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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

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लयविक्षेपयोर्व्यावृत्त्येत्याचार्याः ॥ ३० ॥
अर्थ—लय ( सुषुप्ति ) विक्षेप ( स्वप्न इन दोनों अवस्थाओं
के निवृत्त होने से विषय-वासनाओं का निरोध हो जाता है, यह
आचार्यों का मत है ।
न स्थाननियमश्चित्तप्रसादात् ॥ ३१ ॥
अर्थ—समाधि आदि के करने के वास्ते स्थान का कोई
नियम नहीं है, जहाँ चित्त प्रसन्न हो वहीं समाधि हो सकती है।
प्रकृतेराद्योपादानतान्येषां कार्यत्वश्रुतेः ॥ ३२ ॥
अर्थ—उपादान कारण प्रकृति को ही माना है, महदादिकों को
प्रकृति का कार्य माना है ।
नित्यत्वेऽपि नात्मनो योग्यत्वा भावात् ॥ ३३ ॥
अर्थ—आत्मा नित्य भी है तो भी उसको उपादान कारण
कहना केवल भूल है। क्योंकि जो बातें उपादान कारण में होती
हैं वे बातें आत्मा में नहीं दीखतीं ( स्पष्ट भाव यह है ) यदि
आत्मा ही सबका उपादान कारण होती तो पृथिवी आदि सब
चैतन्य होने चाहिये थे ; परन्तु यह बात देखने में नहीं आती ।
श्रुतिविरोधान्न कुतर्कापसदस्यात्मलाभः ॥३४॥
अर्थ—जो मनुष्य श्रुतियों के विरोध से आत्मा के संबंध में
कुतर्क ( खोटे प्रश्न ) करते हैं उनको किसी प्रकार आत्मा का
ज्ञान नहीं होता है ।
पारम्पर्येऽपि प्रधानानुवृत्तिरणुवत् ॥ ३५ ॥
अर्थ—परम्परा सम्बन्ध से भी प्रकृति को ही सबका कारण
मानना चाहिये ; जैसे—घटादिकों के कारण अणु हैं और अणुओं