सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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क ) परिच्छेद रहित ब्रह्म में माना जाता है, और ब्रह्म अविद्या
से अन्य ( अर्थात् दूसरा ) है और अविद्या ब्रह्म से अन्य है,
तो ब्रह्म के परिच्छेद रहित तत्व में बाधा पड़ेगी, इसवास्ते ऐसा
मानना सत्य नहीं ।
प्र०—अविद्या का किसी से बाध हो सकता है, या नहीं ?
इसका ही विचार करते हैं—
अबाधे नैष्फल्यम् ॥ १७ ॥
अर्थ—उस अविद्या का अगर किसी से बाध नहीं हो सकता,
तो मुक्ति आदि विद्याप्राप्ति का उपाय करना निष्फल है ।
विद्याबाध्यत्वे जगतोऽप्येवम् ॥ १८ ॥
अर्थ—यदि विद्या से अविद्या का बाध हो जाता है, तो
अविद्या से उत्पन्न हुये जगत् का भी बाध होना चाहिये ।
तद्रूपत्वे सादित्वम् ॥ १९ ॥
अर्थ—यदि अविद्या को जगत्रूप मानें, अर्थात् जगत् ही
अविद्या है, तो अविद्या में सादिपना आया जाता है, क्योंकि
जगत् सादि है । इसवास्ते अविद्या कोई वस्तु नहीं है, उसी
बुद्धिवृत्ति का नाम अविद्या है, जो महर्षि पातञ्जलि ने कही है ।
और इस विषय में यह भी विचार होता है, कि जब कपिलाचार्य
के मत में सम्पूर्ण कार्यों की विचित्रता का हेतु प्रकृति है, और
वही प्रकृति सुख दुःखादिक का हेतु है, तो धर्म्माधर्म के मानने
की क्या आवश्यकता है । अब इसी पर विचार करके धर्म की
सिद्धि करते हैं ।
उ०—न धर्मऽपलापःप्रकृतिकार्यवैचित्र्यात् ॥२०॥
अर्थ—प्रकृति के कार्यों की विचित्रता से धर्म का अपलाप
( दूर होना ) नहीं हो सकता, क्योंकि—