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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( १०१ )
अर्थ—ब्राह्मणों से लेकर स्थावरादि तक जितनी सृष्टि है,
वह सर्व पुरुष के ही वास्ते है, और उसे भी विवेक के होने तक
ही सृष्टि रहती है, बाद को मुक्ति होने से छूट जाती है। अब
तीन सूत्रों से सृष्टि के विभाग को कहते हैं—
ऊर्ध्वं सत्वविशाला ॥४८॥
अर्थ—जो सृष्टि ऊपर है, वह सत्व-प्रधान है। यहाँपर ऊपर
कहने से आचार्य का प्रयोजन ज्ञान के मार्ग से उन्नति करने
वालों से है, अर्थात् सतोगुणी उन्नति करते हैं, क्योंकि सतो-
गुण प्रकाश करता है, इस कारण सतोगुणी अर्थात् ज्ञानी लोग
सदा उन्नति करते हैं, इस कारण ऊपर जाते हैं।
तमोविशाला मूलतः ॥४९॥
अर्थ—तमोगुणी अन्तःकरण वाले जीव नीच गति अर्थात्
पशु-पक्षी और कीड़े आदि की योनियों को प्राप्त होते हैं।
मध्ये रजोविशाला ॥५०॥
अर्थ—और बीच में जो शरीर हैं, वे रजोगुण प्रधान हैं।
बीच का शरीर सामान्य मनुष्य का जन्म है, और सब शरीर
इसकी अपेक्षा ऊँचे हैं, या नीचे। सामान्य मनुष्य रजोगुणी
होता है। सत्पुरुष सतोगुणी, पशु आदि तमोगुणी। इस के अन्दर
भी भेद हैं।
प्र०—प्रकृति तो एक ही है, लेकिन सृष्टि अनेक तरह की
क्यों होती है ?
उ०—कर्मवैचित्र्यात् प्रधानचेष्टा गर्भदासवत् ॥५१
अर्थ—यह सब प्रधान अर्थात् प्रकृति की चेष्टा कर्मों की
विचित्रता से होती है, इस में दृष्टान्त भी है, जैसे—कोई दासी

( १०२ )
अपने स्वामी के वास्ते नाना प्रकार की चेष्टा ( टहल ) करती
है, वैसे ही उसका पुत्र भी अपने स्वामी के प्रसन्नतार्थ नाना प्रकार
की चेष्टा करने लगता है, अतएव जो जैसा कर्म करेगा उसकी
सृष्टि भी वैसा ही कर्म करेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ।
प्र०—ऊर्ध्व की सृष्टि सत्त्वगुण प्रधान है, तो मनुष्य उसी
से कृतार्थ हो सकता है, फिर मोक्ष से क्या करना है ?
उ०—आवृत्तिस्तत्राप्युत्तरोत्तरयोनियोगाद्धेयः॥५२
अर्थ—उन ऊपर के और नीचे के देशों में भी आवृत्ति योग
रहता है, अर्थात् जब वहाँ गये तब सात्विकी वृत्ति रही, और
यहाँ रहे तब वही रजोगुण फिर आगया, और वहाँ भी छोटी
बड़ी जातियाँ होती हैं, उनमें जन्म होने से ठीक-ठीक सत्व नहीं
रहता ; इस वास्ते ऐसा विचार करना सब तरह छोड़ने योग्य है।
और भी इस पक्ष को पुष्ट करते हैं ।
समानं जरामरणादिजं दुःखम् ॥५३॥
किसी शरीर में हों, चाहे देवता हों, चाहे सामान्य मनुष्य
अथवा पशु, पक्षी—बुढ़ापे और मृत्यु का दुःख सब में होता है ;
इस कारण सब शरीरों की अपेक्षा मुक्त होना ही उत्तम है ।
प्र०—जिस से यह शरीर उत्पन्न हुआ है, यदि उसी में लय
हो जाय, तब क्या मुक्ति नहीं मानी जायगी ?
उ०—न कारणलयात् कृतकृत्या मग्नव-
दुत्थानात् ॥५४॥
अर्थ—कारण में लय हो जाने से भी कृतकृत्यता नहीं होती,
क्योंकि जैसे मनुष्य जब जल में डूबता है, तो कभी तो ऊपर
को आता है, और कभी नीचे को बैठ जाता है । इसी तरह
जो मनुष्य कारण में लय हो गया है, कभी जन्म को प्राप्त होता

