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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( ११५ )
है कि श्वेतकेतु के वास्ते आरुणि आदि मुनियों ने बारबार
उपदेश किया था।
पितापुत्रवदुभयोर् दृष्टत्वात् ॥ ४ ॥
अर्थ—विवेक के द्वारा प्रकृति और पुरुष दोनों ही दीखते हैं।
दृष्टान्त—कोई मनुष्य अपनी गर्भिणी स्त्री को छोड़कर परदेश
गया था, जब वह आया देखता क्या है, कि पुत्र उत्पन्न होकर
पूरा युवा हो गया, लेकिन न तो वह पुत्र जानता है, कि यही मेरा
पिता है, और न वह पुरुष जानता है, कि यही मेरा पुत्र है, तब
उस स्त्री ने दोनों को प्रबोध ( ज्ञान ) कराया, कि यह तेरा पिता
है, तू इसका पुत्र है। इसी तरह विवेक भी प्रकृति और पुरुष का
जानने वाला है।
श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥ ५ ॥
अर्थ—संसार का यह नियम है कि जब-जब द्रव्य-प्राप्ति
होती है, तब-तब तो आनन्द, और जब वह द्रव्य चला जाता है
तब ही दुःख होता है। दृष्टान्त—कोई श्येन ( बाज़ ) किसी पक्षी
का मांस लिये चला जाता था, उसी समय किसी व्याध ने पकड़
लिया और उससे वह मांस छीन लिया, तो वह अत्यन्त दुःखी
होने लगा। यदि आप ही उस मांस को त्याग देता तो क्यों दुःख
भोगता ? इस कारण आप ही विषय-वासना इत्यादि का त्याग
कर देना चाहिये।
अहिनिर्ल्वयिनीवत् ॥ ६ ॥
अर्थ—जैसे साँप पुरानी केंचली को छोड़ देता है, इसी
तरह मुमुक्षु ( मोक्ष की इच्छा करने वाले ) को विषय त्याग
देने चाहिये।
छिन्नहस्तवद्वा ॥ ७ ॥

( ११६ )
अर्थ—जैसे किसी मनुष्य का हाथ कटकर गिर पड़ता है, फिर
वह कटे हुए हाथ से किसी तरह का संबंध नहीं रखता, इसी तरह
विवेक प्राप्त होने पर जब विषय-वासना नष्ट हो जाता है, तब
मुमुक्षु फिर उन विषय-वासनाओं से कुछ संबंध नहीं रखता है।
असाधनानुचिन्तनं बन्धाय भरतवत् ॥ ७ ॥
अर्थ—जो मोक्ष का साधन नहीं है लेकिन धर्म में गिनकर
साधन वर्णन कर दिया तो उसका जो विचार है, वह केवल बंधन
का ही कारण होगा, न कि मोक्ष का । दृष्टांत—जैसे राजर्षि
भरत यद्यपि मोक्ष की इच्छा करने वाले थे, लेकिन किसी ने कोई
अनाथ हरिण का बच्चा महात्मा को पालने के लिये दे दिया,
और उस अनाथ हरिण के बच्चे के पालन-पोषण में महात्मा के
विवेक-प्राप्ति का समय नष्ट हो गया, और मुक्ति न हुई । यद्यपि
अनाथ का पालन राजा का धर्म था, तथापि पालन के विचार
में महात्मा से विवेक साधन न हो सका, इस वास्ते बंध का
हेतु हो गया । इसी वास्ते कहते हैं कि धर्म कोई और वस्तु है,
और विवेक साधन कुछ और वस्तु है ।
बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिःकुमारीशंखवत्।६
अर्थ---विवेक-साधन समय बहुतों का संग न करे, किन्तु
अकेले ही विवेक-साधन को करे ; क्योंकि बहुतों के साथ में
राग-द्वेषादि की प्राप्ति होती है, उससे साधन में विघ्न होने का
भय प्राप्त हो जाता है । दृष्टान्त—जैसे कि कोई कुमारी ( कन्या )
हाथों में चूड़ियाँ पहन रही थी, जब दूसरी कन्या के साथ उस-
का मेल हुआ, तब आपस में धक्का लगकर चूड़ियों का झनकार
शब्द हुआ, इसी तरह यहाँ भी विचारना चाहिये, कि बहुतों के
संग में विवेक साधन नहीं हो सकता ।

( ११७ )
द्वाभ्यामपि तथैव ॥ १० ॥
अर्थ—दो के साथ भी विवेक साधन नहीं हो सकता,
क्योंकि दो आदमियों में भी राग-द्वेषादि का होना सम्भव है।
निराशः सुखी पिंगलावत् ॥ ११ ॥
अर्थ—जो मनुष्य आशा को त्याग देता है, वह सदैव
पिंगला नाम वेश्या के समान सुख को प्राप्त होता है। दृष्टांत—
पिंगला नाम वाली एक वेश्या थी, उसको जार मनुष्यों के आने
का समय देखते-देखते बहुत रात बीत गई, लेकिन कोई विषयी
उसके पास न आया, तब वह जाकर सो रही, बाद को फिर उस
वेश्या को ख्याल हुआ शायद अब कोई आदमी आव, ऐसा
विचार कर वह वेश्या फिर उठ आई, और बहुत समय तक
फिर जागती रही, लेकिन फिर भी कोई न आया, तब उस
वेश्या ने अपने चित्त में बड़ी ग्लानि मानी और कहा कि
“आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्” आशा बड़े दुःख
देती है, और नैराश्य में बड़ाभारी सुख है, ऐसा विचार कर उस
वेश्या ने उस दिन से आशा त्याग दी और परम सुख को
प्राप्त हुई। इसी तरह जो मनुष्य आशा को त्यागेंगे वह परम
सुख को प्राप्त होंगे।
अनारम्भेऽपि परगृहे सुखीसर्पवत् ॥ १२ ॥
अर्थ—गृहादिकों के विना बनाये भी पराये घर में सुख पूर्वक
रह सकता है, जैसे—साँप पराये घर में सुख-पूर्वक वास
करता है।
बहुशास्त्रगुरुपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥ १३
अर्थ-बहुत से शास्त्रों से और गुरुओं से सार वस्तु जो विवेक

