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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 192 में से

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बात को श्रुतियाँ भी प्रतिपादन करती हैं। वह श्रुतियाँ छान्दोग्य
उपनिषद् के पञ्चम प्रपाठक के आदि में हैं, यहाँ विस्तार भय
से उनको नहीं लिखा है।
विरक्तस्य हेयहानमुपादेयोपादानं हंसक्षीरवत् ।२३
अर्थ—जो विरक्त है, अर्थात् जिसको विवेक हो गया है,
उसको हेय ( छोड़ने योग्य ) का तो त्याग और उपादेय ( ग्रहण
करने योग्य ) का ग्रहण करना चाहिये। हेय अर्थात् छोड़ने
लायक संसार है। उपादेय-ग्रहण करने लायक मुक्ति है, जैसे—
हंस जल को छोड़कर दूध पी लेते हैं, इसी तरह विरक्त को
भी करना चाहिये।
लब्धातिशययोगाद्वा तद्वत् ॥ २४ ॥
अर्थ—अथवा जो ज्ञान की पराकाष्ठा ( हद ) को प्राप्त
हो गया है, यदि उसका सङ्ग हो जाय, तो भी पहिले कहे
हुए हंस के समान विवेकी हो सकता है।
न कामचारित्वं रागोपहते शुकवत् ॥ २५ ॥
अर्थ—राग के नाश हो जाने पर भी कामचारित्व ( इच्छा-
धीन ) न होना चाहिये, कारण यह है कि फिर बन्धन में पड़ने
का भय प्राप्त हो सकता है। दृष्टान्त—जैसे कोई तोता दाने
के लालच में होकर बन्धन में पड़ गया था, जब उसको मौक़ा
मिला तब वह उस बन्धन में से भाग गया, फिर उस बन्धन के
पास भय के मारे नहीं आया। क्योंकि अगर इसके पास जाऊँगा
तो फिर बन्धन को प्राप्त होऊँगा। इसी पक्ष की और भी
पुष्टि करेंगे।
गुणयोगाद्बद्धः शुकवत् ॥ २६