( १०३ )
है, कभी मरण को प्राप्त होता है, और ऐसा कहने से आचार्य
का यह तात्पर्य नहीं है कि मुक्त-जीव कभी जन्म को नहीं प्राप्त
होता ; क्योंकि प्रथम तो आचार्य जीव को नित्य मानते हैं, जब
उसका कारण ही नहीं तो लय किसमें होगा। दूसरे जो डूबे
हुये का दृष्टान्त दिया, अशान्ति का पोपक दिया तथा इस में
पराधीनता दिखाई ; किन्तु मुक्त-जीवन तो न अशान्त है न पराये
अधीन है। तीसरे यहाँ पर सृष्टि का प्रसंग चला आता है,
किन्तु जीव का विषय भी नहीं है ; इसलिये अन्तःकरण के
सुषुप्ति में प्रकृति में लय होने से तात्पर्य है।
प्र०—जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं, तो
प्रकृति ही में सृष्टि का कर्तृत्व क्यों माना जाता है ?
उ०—अकार्यत्वेऽपि तद्योगः पारवश्यात् ॥५५॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष दोनों अकार्य अर्थात् नित्य
हैं तथापि प्रकृति को ही सृष्टि करने का योग है ; क्योंकि जो
परवश होगा वही तो कार्य को करेगा। इस विचार से प्रकृति
ही में परवशता दीखती है।
प्र०—स हि सर्ववित् सर्वकर्त्ता ॥५६॥
अर्थ—यदि प्रकृतिरूपी पदार्थ को सर्वज्ञ और सर्ववित्
( "विद् सत्तायाम्" इस धातु का प्रयोग है ) सर्वशक्तिमान् मान
लिया जाय तो क्या हानि है ?
उ०—ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा ॥ ५७ ॥
अर्थ—इस तरह वेद के प्रमाणों से ईश्वर को सिद्धि सिद्ध
है। प्रकृति में सर्वज्ञत्वादि गुण तो किसी सूरत में नहीं हो सकते
हैं, सर्वज्ञत्वादि गुण तो ईश्वर ही में हैं।
प्र०—प्रकृति ने सृष्टि को क्यों पैदा किया ?

( १०४ )
उ०-प्रधानसृष्टिः परार्थं स्वतोऽप्यभोक्तृत्वा-
दुष्ट्रकुङ्कुमवहनवत् ॥ ५८ ॥
अर्थ-प्रधान जो सृष्टि है उसकी सृष्टि दूसरे के वास्ते है ;
क्योंकि वह स्वयं भोग नहीं कर सकती । दृष्टान्त-जैसे कि ऊँट
केशर को अपने ऊपर लादकर पराये वास्ते ले जाता है लेकिन उस
केशर से अपना कुछ स्वार्थ नहीं रखता । इसी प्रकार प्रकृत की
सृष्टि भी दूसरे के वास्ते है ।
प्र०-ऊँट का जो दृष्टांत दिया गया सो ऊँट चेतन है, और
चेतन की चेष्टा दूसरे के वास्ते हो सकती है, लेकिन जड़ की नहीं
हो सकती ?
उ०--अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य ॥५९
अर्थ-यद्यपि प्रकृति अचेतन है, तथापि उसकी प्रवृत्ति
दूसरे के वास्ते है । दृष्टान्त-जैसे कि दूध जड़ है, लेकिन उसकी
प्रवृत्ति चैतन्य बछड़ा आदि के वास्ते है । और भी दृष्टान्त है-
कर्म्मवद्दृष्टेर्वा कालादेः ॥६०॥
अर्थ-जैसेकि खेती के करने में बीज बोया जाता है, वह
अपनी ऋतु के समय में वृक्षरूप को धारण कर दूसरों के
उपकारार्थ फल देता है ; इसी प्रकार प्रकृति की सृष्टि भी दूसरों के
वास्ते है ।
प्र०-ऊँट तो पिटने के डर से केशर को लादकर ले जाता
है, लेकिन प्रकृति को तो किसी का डर नहीं है ?
उ०-स्वभावाच्चेष्टितमनभिसन्धानाद्भृत्य-
वत् ॥ ६१ ॥
अर्थ-जैसे चतुर सेवक अपने स्वामी का सब काम करता
है, और उसमें अपने स्वार्थ का कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता,