( ११८ )
का साधन है उस ही को लेना चाहिये, जैसे—भौंरा फूलों का
जो सार मद है उसको ग्रहण करता है ; इसी तरह
सार का लेना योग्य है ।
इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधि हानिः ॥ १४ ॥
अर्थ—जिसका मन एकाग्र रहता है, उसकी समाधि में
किसी समय किसी प्रकार की भी हानि नहीं हो सकती । दृष्टांत—
कोई बाण बनानेवाला अपने स्थल पर बैठा हुआ बाण बना
रहा था, उसी समय उसकी बगल से होकर कटक सहित राजा
निकल गया ; लेकिन उसको न मालूम हुआ कौन चला गया,
और उसके काम में भी किसी प्रकार की बाधा न हुई ; क्योंकि
उसका मन अपने काम में आसक्त था ।
कृतनियमलङ्घनादानर्थक्यं लोकवत् ॥ १५ ॥
अर्थ—शौच, आचार आदि जो नियम विवेक की वृद्धि के
वास्ते माने गये हैं, उनके लंघन से अर्थात् ठीक तौर से न
पालने पर अनर्थ होता है, और उन नियमों का -फिर कुछ भी
फल नहीं होता, जैसे कि रोगी के वास्ते वैद्य ने पथ्य बताया
वास्ते नफे के, लेकिन उसने कुछ पथ्य न किया, उसको कुछ फल
अच्छा न होगा, किन्तु रोग वृद्धि को ही प्राप्त होगा ।
तद्विस्मरणेऽपि भेकीवत् ॥ १६ ॥
अर्थ—तत्वज्ञान के भूलने से दुःख प्राप्त होता है । दृष्टांत—
कोई राजा शिकार खेलने के वास्ते वन को गया था, वहाँ पर
उस राजा ने दिव्यस्वरूप एक कन्या को देखा, और उस कन्या
को देखकर राजा मोहित हो गया, और बोला, कन्ये ! तुम कौन
हो ? वह बोली राजन् ! मैं भेकराज ( मेढकों के राजा ) की
कन्या हूँ । तब राजा अपनी स्त्री होने के वास्ते उससे प्रार्थना

( ११६ )
करने लगा, तब वह कन्या बोलो, राजन् ! अगर मुझको जल
का दर्शन हो जायगा, तब ही मैं तेरा साथ छोड़ दूँगी ; इसवास्ते
मुझको जल का दर्शन न होना चाहिये, यह मेरा नियम पालन
करना होगा । राजा ने प्रसन्न होकर इस बात को स्वीकार कर
लिया । एक समय वह दोनों आनन्द में आसक्त थे, तब वह
कन्या राजा से बोलो कहाँ जल है, तब राजा ने उस बात को
भूल कर उसको जल दिखा दिया । जल के दर्शन समय ही
वह कन्या उस रूप को छोड़कर जल में प्रवेश कर गई । तब
राजा ने दुःखी होकर उस कन्या को जल के अन्दर बहुत देखा,
लेकिन वह फिर न प्राप्त हुई, जैसे—यह राजा उस तत्त्व बात
को भूल कर दुःख को प्राप्त हुये, इसी तरह मनुष्य भी तत्त्वज्ञान
के भूलने से दुःख को प्राप्त होता है ।
नोपदेशश्रवणेऽपि कृतकृत्यता परामर्शादृते
विरोचनवत् ॥ १७ ॥
अर्थ—उपदेश के सुनने ही मात्र से कृतकृत्यता नहीं होती
जब तक कि उसका विचार न किया जाय । दृष्टान्त—बृहस्पति-
जी ने विरोचन और इन्द्र इन दोनों को सत्योपदेश किया था ।
इन्द्र ने उस उपदेश को सुनकर विचारा भी, परन्तु विरोचन ने
न विचारा, किन्तु कान ही पवित्र किये ।
दृष्टस्तयोरिन्द्रस्य ॥ १८ ॥
अर्थ—देखने में आया है, कि उस श्रवण से इन्द्र को ही
विवेक ज्ञान हुआ, विरोचन को नहीं ; क्योंकि इन्द्र ने तो उस
उपदेश का विचार किया था ।
प्रणतिब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहु-
कालात् तद्वत् ॥ १९ ॥

