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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 192 में से

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पृष्ठ 128

( १२७ )
॰ परमेश्वर सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त है, इसी तरह सब संसार
भी सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त होना चाहिये, लेकिन संसार में यह
बात नहीं दीखती, इस हेतु से भी परमेश्वर जगत् का उपादान
कारण सिद्ध नहीं होता, किंतु निमित्त कारण ही सिद्ध होता है
और भी पुष्टिकार का इस विषय का यह सूत्र है—
प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ॥ १० ॥
अर्थ-ईश्वर संसार का उपादान कारण है इसमें कोई प्रमाण
नहीं है, इसवास्ते उसकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
सम्बन्धाभावान्नानुमानम् ॥ ११ ॥
अर्थ—जबकि ईश्वर का संसार से उपदान कारण रूप
संबन्ध ही नहीं है, तब ऐसा अनुमान करना कि ईश्वर ही से
जगत् उत्पन्न हुआ है, व्यर्थ है ।
श्रुतिरपि प्रधानकार्यत्वस्य ॥ १२ ॥
अर्थ—जगत् का उपादान कारण प्रकृति ही है इस बात को
श्रुतियाँ भी कहती हैं । “अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वीः प्रजाः
सृजमानां स्वरूपाः” । यह श्वेताश्वेतर उपनिषद् का वाक्य है,
इसका यह अर्थ है कि जो जन्म-रहित सत्त्व, रज, तमोगुण रूप
प्रकृति है वही स्वरूपाकार से बहुत प्रजारूप हो जाती है अर्थात्
परिणामिनी होने से अवस्थान्तर हो जाती है और ईश्वर
अपरिणामी और असंगी है । कोई-कोई ऐसा मानते हैं, कि
ईश्वर को अविद्या सँग होने से बंधन में पड़ना पड़ता है, और
उसी के योग से यह संसार है, इस मत का खंडन करते हैं ।
नाविद्याशक्तियोगो निः संगस्य ॥ १३ ॥
अर्थ—ईश्वर निःसंग है, इसवास्ते उस ईश्वर को अविद्या-
शक्ति का योग नहीं हो सकता ।