्ते वह प्रकाशस्वरूप है ; क्योंकि यदि जीव में
प्रकाश करने की शक्ति न होती तो शरीर में गमनादिक क्रियायें
न हो सकती थीं ।
न श्रुतिविरोधो रागिणां वैराग्याय तत्सिद्धेः ॥५१
अर्थ—जिन श्रुतियों से अद्वैत की सिद्धि होती है उनसे, और
जो द्वैत को सिद्ध करती हैं उनसे कुछ भी विरोध न होगा ;
क्योंकि जो ईश्वर को छोड़कर जीव वा शरीर को ईश्वर मानते हैं
उनको समझाने के लिये वे श्रुतियाँ हैं अर्थात् ईश्वर को उन
श्रुतियों में अद्वैत अद्वितीय एक आदि विशेषणों से इसलिय
कहा है कि उसके समान दूसरा और कोई नहीं है ; अतः द्वैत
के मानने से श्रुतियों से विरोध नहीं होता ।

सूत्र का आशय पहिले अध्याय में कह आये हैं, इसलिये विस्तार

( १८७ )
जगत् सत्यत्वम दुष्टाकारण जन्यत्वाद् बाधका
भावात् ॥ ५२ ॥
अर्थ—जगत् सत्य है, क्योंकि इसका कारण नित्य है और
किसी समय में भी इसका बाध ( रोक ) नहीं दीखता है । इस
सूत्र का आशय पहिले अध्याय में कह आये हैं, इसलिये विस्तार
नहीं किया है ।
प्रकारान्तरासम्भवात् सदुत्पत्तिः ॥५३॥
अर्थ—जबकि प्रकृति के सिवाय और कोई कारण इसका
दीखता नहीं, तो ऐसा कहना चाहियं कि इसकी उत्पत्ति असत्
पदार्थ से नहीं है, किन्तु सत् पदार्थ से ही है ।
अहङ्कारः कर्त्ता न पुरुषः ॥५४॥
अर्थ—संकल्प-विकल्प आदियों का कर्त्ता अहङ्कार है, किन्तु
जीव नहीं है ; क्योंकि जो विचार बुद्धि में उत्पन्न होता है उसके
बाद मनुष्य कार्यों के करने में लगता है और उस बुद्धि को
पुरुष का प्रतिबिम्ब ही प्रकाश करता है ।
चिदवसाना भुक्तिस्तत्कर्मार्जितत्वात् ॥५५॥
अर्थ—जिसका अन्त जीव में हो उसको भोग कहते हैं, वे
भोग जीव के कर्मों से होते हैं, इस कारण भोगों का अन्त जीव
में मानना चाहिये ।
चन्द्रादिलोकेऽप्यावृत्तिर्निमित्तसद्भावात् ॥५६॥
अर्थ—चन्द्रलोक के जीवों में भी आवृत्ति दीखती हैं, क्योंकि
जिस निमित्त से मुक्ति और बन्ध होते हैं वह वहां के जीवों में
भी बराबर ही दीखते हैं । भाव यह है कि चन्द्रादि लोकों के

( १८८ )
रहनेवाले जीव भी एक बार मुक्त होकर फिर कभी बन्धन में नहीं
पड़ते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है; किन्तु वहाँ के भी मुक्त जीव
लौट आते हैं, क्योंकि वह चन्द्रादिक लोक भी भू-लोकों के
समान ही हैं।
लोकस्य नोपदेशात् सिद्धिः पूर्ववत् ॥५७॥
अर्थ—जैसे इस लोक के पुरुषों की श्रवणमात्र से मुक्ति
नहीं होती है, इसी तरह चन्द्रलोक के मनुष्यों की भी श्रवणमात्र
से मुक्ति नहीं होती।
पारम्पर्येण तत्सिद्धौ विमुक्तिश्रुतिः ॥५८॥
अर्थ—जो जन्मान्तरों से मुक्ति के वास्ते यत्न करते चले
आते हैं वे लोग केवल श्रवणमात्र ही से मुक्ति को प्राप्त हो
सकते हैं; इसलिये 'श्रुत्वा मुच्यते' सुनने से मुक्ति को प्राप्त हो
जाता है, यह श्रुति भी सार्थक हो जायगी।
गतिश्रुतेश्च व्यापकत्वेऽप्युपाधियोगाद्भोग देश-
काल लाभो व्योमवत् ॥५६॥
अर्थ—आत्मा में जो गति सुनी जाती है उसको इस तरह
से समझना चाहिये कि यद्यपि आत्मा शरीर में व्यापक है तथापि
उस शरीररूपी उपाधि के योग से अनेक तरह के भोग देश और
समयों का योग इसमें माना जाता है, अर्थात् भोगों की प्राप्ति,
देशान्तर्गमन और प्रातः संध्या आदि का अतिक्रम आत्माही में
मालूम होता है; परन्तु आत्मा वास्तव में इनसे पृथक् है; जैसे
घट का आकाश। घट को उठाकर दूसरी जगह ले जाने से वह
आकाश भी दूसरी जगह चला जाता है, इस बात को पहिले कह