( १२० )
अर्थ—गुरु से नम्र रहना, सदा गुरु की सेवा करना, ब्रह्म-
चर्य को धारण करना, और वेद पढ़ने के वास्ते गुरु के पास
जाना, इन्हीं कर्मों के करने से विवेक की सिद्धि हो जाती है,
से कि इन्द्र को हुई थी।
न कालनियमो वामदेववत् ॥ २० ॥
अर्थ—इतने दिनों में विवेक उत्पन्न होगा, ऐसा कोई नियम
नहीं है; क्योंकि वामदेव नाम वाले ऋषि को पूर्व जन्म के
संस्कारों के कारण थोड़े ही दिनों में विवेक उत्पन्न हो गया था।
अध्यस्तरूपोपासनात् पारम्पर्येण यज्ञोपास-
कानामिव ॥ २१ ॥
अर्थ—शरीर ही आत्मा है, वा मन ही आत्मा है, इस प्रकार
अध्याहार करके जो उपासना की जाती है, उसके परंपरा संबंध
से विवेक होता है, जैसे—पहिले पुत्र को आत्मा माना, पीछे
शरीर को, उसके पश्चात् इन्द्रियों को, इसी प्रकार करते-करते
आत्म-विवेक हो जाता है जैसे—यज्ञ करने वालों की परम्परा
संबन्ध से मुक्ति होती है; क्योंकि यज्ञ करने से चित्त की
शुद्धि होती है, और चित्त शुद्धि से वासनाओं की न्यूनता आदि
परम्परा से मुक्ति होती है, इसी प्रकार अध्यस्त उपासना से भी
जानना चाहिये ।
इतरलाभेऽप्यावृत्तिः पंचाग्नियोगतो जन्म-
श्रुतेः ॥ २२ ॥
अर्थ—यदि पञ्चाग्नि योग से इतर अर्थात् शान्ति का लाभ
भी कर लिया, तो भी कर्मों की वासना बलवती बनी रहेगी;
अतएव वह कर्म फिर भी उत्तरोत्तर उत्पन्न होते जायेंगे, इसी

( १२१ )
बात को श्रुतियाँ भी प्रतिपादन करती हैं। वह श्रुतियाँ छान्दोग्य
उपनिषद् के पञ्चम प्रपाठक के आदि में हैं, यहाँ विस्तार भय
से उनको नहीं लिखा है।
विरक्तस्य हेयहानमुपादेयोपादानं हंसक्षीरवत् ।२३
अर्थ—जो विरक्त है, अर्थात् जिसको विवेक हो गया है,
उसको हेय ( छोड़ने योग्य ) का तो त्याग और उपादेय ( ग्रहण
करने योग्य ) का ग्रहण करना चाहिये। हेय अर्थात् छोड़ने
लायक संसार है। उपादेय-ग्रहण करने लायक मुक्ति है, जैसे—
हंस जल को छोड़कर दूध पी लेते हैं, इसी तरह विरक्त को
भी करना चाहिये।
लब्धातिशययोगाद्वा तद्वत् ॥ २४ ॥
अर्थ—अथवा जो ज्ञान की पराकाष्ठा ( हद ) को प्राप्त
हो गया है, यदि उसका सङ्ग हो जाय, तो भी पहिले कहे
हुए हंस के समान विवेकी हो सकता है।
न कामचारित्वं रागोपहते शुकवत् ॥ २५ ॥
अर्थ—राग के नाश हो जाने पर भी कामचारित्व ( इच्छा-
धीन ) न होना चाहिये, कारण यह है कि फिर बन्धन में पड़ने
का भय प्राप्त हो सकता है। दृष्टान्त—जैसे कोई तोता दाने
के लालच में होकर बन्धन में पड़ गया था, जब उसको मौक़ा
मिला तब वह उस बन्धन में से भाग गया, फिर उस बन्धन के
पास भय के मारे नहीं आया। क्योंकि अगर इसके पास जाऊँगा
तो फिर बन्धन को प्राप्त होऊँगा। इसी पक्ष की और भी
पुष्टि करेंगे।
गुणयोगाद्बद्धः शुकवत् ॥ २६

( १२२ )
अर्थ—जब काम जारी रहेगा, तब उसके गुणों में किसी
की प्रीति हो जायगी, तो भी उस विवेकी को फिर बद्ध होना
पड़ेगा, जैसे—मनोहर भाषण ( बोलना ) आदि गुणों से तोते
का बन्धन हो जाता है।
न भोगाद्रागशान्तिर्मु'निवत् ॥ २७ ॥
अर्थ—भोगों को पूर्णरूप से भोगने से भी राग की शान्ति
नहीं होती, जैसे—सौभरि नाम वाले मुनि ने भोगों को खूब
अच्छी तरह भोगा, लेकिन उससे कुछ भी शान्ति न हुई। मृत्यु के
समय उन महात्मा ने ऐसा कहा भी था कि—
आमृत्युतो नैवमनोरथानामन्तोऽस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य।
मनोरथासक्तिपरस्यचित्तं न जायते वै परमार्थसङ्गि ॥
अर्थ—आज मुझको इस बात का पूरा-पूरा निश्चय हो गया,
कि मृत्यु तक मनोरथों का अन्त नहीं है, और जो चित्त मनोरथों
में लगा हुआ है, उसमें विज्ञान का उदय कभी नहीं होता।
दोषदर्शनादुभयोः ॥ २८ ॥
अर्थ—प्रकृति और प्रकृति के कार्यों के दोष, इन दोनों के
देखने से रागों की शान्ति होती है, और जिसका चित्त राग-द्वेष
इत्यादिकों से युक्त है, उसको उपदेश फल का देने वाला
नहीं होता।
न मलिनचेतस्युपदेशबीजप्ररोहोऽजवत् ॥ २६ ॥
अर्थ—रागादिकों से मलिन चित्त में उपदेश रूप ज्ञान वृक्ष
का बीज नहीं जमता। राजा अज के समान, राजा अज की इन्दु-
मती स्त्री थी, उस स्त्री से राजा का बड़ाभारी प्रेम था। काल-
वश होकर वह इन्दुमती मृत्यु को प्राप्त हो गई। राजा अज उस-
के वियोग से बड़ाभारी दुःखी हुआ। उसका हृदय स्त्री के वियोग

