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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 192 में से

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पृष्ठ 189

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रहनेवाले जीव भी एक बार मुक्त होकर फिर कभी बन्धन में नहीं
पड़ते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है; किन्तु वहाँ के भी मुक्त जीव
लौट आते हैं, क्योंकि वह चन्द्रादिक लोक भी भू-लोकों के
समान ही हैं।
लोकस्य नोपदेशात् सिद्धिः पूर्ववत् ॥५७॥
अर्थ—जैसे इस लोक के पुरुषों की श्रवणमात्र से मुक्ति
नहीं होती है, इसी तरह चन्द्रलोक के मनुष्यों की भी श्रवणमात्र
से मुक्ति नहीं होती।
पारम्पर्येण तत्सिद्धौ विमुक्तिश्रुतिः ॥५८॥
अर्थ—जो जन्मान्तरों से मुक्ति के वास्ते यत्न करते चले
आते हैं वे लोग केवल श्रवणमात्र ही से मुक्ति को प्राप्त हो
सकते हैं; इसलिये 'श्रुत्वा मुच्यते' सुनने से मुक्ति को प्राप्त हो
जाता है, यह श्रुति भी सार्थक हो जायगी।
गतिश्रुतेश्च व्यापकत्वेऽप्युपाधियोगाद्भोग देश-
काल लाभो व्योमवत् ॥५६॥
अर्थ—आत्मा में जो गति सुनी जाती है उसको इस तरह
से समझना चाहिये कि यद्यपि आत्मा शरीर में व्यापक है तथापि
उस शरीररूपी उपाधि के योग से अनेक तरह के भोग देश और
समयों का योग इसमें माना जाता है, अर्थात् भोगों की प्राप्ति,
देशान्तर्गमन और प्रातः संध्या आदि का अतिक्रम आत्माही में
मालूम होता है; परन्तु आत्मा वास्तव में इनसे पृथक् है; जैसे
घट का आकाश। घट को उठाकर दूसरी जगह ले जाने से वह
आकाश भी दूसरी जगह चला जाता है, इस बात को पहिले कह