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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 192 में से

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पृष्ठ 180

( १७६ )
प्रकारान्तरासम्भवादविवेक एव बंधः ॥१६॥
अर्थ—सिवाय अविवेक के जब कोई और प्रकार बन्ध में
हेतु नहीं दीखता तो ऐसा मानना ही ठीक है कि अविवेक ही
बन्ध है और विवेक ही मोक्ष है। कोई वादी इन तीन सूत्रों से
जोकि आगे कहे जायेंगे मुक्ति सम्बन्ध में पूर्व-पक्ष करता है।
प्र०—न मुक्तस्य पुनर्बन्धयोगोऽप्यनावृत्ति-
श्रुत्तेः ॥ १७ ॥
अर्थ—मुक्त को फिर बन्ध योग नहीं होता अर्थात् जो मुक्त
हो चुका है वह फिर नहीं बंध सकता है ; क्योंकि “नस पुनरा-
वर्त्तते” ( वह फिर नहीं आता है )। इम श्रुति से मुक्त होने पर
नहीं आता, ऐसा सिद्ध होता है।
अपुरुषार्थत्वमन्यथा ॥ १८ ॥
अर्थ—यदि मुक्त का बन्ध योग माना जाय तो अपुरुषार्थत्व
सिद्ध होता है।
अविशेषापत्तिरुभयोः ॥ १६ ॥
अर्थ—बद्ध और मुक्त में अविशेषापत्ति अर्थात् बराबरी
प्राप्त होती है ; क्योंकि जो मुक्त नहीं है वह अब बँधा हुआ है
और जो मुक्त हो जायगा उसको फिर बन्ध प्राप्त हो जायगा।
उ०—मुक्तिरन्तरायध्वस्तेर्न परः ॥ २० ॥
अर्थ—जिस प्रकार कि मुक्ति का वादी ने पूर्व-पक्ष किया,
उस प्रकार की मुक्ति को आचार्य नहीं मानते, किन्तु अन्तरायों के
( विघ्नों के ) ध्वंस ( नाश ) हो जाने के सिवाय और किसी
प्रकार की मुक्ति आचार्य नहीं मानते।