( १२३ )
से परम मलीन हो गया था। वशिष्ठजी ने उपदेश भी किया,
लेकिन वियोग-मलिन हृदय में उपदेश का अंकुर न जमा।
नाभासमात्रमपि मलिन दर्पणवत् ॥ ३० ॥
अर्थ—मलिन हृदय में उपदेश का आभास-मात्र भी नहीं
पड़ता, जैसे—मैले शीशे में प्रतिबिम्ब ( अक्स ) नहीं दीखता।
न तज्जस्यापि तद्रू पम् पङ्कजवत् ॥ ३१ ॥
अर्थ—मोक्ष भी प्रकृति के ही सहारे से होता है, परन्तु
जैसे प्रकृति से संसार उत्पन्न हुआ है, और वह उसी प्रकृति का
रूप समझा जाता है, वैसे मोक्ष प्रकृति का रूप नहीं हो सकता ;
क्योंकि जैसे पंक ( कीच ) से उत्पन्न हुआ, कमल कीच के रूप
का नहीं होता, वैसे प्रकृति से उत्पन्न हुआ मोक्ष प्रकृति रूप नहीं
हो सकता है।
न भूतियोगेऽपि कृतकृत्यतोपास्यसिद्धिवदु-
पास्य सिद्धिवत् ॥ ३२ ॥
अर्थ—ऊहादि विभूतियों के मिलने पर भी कृत-कृत्यता नहीं
होती ; क्योंकि जैसा उपास्य ( जिसकी उपासना की जाती है )
होगा वैसी ही उपासक को सिद्धि प्राप्त होगी, अर्थात् जो
धनवान् की उपासना की जाती है, तो धन मिलता है, और
दरिद्र की उपासना करने से कुछ भी नहीं मिलता। इसी प्रकार
ऊहा आदि सिद्धियाँ नाश होनेवाली हैं, इस वास्ते उनकी प्राप्ति
से कृतकृत्यता नहीं हो सकती । सिद्धिवत्, सिद्धिवत्, ऐसा जो
दुबारा कहना है, सो अध्याय की समाप्ति का जतानेवाला है ।
इति सांख्यदर्शने चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः

( १२४ )
पंचमोऽध्यायः
महाप कापिलजी ने अपने शास्त्र का सिद्धांत मुक्ति के
साधनों के सम्बन्ध में पहिले चार अध्यायों में विस्तारपूर्वक
वर्णन किया, अब इस अध्याय में वादी प्रतिवादी रूप से जो
शास्त्र में सूक्ष्मतापूर्वक कही हुई बातें हैं, उनका प्रकाश करेंगे ।
कोई वादी शंका करता है, कि मंगलाचरण करना व्यर्थ है, इस
विषय को हेतु गर्भित वाक्यों से प्रतिपादन करते हैं ।
मंगलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनात्
श्रुतितश्चेति ॥ १ ॥
अर्थ—मंगलाचरण करना अवश्य चाहिये ; क्योंकि शिष्टजनों
का यही आचार है, और प्रत्यक्ष में भी यही फल दीखता है।
जो उत्तम आचरण करता है, वही सुख भोगता है । अहरहः
संध्यामुपासीत, अहरहोऽग्निहोत्रं जुहुयात् । रोज-रोज संध्या करनी
चाहिये, रोज-रोज अग्निहोत्र करना चाहिये, इत्यादि श्रुतियाँ भी
अच्छे ही आचरणों को कहती हैं । बहुतेरे मनुष्य मंगलाचरण
का यह अर्थ समझते हैं, कि जब नये ग्रन्थ की रचना की जाय,
तब उस ग्रन्थ के शुरू करने में किसी उत्तम शब्द का लिख देना
उसको मंगलाचरण कहते हैं, ऐसा समझना ठीक नहीं, क्योंकि
पहिले तो मंगलाचरण का वैसा अर्थ नहीं हो सकता, दूसरे यदि
ग्रन्थ के आदि में मङ्गल किया तो अन्यत्र अमंगल होगा ; तीसरे
कादम्बर्यादि ग्रन्थों में मङ्गल के होने पर भी उनकी निर्विघ्न
समाप्ति नहीं हुई, इस वास्ते ऐसा मानना किसी प्रकार श्रेष्ठ
नहीं । इस विषय को संक्षेपतः लिया है, इसका विस्तार बहुत है ।
अन्य ग्रन्थों में कर्म का फल अपने आप होता है, इस पक्ष का
खण्डन करते हैं ।

