सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें--- अर्थ- ऊ . . . न किया वह योग्य
नहीं, क्योंकि वेदों म अनन्ता . . . को भी पुनरावृत्ति
लिखी है कि मुक्त फिर लौट आता है । शङ्कराचार्य ने भी इस
श्रुति का अर्थ इस कल्प में लौटना माना है ; इसलिये मुक्ति से
फिर बँधता नहीं, ऐसा कहना योग्य नहीं हो सकता । दूसरा
यह जो दोष कहा कि पुनर्बन्ध होने से बद्ध मुक्त दोनों बराबर हो
जायेंगे, सो भी योग्य नहीं ; क्योंकि जो मनुष्य रोगी है उसकी
बराबरी नीरोगी के साथ किसी प्रकार नहीं हो सकती और जो
नीरोगी है वह भी कालान्तर ( कुछ दिनों के बाद ) में रोगी हो
सकता है ; परन्तु यह विचार करके यह भविष्यत् ( अगाड़ी के
समय में ) रोगी होगा, अतः रोगी के ही बराबर है, उसके
साथ भी रोगी का-सा व्यवहार नहीं कर सकते । इसलिये न तो
मुक्त की पुनरावृत्ति मानने से श्रुति से विरोध प्राप्त होता है और
न युक्ति से ही विरोध होता है ।
अधिकारित्रैविध्यान्न नियमः ॥ २२ ॥
अर्थ—उत्तम, मध्यम, अधम, तीन प्रकार के अधिकारी होते
हैं, इस कारण यह कोई नियम नहीं है कि श्रवण, मनन आदि
संयोगों से सबही की मुक्ति हो ।
दाढर्यार्थमुत्तरेषाम् ॥ २३ ॥
अर्थ—जो अज्ञ हैं उनको दृढ़ता के लिये उचित है कि
श्रवण, मनन आदि योग के अंगों का अनुष्ठान करें तो कुछ
दिनों के बाद मुक्ति को प्राप्त हो सकेंगे।
स्थिरसुखमासनमिति न नियमः ॥ २४ ॥
अर्थ—जिसमें सुख स्थिर हो वोही आसन है, इस बात को