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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 192 में से

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पृष्ठ 134

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नाश नहीं होता। इस जगह आचार्य ने न्याय का विषय इसवास्ते
वर्णन किया है, कि इन पाँच बातों के बिना किसी झूठे-सच्चे पदार्थ
का निश्चय नहीं हो सकता, और जो इस पंचावयव से सिद्ध नहीं
हो सकता उसमें अनुमान करना भी सत्य नहीं, और एक
नास्तिक जोकि प्रत्यक्ष के सिवाय और प्रमाणों को नहीं मानता,
और इस पंचावयव के मुख्य सिद्धान्त व्यक्ति का खंडन करने
के आशय से इस सत्ताइसवें सूत्र से उसमें दोष और अनुमान
को असंगत बतलाता है।
न सकृद्ग्रहणात्संबन्धसिद्धिः ॥ २८ ॥
अर्थ—जहाँ धुँआ होगा, वहाँ अग्नि भी होगी। इस साह-
चर्य के स्वीकार ( मानने ) से व्याप्तिरूपी संबन्ध की सिद्धि नहीं
होती ; क्योंकि आग में धुँआ सदा नहीं रहता, और जो महानस
( रसोई के स्थान ) का दृष्टान्त दिया जाता है, वह भी सत्य
नहीं है, क्योंकि किसी जगह अग्नि और घोड़ा इन दोनों को
किसी आदमी ने देखा, अब दूसरी जगह उसको घोड़ा नज़र
पड़ा, तब वह ऐसा अनुमान नहीं कर सकता, कि यहाँ अग्नि भी
होगी ; क्योंकि घोड़ा दीखता है। ऐसे ही अग्नि और घोड़ा
मैंने वहाँ भी देखा था। बस इस पूर्वपक्ष से नैयायिक जैसा
अनुमान करते हैं, वह अयुक्त सिद्ध हुआ, और प्रत्यक्ष को ही
माननेवाले चार्वाक नास्तिक के मत की पुष्टि हुई। इसका यह
उत्तर है—
नियतधर्मसाहित्यमुभयोरेकतरस्य वा व्याप्तिः२९
अर्थ—जिन दो पदार्थों का व्याप्य-व्यापक भाव होता है,
उन दोनों पदार्थों में से एक का अथवा दोनों का जो नियत धर्म
है, उसके साहित्य ( साथ रहने का नियम ) होने को व्याप्ति