( १२५ )
नेश्वराधिष्ठिते फलनिष्पत्तिः कर्मणा तत्सिद्धेः॥२
अर्थ—केवल ईश्वर का नाम लेने से अर्थात् मंगलाचरण
से फल नहीं मिल सकता, किन्तु उसका हेतु कर्म है, जिसके
होने से ईश्वर फल देता है, यदि कहो विना कर्म के ईश्वर
फल देता है।
स्वोपकारादधिष्ठानं लोकवत् ॥ ३ ॥
अर्थ—जैसे कि संसार में दीखता है, कि पुरुष अपने उप-
कार के वास्ते कर्मों का फल देनेवाला एक भिन्न नियुक्त करता
है, इसी तरह ईश्वर भी सब के कर्म फल देने के वास्ते एक
अधिष्ठान है।
लौकिके श्वरवदितरथा ॥ ४ ॥
अर्थ—यदि ईश्वर को सब कर्मों का फल देने वाला न माना
जाय, तो लौकिक ईश्वरों की तरह भिन्न-भिन्न कर्मों के फल
देने वाले भिन्न-भिन्न ईश्वर मानने पड़ेंगे, जैसे—संसार में जज,
कलक्टर इत्यादिक भिन्न-भिन्न कर्मों के फल देने वाले भिन्न-
भिन्न ईश्वर हैं ; लेकिन इन लौकिक ईश्वरों में भ्रम, प्रमाद इत्या-
दिक दोष दीखते हैं। यही दोष उस ईश्वर में भी दीख पड़ेंगे।
इसवास्ते ऐसा मानना योग्य नहीं, कि कर्म का फल ईश्वर
नहीं देता।
पारिभाषिको वा ॥ ५ ॥
अर्थ—कर्म का फल अपने आप होता है, ऐसा मानने से
एक दोष और भी प्राप्त होता है, वह दोष यह है कि ईश्वर केवल
नाममात्र ही रह जायगा, क्योंकि कर्मों का फल तो आप ही हो
जाता है, फिर ईश्वर की क्या आवश्यकता रही। और ईश्वर के

( १२६ )
नाममात्र ही रह जाने में यह भी दोष होगा, कि वर्तमान् संसार
की सिद्धि भी न हो सकेगी । .
न रागादृते तत्सिद्धिः प्रतिनियतकारणत्वात्॥६॥
अर्थ—ईश्वर सृष्टि की सिद्धि में प्रति_नियत कारण है, उसके
बिना केवल राग से अर्थात् प्रकृति महदादिकों से संसार की सिद्धि
नहीं हो सकती ।
प्र०—ईश्वर, जीव रूपधारी प्रकृति का सङ्गी है, और उस में
प्रकृति के संयोग होने से रागादिक भी हैं ?
उ०—तद्योगेऽपि न नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥
अर्थ—तुम्हारा यह कथन योग्य ( सत्य ) नहीं, क्योंकि
ईश्वर नित्य मुक्त न रहेगा, अर्थात् जैसे जीव प्रकृति के संगी
होने से अनित्य मुक्त है । इसी तरह ईश्वर को भी मानना पड़ेगा ।
और जो लोग इस तरह ईश्वर को मानते हैं, उनका ईश्वर भी
संसार के जीवों के समान अनित्य मुक्त होगा । यदि ऐसा कहा
जावे कि ईश्वर से संसार बना है, अर्थात् ईश्वर उपादान कारण
है, सो भी सत्य नहीं ।
प्रधानशक्तियोगाच्चेत् संगापत्तिः ॥ ८ ॥
अर्थ—यदि ईश्वर को प्रधान शक्ति का योग हो, तो पुरुष में
सङ्गापत्ति हो जाय, अर्थात् जैसे प्रकृति सूक्ष्म से मिलकर कार्य-
रूप में संगत हुई है, वैसे ईश्वर भी स्थूल हो जाय ; इसवास्ते
ईश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं हो सकता, किन्तु निमित्त-
कारण है ।
सत्तामात्राच्चेत् सर्वैश्वर्यम् ॥ ६ ॥

  • अर्थ—अगर चेतन से जगत् की उत्पत्ति है, तो जिस प्रकार

( १२७ )
॰ परमेश्वर सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त है, इसी तरह सब संसार
भी सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त होना चाहिये, लेकिन संसार में यह
बात नहीं दीखती, इस हेतु से भी परमेश्वर जगत् का उपादान
कारण सिद्ध नहीं होता, किंतु निमित्त कारण ही सिद्ध होता है
और भी पुष्टिकार का इस विषय का यह सूत्र है—
प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ॥ १० ॥
अर्थ-ईश्वर संसार का उपादान कारण है इसमें कोई प्रमाण
नहीं है, इसवास्ते उसकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
सम्बन्धाभावान्नानुमानम् ॥ ११ ॥
अर्थ—जबकि ईश्वर का संसार से उपदान कारण रूप
संबन्ध ही नहीं है, तब ऐसा अनुमान करना कि ईश्वर ही से
जगत् उत्पन्न हुआ है, व्यर्थ है ।
श्रुतिरपि प्रधानकार्यत्वस्य ॥ १२ ॥
अर्थ—जगत् का उपादान कारण प्रकृति ही है इस बात को
श्रुतियाँ भी कहती हैं । “अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वीः प्रजाः
सृजमानां स्वरूपाः” । यह श्वेताश्वेतर उपनिषद् का वाक्य है,
इसका यह अर्थ है कि जो जन्म-रहित सत्त्व, रज, तमोगुण रूप
प्रकृति है वही स्वरूपाकार से बहुत प्रजारूप हो जाती है अर्थात्
परिणामिनी होने से अवस्थान्तर हो जाती है और ईश्वर
अपरिणामी और असंगी है । कोई-कोई ऐसा मानते हैं, कि
ईश्वर को अविद्या सँग होने से बंधन में पड़ना पड़ता है, और
उसी के योग से यह संसार है, इस मत का खंडन करते हैं ।
नाविद्याशक्तियोगो निः संगस्य ॥ १३ ॥
अर्थ—ईश्वर निःसंग है, इसवास्ते उस ईश्वर को अविद्या-
शक्ति का योग नहीं हो सकता ।

