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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 192 में से

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पृष्ठ 129

( १२८ )
तद्योगे तत्सिद्धावन्योऽन्याश्रयत्वम् ॥ १४ ॥
अर्थ—यदि अविद्या के योग से संसार की सिद्धि मानी
जाय, तो अन्योन्याश्रयत्व दोष प्राप्त होता है, क्योंकि बिना
ईश्वर अविद्या संसार को नहीं कर सकती, और ईश्वर बिना
अविद्या के संसार नहीं बना सकता, यही दोष हुआ। यदि
अविद्या और ईश्वर इन दोनों को एक-कालिक ( एक समय में
होने वाले ) अनादि मानें, जैसे—बीज और अंकुर को मानते
हैं, यह भी सत्य नहीं; क्योंकि—
न बीजांकुरवत् सादिश्रुतेः ॥ १५ ॥
अर्थ—बीज और अंकुर के समान अविद्या और ईश्वर
को मानें, तो यह दोष प्राप्त होता है । “सदेव सौम्येदमग्र आसीत्,
एकमवाद्वितीयं ब्रह्म”। हे सौम्य ! पहिले यह जगत् सत् ही था,
एक ही अद्वितीय ईश्वर है, इत्यादि श्रुतियाँ एक ही ईश्वर को
प्रतिपादन करती हैं, और जगत् को सादि और ईश्वर को अद्वि-
तीय कहती हैं। अगर उसके साथ अविद्या का झगड़ा लगाया
जावे, तो उक्त श्रुतियों में विरोध हो जायगा। यदि ऐसा कहा
जाय, कि हमारी अविद्या योगशास्त्र की-सी नहीं है, किंतु जैसी
आपके मत में प्रकृति है, वैसी ही हमारे मत में अविद्या है, तो
यह मत भी सत्य नहीं है।
विद्यातोऽन्यत्वे ब्रह्मबाधप्रसङ्गः ॥ १६ ॥
अर्थ—यदि विद्या से अतिरिक्त ( दूसरे ) पदार्थ का नाम
अविद्या है, अर्थात् विद्या का नाश करनेवाली अविद्या है, तो
ब्रह्म का भी अवश्य नाश करेगी; क्योंकि वह भी विद्यामय है,
और इस सूत्र का दूसरा यह भी अर्थ है। यदि अविद्या विद्या
रूप ब्रह्म से अतिरिक्त है और उसको विविध ( अनेक प्रकार के