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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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गमन न करे, इस तरह के वाक्य धर्माधर्म दोनों के विषय में ही
निषेध और विधिरूप से बराबर पाये जाते हैं ।
प्र०—यदि धर्मादि को आप मानते हैं, तो पुरुष को धर्मवाला
मानकर पुरुष में परिणामित्व प्राप्त होता है ?
उ०—अन्तःकरणधर्मत्वं धर्मादीनाम् ॥ २५ ॥
अर्थ—धर्मादिक अन्तःकरण के धर्म हैं, अर्थात् इन धर्मा-
दिकों का संबंध अन्तःकरण से है, जीव से नहीं है, और इस
सूत्र में जो आदि शब्द है, उसके कहने से वैशेषिक शास्त्र के
आचार्यों ने जो आत्मा के विशेष गुण माने हैं, उनका ही
ग्रहण माना गया है अर्थात् वही आत्मा के विशेष गुण माने
गये हैं । प्रलयावस्था में तो अन्तःकरण रहता ही नहीं, तब
धर्मादिक कहां रहते हैं, ऐसा तर्क नहीं करना चाहिये । कारण
यह है कि आकाश के समान अन्तःकरण भी नाश रहित है,
अर्थात् अन्तःकरण का नाश सिवाय मुक्ति के कदापि नहीं होता,
और इस बात को पहिले कह भी चुके हैं, कि अन्तःकरण कार्य-
कारणभाव दोनों रूप को धारण करता है । इससे अन्तःकरण
रूप जो प्रकृति का अंश विशेष है, उससे धर्म अधर्म दोनों के
संस्कार रहते हैं । इस बात को ही किसी कवि ने भी कहा है,
कि धर्म नित्य है । और सुख दुःखादि सब अनित्य हैं । इस
विषय में यह संदेह भी उत्पन्न होता है, कि प्रकृति के कार्यों की
विचित्रता से जो धर्म अधर्म आदि की सिद्धि की गई है वह
सत्य नहीं, क्योंकि प्रकृति तो त्रिगुणात्मक अर्थात् रजोगुण,
तमोगुण, सत्त्वगुण, इनसे युक्त है, और उसके कार्यों का बाध
इन श्रुतियों से प्रत्यक्ष मालूम पड़ता है । "वाचारम्भणं विकारो
नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” घट-पट आदि सब कहनेमात्र
को ही हैं, केवल मृत्तिका (मिट्टी) ही सत्य है । इसवास्ते