( १२८ )
तद्योगे तत्सिद्धावन्योऽन्याश्रयत्वम् ॥ १४ ॥
अर्थ—यदि अविद्या के योग से संसार की सिद्धि मानी
जाय, तो अन्योन्याश्रयत्व दोष प्राप्त होता है, क्योंकि बिना
ईश्वर अविद्या संसार को नहीं कर सकती, और ईश्वर बिना
अविद्या के संसार नहीं बना सकता, यही दोष हुआ। यदि
अविद्या और ईश्वर इन दोनों को एक-कालिक ( एक समय में
होने वाले ) अनादि मानें, जैसे—बीज और अंकुर को मानते
हैं, यह भी सत्य नहीं; क्योंकि—
न बीजांकुरवत् सादिश्रुतेः ॥ १५ ॥
अर्थ—बीज और अंकुर के समान अविद्या और ईश्वर
को मानें, तो यह दोष प्राप्त होता है । “सदेव सौम्येदमग्र आसीत्,
एकमवाद्वितीयं ब्रह्म”। हे सौम्य ! पहिले यह जगत् सत् ही था,
एक ही अद्वितीय ईश्वर है, इत्यादि श्रुतियाँ एक ही ईश्वर को
प्रतिपादन करती हैं, और जगत् को सादि और ईश्वर को अद्वि-
तीय कहती हैं। अगर उसके साथ अविद्या का झगड़ा लगाया
जावे, तो उक्त श्रुतियों में विरोध हो जायगा। यदि ऐसा कहा
जाय, कि हमारी अविद्या योगशास्त्र की-सी नहीं है, किंतु जैसी
आपके मत में प्रकृति है, वैसी ही हमारे मत में अविद्या है, तो
यह मत भी सत्य नहीं है।
विद्यातोऽन्यत्वे ब्रह्मबाधप्रसङ्गः ॥ १६ ॥
अर्थ—यदि विद्या से अतिरिक्त ( दूसरे ) पदार्थ का नाम
अविद्या है, अर्थात् विद्या का नाश करनेवाली अविद्या है, तो
ब्रह्म का भी अवश्य नाश करेगी; क्योंकि वह भी विद्यामय है,
और इस सूत्र का दूसरा यह भी अर्थ है। यदि अविद्या विद्या
रूप ब्रह्म से अतिरिक्त है और उसको विविध ( अनेक प्रकार के

( १२६ )
क ) परिच्छेद रहित ब्रह्म में माना जाता है, और ब्रह्म अविद्या
से अन्य ( अर्थात् दूसरा ) है और अविद्या ब्रह्म से अन्य है,
तो ब्रह्म के परिच्छेद रहित तत्व में बाधा पड़ेगी, इसवास्ते ऐसा
मानना सत्य नहीं ।
प्र०—अविद्या का किसी से बाध हो सकता है, या नहीं ?
इसका ही विचार करते हैं—
अबाधे नैष्फल्यम् ॥ १७ ॥
अर्थ—उस अविद्या का अगर किसी से बाध नहीं हो सकता,
तो मुक्ति आदि विद्याप्राप्ति का उपाय करना निष्फल है ।
विद्याबाध्यत्वे जगतोऽप्येवम् ॥ १८ ॥
अर्थ—यदि विद्या से अविद्या का बाध हो जाता है, तो
अविद्या से उत्पन्न हुये जगत् का भी बाध होना चाहिये ।
तद्रूपत्वे सादित्वम् ॥ १९ ॥
अर्थ—यदि अविद्या को जगत्रूप मानें, अर्थात् जगत् ही
अविद्या है, तो अविद्या में सादिपना आया जाता है, क्योंकि
जगत् सादि है । इसवास्ते अविद्या कोई वस्तु नहीं है, उसी
बुद्धिवृत्ति का नाम अविद्या है, जो महर्षि पातञ्जलि ने कही है ।
और इस विषय में यह भी विचार होता है, कि जब कपिलाचार्य
के मत में सम्पूर्ण कार्यों की विचित्रता का हेतु प्रकृति है, और
वही प्रकृति सुख दुःखादिक का हेतु है, तो धर्म्माधर्म के मानने
की क्या आवश्यकता है । अब इसी पर विचार करके धर्म की
सिद्धि करते हैं ।
उ०—न धर्मऽपलापःप्रकृतिकार्यवैचित्र्यात् ॥२०॥
अर्थ—प्रकृति के कार्यों की विचित्रता से धर्म का अपलाप
( दूर होना ) नहीं हो सकता, क्योंकि—

