सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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अर्थ—जब काम जारी रहेगा, तब उसके गुणों में किसी
की प्रीति हो जायगी, तो भी उस विवेकी को फिर बद्ध होना
पड़ेगा, जैसे—मनोहर भाषण ( बोलना ) आदि गुणों से तोते
का बन्धन हो जाता है।
न भोगाद्रागशान्तिर्मु'निवत् ॥ २७ ॥
अर्थ—भोगों को पूर्णरूप से भोगने से भी राग की शान्ति
नहीं होती, जैसे—सौभरि नाम वाले मुनि ने भोगों को खूब
अच्छी तरह भोगा, लेकिन उससे कुछ भी शान्ति न हुई। मृत्यु के
समय उन महात्मा ने ऐसा कहा भी था कि—
आमृत्युतो नैवमनोरथानामन्तोऽस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य।
मनोरथासक्तिपरस्यचित्तं न जायते वै परमार्थसङ्गि ॥
अर्थ—आज मुझको इस बात का पूरा-पूरा निश्चय हो गया,
कि मृत्यु तक मनोरथों का अन्त नहीं है, और जो चित्त मनोरथों
में लगा हुआ है, उसमें विज्ञान का उदय कभी नहीं होता।
दोषदर्शनादुभयोः ॥ २८ ॥
अर्थ—प्रकृति और प्रकृति के कार्यों के दोष, इन दोनों के
देखने से रागों की शान्ति होती है, और जिसका चित्त राग-द्वेष
इत्यादिकों से युक्त है, उसको उपदेश फल का देने वाला
नहीं होता।
न मलिनचेतस्युपदेशबीजप्ररोहोऽजवत् ॥ २६ ॥
अर्थ—रागादिकों से मलिन चित्त में उपदेश रूप ज्ञान वृक्ष
का बीज नहीं जमता। राजा अज के समान, राजा अज की इन्दु-
मती स्त्री थी, उस स्त्री से राजा का बड़ाभारी प्रेम था। काल-
वश होकर वह इन्दुमती मृत्यु को प्राप्त हो गई। राजा अज उस-
के वियोग से बड़ाभारी दुःखी हुआ। उसका हृदय स्त्री के वियोग