सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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प्रश्न हो सकता है—यदि कर्मों से इसकी उत्पत्ति मानें तो इस
प्रश्न को अवकाश मिलता है कि कर्म किससे उत्पन्न हुये हैं;
इसलिये इन दोनों दोषों के दूर करने के लिये अविवेक को
अनादि मानना चाहिये ।
न नित्यः स्यादात्मवदन्यथानुच्छित्तिः ॥१३॥
अर्थ—अविवेक नित्य नहीं हो सकता । यदि नित्य ही
माना जायगा तो उसका नाश हो सकेगा; जैसे—आत्मा का
नाश नहीं होता है और उस अविवेक के नाश न होने से मुक्ति
न हो सकेगी, इसलिये अविवेक को प्रवाहरूप से अनादि
( अनित्य ) मानना चाहिये ।
प्रतिनियतकारणनाश्यत्वमस्य ध्वान्तवत् ॥१४॥
अर्थ—यह अविवेक भी प्रतिनियत कारण से नाश हो जाता
है, इसलिये अनित्य है; जैसे—अँधेरा प्रकाश रूप प्रतिनियत
कारण से नाश हो जाता है, इसलिये वह अविवेक नित्य नहीं
हो सकता ।
प्र०—प्रतिनियत कारण किसको कहते हैं ?
उ०—जिससे उस कार्य की उत्पत्ति वा नाश होजाय, जैसा—
अन्धेरे के दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये ।
अत्रापि प्रतिनियमोऽन्वयव्यतिरेकात् ॥१५॥
अर्थ—इस अविवेक के नाश करने में भी प्रतिनियत ( जिस
से अवश्य नाश हो जाय ) अन्वय व्यतिरेक से निश्चय कर लेना
चाहिये । वह अन्वय यही है कि विवेक के होने से इसका नाश
और विवेक के न होने से अविवेक का होना प्रतीत होता है, यही
अन्वय व्यतिरेक कहने का तात्पर्य है ।