( १३० )
श्रुतिलिंगादिभिस्तत्सिद्धिः ॥ २१ ॥
अर्थ—उसकी सिद्धि श्रुति और योगियों के प्रत्यक्ष से हो
सकती है । “पुण्यो वै पुण्येन भवति पापः पापेन” पुण्य निश्चय
करके पुण्य से होता है, और यह भी निश्चय है, कि पाप, पाप
से ही उत्पन्न होता है, इत्यादि श्रुतियाँ भी धर्म के फल को
कहती हैं, इसवास्ते धर्म का अपलाप नहीं हो सकता ।
प्र०—धर्म में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, इस वास्ते उसकी
सिद्धि नहीं हो सकती ?
उ०—न नियमः प्रमाणान्तरावकाशात् ॥ २२ ॥
अर्थ—धर्म की सिद्धि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही हो, यह कोई
नियम नहीं है, क्योंकि इसमें अनेक प्रमाण हैं, और प्रत्यक्ष प्रमाण
के सिवाय और प्रमाणों से भी पदार्थ की सिद्धि होती है ।
प्र०—धर्म की तो सिद्धि इस तरह करली गई, लेकिन अधर्म
की तो सिद्धि किसी प्रमाण से नहीं हो सकती ?
उ०—उभयत्राप्येवम् ॥ २३ ॥
अर्थ—जैसे धर्म की सिद्धि में प्रमाण पाए जाते हैं इसी
तरह अधर्म की सिद्धि में भी प्रमाण पाये जाते हैं ।
अर्थात् सिद्धिश्चेत् समानमुभयोः ॥ २४ ॥
अर्थ—वेदादि सत् शास्त्रों में जिस बात की विधि पाई जाती
है वही धर्म है, और इसके सिवाय अधर्म है। यदि इस प्रकार की
अर्थापत्ति निकाली जाय, तौ भी ठीक नहीं, क्योंकि श्रुति आदिकों
में जिस प्रकार धर्म की विधियों का वर्णन है उस ही प्रकार अधर्म
का निषेध भी है, जैसे—“परदारान्नगच्छेत्” पराई स्त्री के समीप

सूत्र में जो आदि शब्द है, उसके कहने से वैशेषिक शास्त्र के

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गमन न करे, इस तरह के वाक्य धर्माधर्म दोनों के विषय में ही
निषेध और विधिरूप से बराबर पाये जाते हैं ।
प्र०—यदि धर्मादि को आप मानते हैं, तो पुरुष को धर्मवाला
मानकर पुरुष में परिणामित्व प्राप्त होता है ?
उ०—अन्तःकरणधर्मत्वं धर्मादीनाम् ॥ २५ ॥
अर्थ—धर्मादिक अन्तःकरण के धर्म हैं, अर्थात् इन धर्मा-
दिकों का संबंध अन्तःकरण से है, जीव से नहीं है, और इस
सूत्र में जो आदि शब्द है, उसके कहने से वैशेषिक शास्त्र के
आचार्यों ने जो आत्मा के विशेष गुण माने हैं, उनका ही
ग्रहण माना गया है अर्थात् वही आत्मा के विशेष गुण माने
गये हैं । प्रलयावस्था में तो अन्तःकरण रहता ही नहीं, तब
धर्मादिक कहां रहते हैं, ऐसा तर्क नहीं करना चाहिये । कारण
यह है कि आकाश के समान अन्तःकरण भी नाश रहित है,
अर्थात् अन्तःकरण का नाश सिवाय मुक्ति के कदापि नहीं होता,
और इस बात को पहिले कह भी चुके हैं, कि अन्तःकरण कार्य-
कारणभाव दोनों रूप को धारण करता है । इससे अन्तःकरण
रूप जो प्रकृति का अंश विशेष है, उससे धर्म अधर्म दोनों के
संस्कार रहते हैं । इस बात को ही किसी कवि ने भी कहा है,
कि धर्म नित्य है । और सुख दुःखादि सब अनित्य हैं । इस
विषय में यह संदेह भी उत्पन्न होता है, कि प्रकृति के कार्यों की
विचित्रता से जो धर्म अधर्म आदि की सिद्धि की गई है वह
सत्य नहीं, क्योंकि प्रकृति तो त्रिगुणात्मक अर्थात् रजोगुण,
तमोगुण, सत्त्वगुण, इनसे युक्त है, और उसके कार्यों का बाध
इन श्रुतियों से प्रत्यक्ष मालूम पड़ता है । "वाचारम्भणं विकारो
नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” घट-पट आदि सब कहनेमात्र
को ही हैं, केवल मृत्तिका (मिट्टी) ही सत्य है । इसवास्ते

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प्रकृति के गुण मानना सत्य नहीं, इस पक्ष के खण्डन के वास्ते
यह सूत्र है—
गुणादीनां च नात्यन्तबाधः ॥ २६ ॥
अर्थ—गुण जो सत्वादिक अर्थात् सत्व, रज, तम, उनके
धर्म जो सुखादिक और उनके कार्य जो महदादिक हैं, उनका
स्वरूप से बाध्य नहीं है, अर्थात् स्वरूप से नाश नहीं होता ;
किन्तु संसर्ग से बाध्य होता है, जैसे—आग के संसर्ग ( मेल )
से जल की स्वाभाविक शीतलता का बाध्य हो जाता है, परन्तु
उसके स्वरूप का बाध्य नहीं होता ; इसी तरह प्रकृति के गुणों
का भी बाध्य नहीं होता ।
पंचऽवयवयोगात् सुखसंवित्तिः ॥ २७ ॥
अर्थ—सुखादि पदार्थों की सिद्धि पंचावयव वाक्य से होती
है, जिस तरह न्याय-शास्त्र में मानी गई है। इस कारण जब
सुख आदि की सिद्धि न्याय-शास्त्र के अनुसार मान ली जाती
है, तब उनका स्वरूप से नाश भी नहीं माना जा सकता। क्यों-
कि जो पदार्थ सत् है, उसका नाश नहीं हो सकता, और उस
पंचावयव वाक्य से सुखादि की संवित्ति इस तरह होती है, कि
प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन इन पाँचों को
सुख में इस तरह लगाना चाहिये, कि सुख सत् है, इसका नाम
प्रतिज्ञा है ; प्रयोजन क्रियाकारी होने से इसका नाम हेतु है,
जैसे चेतन प्रयोजन की क्रियाओं का कर्त्ता है, उसी तरह इसका
नाम भी दृष्टान्त है। पुलकित ( रूंओं का खड़ा होना ) आदि
प्रयोजन की क्रिया सुख में है, इसका नाम उपनयन है ; इस-
वास्ते वह सच्चा है, यह निगमन है। यहाँ केवल सुख का ग्रहण
करना नाममात्र ही है। इसी तरह और गुणों का स्वरूप से

