सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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चाहिये कि पहिला पक्ष सत्य है वा दूसरा ; क्योंकि एक पक्ष
की पुष्टि करने वाला कोई प्रमाण नहीं दीखता, किन्तु जीव और
ईश्वर के पार्थक्य सिद्ध करने वाले प्रमाण दीखते हैं ।
प्रकाशतस्तत्सिद्धौ कर्मकर्तृविरोधः ॥४९॥
अर्थ—ब्रह्म प्रकाशस्वरूप है इसलिये जो चाहे सो कर
सकता है अर्थात् चाहे तो घटादि रूप हो जाय । इस प्रमाण से
यदि ब्रह्म को घटादि रूप कहकर अद्वैतवाद की सिद्धि की जाय तो
कर्त्ता और कर्म का विरोध होगा ; क्योंकि ऐसा कहीं नहीं देखने
में आता कि कर्त्ता कर्म हो गया हो ; जैसे—घट का कर्त्ता कुम्हार
है और उस कुम्हार का कर्म घट ( घड़ा ) है, तो दोनों को भिन्न-
भिन्न पदार्थ मानना होगा, ऐसा नहीं कह सकते कि कुम्हार ही
घट है ।
जड़व्यावृत्तो जड़ं प्रकाशयति चिद्रूपः ॥५०॥
अर्थ—जीव जड़ पदार्थों में मिलकर उनको भी प्रकाश कर
देता है, इसवास्ते वह प्रकाशस्वरूप है ; क्योंकि यदि जीव में
प्रकाश करने की शक्ति न होती तो शरीर में गमनादिक क्रियायें
न हो सकती थीं ।
न श्रुतिविरोधो रागिणां वैराग्याय तत्सिद्धेः ॥५१
अर्थ—जिन श्रुतियों से अद्वैत की सिद्धि होती है उनसे, और
जो द्वैत को सिद्ध करती हैं उनसे कुछ भी विरोध न होगा ;
क्योंकि जो ईश्वर को छोड़कर जीव वा शरीर को ईश्वर मानते हैं
उनको समझाने के लिये वे श्रुतियाँ हैं अर्थात् ईश्वर को उन
श्रुतियों में अद्वैत अद्वितीय एक आदि विशेषणों से इसलिय
कहा है कि उसके समान दूसरा और कोई नहीं है ; अतः द्वैत
के मानने से श्रुतियों से विरोध नहीं होता ।