सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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अविवेकनिमित्तो वा पंचशिखः ॥६८॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष का स्वस्वामिभाव सम्बन्ध कर्म की
वासनाओं से नहीं है, किन्तु अविवेक से है ; पञ्चशिख आचार्य
ऐसा कहते हैं ॥
लिङ्गशरीरनिमित्तक इति सनन्दनाचार्यः ॥६६॥
अर्थ—लिङ्ग शरीर के निमित्त प्रकृति और पुरुष का स्वस्वा-
मिभाव सम्बन्ध है । सनन्दनाचार्य ऐसा मानते हैं ।
यद्वा तद्वा तदुच्छित्तिः पुरुषार्थस्तदुच्छित्तिः
पुरुषार्थः ॥७०॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष का चाहे कोई क्यों न सम्बन्ध हो
किन्तु किसी न किसी प्रकार से उस सम्बन्ध का नाश हो जाय
उसको ही मोक्ष कहते हैं, सांख्याचार्य का यही मत है । "तदुच्छित्तिः"
ऐसा दो बार कहना वीप्सा में है । इस अध्याय में जो-जो विषय
कहे गये हैं इन बिषयों को पहिले पांच अध्यायों में खूब फैलाकर
कह चुके हैं, इस वास्ते इन सूत्रों की व्यवस्था बहुत फैलाकर
नहीं की है ।
इति सांख्यदर्शने षष्ठोऽध्यायः पूर्तिमगात् ॥
समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।