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नाश नहीं होता। इस जगह आचार्य ने न्याय का विषय इसवास्ते
वर्णन किया है, कि इन पाँच बातों के बिना किसी झूठे-सच्चे पदार्थ
का निश्चय नहीं हो सकता, और जो इस पंचावयव से सिद्ध नहीं
हो सकता उसमें अनुमान करना भी सत्य नहीं, और एक
नास्तिक जोकि प्रत्यक्ष के सिवाय और प्रमाणों को नहीं मानता,
और इस पंचावयव के मुख्य सिद्धान्त व्यक्ति का खंडन करने
के आशय से इस सत्ताइसवें सूत्र से उसमें दोष और अनुमान
को असंगत बतलाता है।
न सकृद्ग्रहणात्संबन्धसिद्धिः ॥ २८ ॥
अर्थ—जहाँ धुँआ होगा, वहाँ अग्नि भी होगी। इस साह-
चर्य के स्वीकार ( मानने ) से व्याप्तिरूपी संबन्ध की सिद्धि नहीं
होती ; क्योंकि आग में धुँआ सदा नहीं रहता, और जो महानस
( रसोई के स्थान ) का दृष्टान्त दिया जाता है, वह भी सत्य
नहीं है, क्योंकि किसी जगह अग्नि और घोड़ा इन दोनों को
किसी आदमी ने देखा, अब दूसरी जगह उसको घोड़ा नज़र
पड़ा, तब वह ऐसा अनुमान नहीं कर सकता, कि यहाँ अग्नि भी
होगी ; क्योंकि घोड़ा दीखता है। ऐसे ही अग्नि और घोड़ा
मैंने वहाँ भी देखा था। बस इस पूर्वपक्ष से नैयायिक जैसा
अनुमान करते हैं, वह अयुक्त सिद्ध हुआ, और प्रत्यक्ष को ही
माननेवाले चार्वाक नास्तिक के मत की पुष्टि हुई। इसका यह
उत्तर है—
नियतधर्मसाहित्यमुभयोरेकतरस्य वा व्याप्तिः२९
अर्थ—जिन दो पदार्थों का व्याप्य-व्यापक भाव होता है,
उन दोनों पदार्थों में से एक का अथवा दोनों का जो नियत धर्म
है, उसके साहित्य ( साथ रहने का नियम ) होने को व्याप्ति

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कहते हैं । विशेष व्याख्या इस तरह है, कि जैसे पहाड़ पर आग
है, क्योंकि धुँआ दीखता है। जहाँ-जहाँ धुंआँ होता है, वहीं-
वहीं आग भी अवश्य होती है । इसका नाम ही व्याप्ति है।
इससे यह जानना चाहिये, कि धुँआँ बिना आग के नहीं रह
सकता, परन्तु आग बिना धुएँ के रह सकती है ; इससे सिद्ध
हुआ, कि धुएँ का आग के साथ रहना नियत धर्म-साहित्य है;
परन्तु यह एक का नियत धर्म-साहित्य हुआ । चार्वाक ने जो
अग्नि घोड़े का दृष्टान्त देकर व्याप्ति का खण्डन किया था,
वह भी सत्य नहीं हो सकता ; क्योंकि घोड़ा तो सैकड़ों जगह
बिना अग्नि के दीखने में आता है और आग को बिना घोड़े
के देखते हैं, इस वास्ते वह साहचर्य नहीं रहा, अतएव वह सब
अयुक्त सिद्ध हो गया । अब रहा दोनों का नियत धर्म-साहित्य
वह गंध और पृथिवी में मिलता है, अर्थात् जहाँ पृथिवी होगी, वहाँ
गंध अवश्य होगा, और जहाँ गंध होगी वहाँ पृथिवी भी अवश्य
होगी। इन दोनों में से बिना एक के एक नहीं रह सकता है।
न तत्वान्तरं वस्तुकल्पनाऽप्रसक्तेः ॥ ३० ॥
अर्थ—पहिले सूत्र में जो व्याप्ति का लक्षण किया गया है,
उसके सिवाय किसी और पदार्थ का नाम व्याप्ति नहीं हो सकता,
क्योंकि इस प्रकार अनेक तरह की व्याप्ति मानने में एक नया
पदार्थ कल्पना करना पड़ेगा। इस वास्ते व्याप्ति का वही लक्षण
सत्य है जो पहिले सूत्र में किया है ।
निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः ॥ ३१ ॥
अर्थ—जो व्याप्य की शक्ति से उत्पन्न किसी विशेष शक्ति
का रूप हो, वही व्याप्ति आचार्यों के मत में मानने लायक है।
इस सूत्र का आशय इस दृष्टान्त से समझाना चाहिये, कि व्याप्य