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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 192 में से

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कहते हैं । विशेष व्याख्या इस तरह है, कि जैसे पहाड़ पर आग
है, क्योंकि धुँआ दीखता है। जहाँ-जहाँ धुंआँ होता है, वहीं-
वहीं आग भी अवश्य होती है । इसका नाम ही व्याप्ति है।
इससे यह जानना चाहिये, कि धुँआँ बिना आग के नहीं रह
सकता, परन्तु आग बिना धुएँ के रह सकती है ; इससे सिद्ध
हुआ, कि धुएँ का आग के साथ रहना नियत धर्म-साहित्य है;
परन्तु यह एक का नियत धर्म-साहित्य हुआ । चार्वाक ने जो
अग्नि घोड़े का दृष्टान्त देकर व्याप्ति का खण्डन किया था,
वह भी सत्य नहीं हो सकता ; क्योंकि घोड़ा तो सैकड़ों जगह
बिना अग्नि के दीखने में आता है और आग को बिना घोड़े
के देखते हैं, इस वास्ते वह साहचर्य नहीं रहा, अतएव वह सब
अयुक्त सिद्ध हो गया । अब रहा दोनों का नियत धर्म-साहित्य
वह गंध और पृथिवी में मिलता है, अर्थात् जहाँ पृथिवी होगी, वहाँ
गंध अवश्य होगा, और जहाँ गंध होगी वहाँ पृथिवी भी अवश्य
होगी। इन दोनों में से बिना एक के एक नहीं रह सकता है।
न तत्वान्तरं वस्तुकल्पनाऽप्रसक्तेः ॥ ३० ॥
अर्थ—पहिले सूत्र में जो व्याप्ति का लक्षण किया गया है,
उसके सिवाय किसी और पदार्थ का नाम व्याप्ति नहीं हो सकता,
क्योंकि इस प्रकार अनेक तरह की व्याप्ति मानने में एक नया
पदार्थ कल्पना करना पड़ेगा। इस वास्ते व्याप्ति का वही लक्षण
सत्य है जो पहिले सूत्र में किया है ।
निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः ॥ ३१ ॥
अर्थ—जो व्याप्य की शक्ति से उत्पन्न किसी विशेष शक्ति
का रूप हो, वही व्याप्ति आचार्यों के मत में मानने लायक है।
इस सूत्र का आशय इस दृष्टान्त से समझाना चाहिये, कि व्याप्य