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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 192 में से

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पृष्ठ 126

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नेश्वराधिष्ठिते फलनिष्पत्तिः कर्मणा तत्सिद्धेः॥२
अर्थ—केवल ईश्वर का नाम लेने से अर्थात् मंगलाचरण
से फल नहीं मिल सकता, किन्तु उसका हेतु कर्म है, जिसके
होने से ईश्वर फल देता है, यदि कहो विना कर्म के ईश्वर
फल देता है।
स्वोपकारादधिष्ठानं लोकवत् ॥ ३ ॥
अर्थ—जैसे कि संसार में दीखता है, कि पुरुष अपने उप-
कार के वास्ते कर्मों का फल देनेवाला एक भिन्न नियुक्त करता
है, इसी तरह ईश्वर भी सब के कर्म फल देने के वास्ते एक
अधिष्ठान है।
लौकिके श्वरवदितरथा ॥ ४ ॥
अर्थ—यदि ईश्वर को सब कर्मों का फल देने वाला न माना
जाय, तो लौकिक ईश्वरों की तरह भिन्न-भिन्न कर्मों के फल
देने वाले भिन्न-भिन्न ईश्वर मानने पड़ेंगे, जैसे—संसार में जज,
कलक्टर इत्यादिक भिन्न-भिन्न कर्मों के फल देने वाले भिन्न-
भिन्न ईश्वर हैं ; लेकिन इन लौकिक ईश्वरों में भ्रम, प्रमाद इत्या-
दिक दोष दीखते हैं। यही दोष उस ईश्वर में भी दीख पड़ेंगे।
इसवास्ते ऐसा मानना योग्य नहीं, कि कर्म का फल ईश्वर
नहीं देता।
पारिभाषिको वा ॥ ५ ॥
अर्थ—कर्म का फल अपने आप होता है, ऐसा मानने से
एक दोष और भी प्राप्त होता है, वह दोष यह है कि ईश्वर केवल
नाममात्र ही रह जायगा, क्योंकि कर्मों का फल तो आप ही हो
जाता है, फिर ईश्वर की क्या आवश्यकता रही। और ईश्वर के