सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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कर्मवैचित्र्यात् सृष्टिवैचित्र्यम् ॥४१॥
अर्थ—प्रत्येक मनुष्य के कर्मों की वासनायें भिन्न-भिन्न प्रकार
की होती हैं, इसी कारण से प्रकृति की सृष्टि भी अनेक प्रकार
की होती है, एक-सी नहीं होती है ।
साम्यवैषम्याभ्यां कार्यद्वयम् ॥४२॥
अर्थ—समता और विषमता के कारण उत्पत्ति और प्रलय
होते हैं। जब प्रकृति की समता होती है तब उत्पत्ति, और जब
विषमता होती है, तब प्रलय होता है। यही बात संसार में दीख
रही है कि जिन दो औषध ( दवाइयों ) को बराबर भाग मिलाकर
यदि खाया जाता है तो लाभ होता है और कमती-बढ़ती मिला-
कर खाने से बिगाड़ होता है ।
विमुक्तबोधान्न सृष्टिः प्रधानस्य लोकवत् ॥४३॥
अर्थ—जब प्रकृति को इस बात का ज्ञान हो जाता है यह पुरुष
मुक्त हो गया, फिर उसके वास्ते सृष्टि को नहीं करती है, यह बात
लोक के समान समझनी चाहिये ; जैसे—कोई मनुष्य किसी को
बंधन में से छुड़ाने का उपाय करता है, जब वह उसको उस बंधन
से छुड़ा देता है तो उस उपाय से निश्चिन्त हो बैठता है ; क्योंकि
जिसके लिये उपाय किया था वह कार्य पूरा होगया ।
अन्योपसर्पणेऽपि मुक्तोपभोगो निमित्ता-
भावात् ॥४४॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति अविवेकियों को बद्ध करती है, परन्तु
मुक्त को बद्ध नहीं करती ; क्योंकि जिस निमित्त से प्रकृति अविवे-
कियों को बद्ध करती थी वह अविवेक जीवों में नहीं रहता है ।