( १८६ )
चुके हैं कि बिना जीव के सिर्फ वायु ही से शरीर का कार्य नहीं
चलता, उसपर आचार्य अपना सिद्धान्त कहते हैं।
अनधिष्ठितस्यपूतिभावप्रसङ्गात्तत्सिद्धिः ॥६०॥
अर्थ-यदि आत्मा इस शरीर का अधिष्ठाता न हो, तो
शरीर में दुर्गन्ध आने लगे, इस कारण प्राण को शरीर का
अधिष्ठाता नहीं कह सकते हैं।
अदृष्टद्वारा चेदसम्बद्धस्य तदसम्भवाज्जलादि-
वदङ्कुरे ॥६१॥
अर्थ-यदि अदृष्ट (प्रारब्ध) से प्राण को शरीर का
अधिष्ठाता कहें तो भी योग्य नही ; क्योंकि प्राण का जब प्रारब्ध के
साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है, तो उसको हम अधिष्ठाता कैसे
कह सकते हैं ? जैसे अंकुर के पैदा होने में जल भी हेतु है,
परन्तु बिना बीज के जल से अंकुर पैदा नहीं हो सकता, इसी
तरह यद्यपि शरीर की अनेक क्रियायें प्राण से होती हैं तो भी
वह प्राण बिना आत्मा के कोई क्रिया नहीं कर सकता।
निर्गुणत्वात्तदसम्भवादहङ्कारधर्मा ह्येते॥६२॥
अर्थ--ईश्वर निर्गुण है, इस कारण उसको बुद्धि आदि का
होना असम्भव (झूठ) है; इसवास्ते वह सब अहंकार के
धर्म बुद्धि आदि जीव में ही मानने चाहियें।
विशिष्टस्य जीवत्वमन्वयव्यतिरेकात् ॥६३॥
अर्थ-जो ईश्वर के गुणों से पृथक् शरीरादि युक्त हैं उस-
को जीव संज्ञा से बोलते हैं, इस बात को अन्वय व्यतिरेक से

( १६० )
जानना चाहिये, अर्थात् जीव के होने से शरीर में बुद्धि का
प्रकाश और न होने से बुद्धि आदि का अप्रकाश दीखता है।
अहंकार कर्त्तृधीना कार्यसिद्धिर्नैश्वराधीना
प्रमाणाभावात् ॥६४॥
अर्थ—अहंकार ही धर्म आदि कार्यों का करनेवाला है, किन्तु
धर्म को ईश्वर नहीं कराता ; क्योंकि यदि धर्मादि ईश्वर स्वयम्
बनावे तो फल देना अन्याय हो जाय।
अदृष्टोद्भू तिवत् समानत्वम् ॥६५॥
अर्थ—जिस वस्तु के कर्त्ता को हम प्रत्यक्ष नहीं देखते हैं उस
कर्त्ता का हम अनुमान कर लेते हैं। दृष्टान्त—जैसे कि किसी घड़े
को देखा और उसके कर्त्ता कुम्हार को नहीं देखा। तब अनुमान
से मालूम करते हैं कि इसका बनाने वाला अवश्य है, चाहे वह
दिखलाये नहीं। इसी प्रकार पृथिवी आदि अंकुरों का कर्त्ता भी
कोई न कोई अवश्य है।
महतोऽन्यत् ॥६६॥
अर्थ—इसी प्रकार इन्द्रियों की तन्मात्राओं का कर्त्ता भी
महत्तत्व के सिवाय किसी को मानना चाहिये। वह कर्त्ता अहं-
कार ही है।
कर्मनिमित्तः प्रकृतेः स्वस्वामिभावोऽप्यनादि-
बीजाङ्कुरवत् ॥६७॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष का स्वस्वामिभाव सम्बन्धी भी
पुरुष के कर्मों की वासना से अनादि ही मानना चाहिये ; जैसे
बीज और अंकुर का होना अनादि माना गया है।

( १६१ )
अविवेकनिमित्तो वा पंचशिखः ॥६८॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष का स्वस्वामिभाव सम्बन्ध कर्म की
वासनाओं से नहीं है, किन्तु अविवेक से है ; पञ्चशिख आचार्य
ऐसा कहते हैं ॥
लिङ्गशरीरनिमित्तक इति सनन्दनाचार्यः ॥६६॥
अर्थ—लिङ्ग शरीर के निमित्त प्रकृति और पुरुष का स्वस्वा-
मिभाव सम्बन्ध है । सनन्दनाचार्य ऐसा मानते हैं ।
यद्वा तद्वा तदुच्छित्तिः पुरुषार्थस्तदुच्छित्तिः
पुरुषार्थः ॥७०॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष का चाहे कोई क्यों न सम्बन्ध हो
किन्तु किसी न किसी प्रकार से उस सम्बन्ध का नाश हो जाय
उसको ही मोक्ष कहते हैं, सांख्याचार्य का यही मत है । "तदुच्छित्तिः"
ऐसा दो बार कहना वीप्सा में है । इस अध्याय में जो-जो विषय
कहे गये हैं इन बिषयों को पहिले पांच अध्यायों में खूब फैलाकर
कह चुके हैं, इस वास्ते इन सूत्रों की व्यवस्था बहुत फैलाकर
नहीं की है ।
इति सांख्यदर्शने षष्ठोऽध्यायः पूर्तिमगात् ॥
समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।