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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 192 में से

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पृष्ठ 178

( १७७ )
सुखलाभाभावादपुरुषार्थत्वमिति चेन्नद्वैवि-
ध्यात् ॥६॥
अर्थ-जबकि किसी को भी सुख प्राप्त नहीं होता तो मुक्ति
के वास्ते उपाय करना निष्फल है, क्योंकि मुक्ति में भी सुख नहीं
प्राप्त हो सकता, ऐसा न समझना चाहिये । सुख भी दो प्रकार
के हैं-एक मोक्ष है, वह सुख और प्रकार का है, उसमें किसी प्रकार
के दुःख का मेल नहीं है। दूसरा सांसारिक सुख है, वह और ही
प्रकार का है, क्योंकि उस में दुःख मिले हुये रहा करते हैं ।
निगुर्णत्वमात्मनोऽसङ्गत्वदिश्रुतेः ॥१०॥
अर्थ-मुक्ति अवस्था में आत्मा निर्गुण रहता है । सांसा-
रिक दशा में लौकिक सुख आत्मा को बाधा पहुँचाते हैं मुक्ति
अवस्था में आत्मा को असंग अर्थात् विकृति के संग से रहित
श्रुतियों द्वारा सुना गया है ।
परधर्मत्वेऽपि तत्सिद्धिरविवेकात् ॥११॥
अर्थ-यद्यपि सांसारिक दशा में गुणों का सर्वदा पुरुष में
ही बोध होता है, परन्तु उस प्रकार का बोध अविवेक से पैदा
होता है, क्योंकि जो अविवेकी है वही सांसारिक कर्मों को पुरुष-
कृत मानते हैं, परन्तु वास्तव में वह प्रकृति और पुरुष के संयोग
से होते हैं ; इसलिये संयोगजन्य हैं ।
अनादिरविवेकोऽन्यथा दोषद्वयप्रसक्तेः ॥१२॥
अर्थ-अविवेक को प्रवाहरूप से अनादि मानना चाहिये,
यदि सादि मानोगे तो यह प्रश्न उत्पन्न होगा कि उसको किसने
पैदा किया ? यदि प्रकृति और पुरुष से पैदा हुआ तब उनसे ही
पैदा हुआ और उनका ही बंध करे, यह दोष होगा । दूसरा यह