( १०५ )
इसी तरह प्रकृति भी अपने आप सृष्टि करती है, पुरुष के भय
प्रेरणादिक की अपेक्षा नहीं करती ।
कर्माकृष्टेर्वाऽनादितः ॥६२॥
अर्थ—अथवा कर्मों के अनादि प्रवाह के वश होकर प्रकृति
सृष्टि को करती है । अब इससे आगे सृष्टि की निवृत्ति के कारणों
को कहेंगे—
विविक्तबोधात् सृष्टिनिवृत्तिः प्रधानस्य सूदवत्
पाके ॥६३॥
अर्थ—जब विविक्त बोध अर्थात् एकान्त ज्ञान हो जाता है,
तब प्रकृति की सृष्टि निवृत्त हो जाती है, जैसे—रसोइया भोजन
बनाकर निश्चिन्त हो जाता है, फिर उसको कोई काम विशेष
नहीं रहता । इसी तरह प्रकृति भी विवेक ( ज्ञान ) को उत्पन्न
करके अपनी सृष्टि को निवृत्त कर देती है । आशय यह है कि
ज्ञान होने से संसार छूट जाता है ।
प्र०—जबकि एक को ज्ञान हुआ और उससे सृष्टि की
निवृत्ति हो गई, तो फिर विशेष जीव बद्ध क्यों रहते हैं ? क्योंकि
सृष्टि की निवृत्ति में बन्धन न रहना चाहिये ।
उ०—इतर इतरवत्तद्दोषात् ॥ ६४ ॥
अर्थ—जो विवेक ( ज्ञान ) रहित है, वह बद्ध के बराबर है,
क्योंकि अज्ञान के दोष से बँधा रहना ही पड़ता है। अब सृष्टि
निवृत्ति का फल कहते हैं—
द्वयोरेकतरस्य वोदासीन्यमपवर्गः ॥ ६५ ॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष इन दोनों की आपस में उदासीनता
का होना ही मुक्ति कहलाता है । दूसरा यह भी अर्थ हो सकता

( १०६ )
है, कि ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनों में से एक के वास्ते प्रकृति
की उदासीनता ही को अपवर्ग मुक्ति कहते हैं ।
प्र०—जबकि विवेक के कारण प्रकृति पुरुष को मुक्त कर
देती है, तो और भी पुरुष विवेक से मुक्त हो जायेंगे, ऐसा विचार-
कर प्रकृति विवेक के डर के मारे सृष्टि करने से विरक्त क्यों
नहीं होती ?
उ०—अन्यसृष्ट्युपरागेपि न विरज्यते प्रबुद्ध-
रज्जुतत्वस्येवोरगः ॥ ६६ ॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति एक मनुष्य के ज्ञानी होने से उसके
वास्ते सृष्टि से विमुख हो जाती है, तथापि दूसरे अज्ञानी के
वास्ते प्रकृति सृष्टि करने से विमुख नहीं होती । दृष्टान्त—जैसे कि
किसी मनुष्य ने रस्सी को देखा, उस रस्सी को देखकर उसको
प्रथम साँप की भ्रान्ति हुई, और भय मालूम पड़ा । बाद को
जब उसने विचार करके देखा, तो उसको यथार्थ ज्ञान हो गया,
कि यह साँप नहीं है, किन्तु रस्सी है । जब उसको आनन्द हो
गया, तब वह रस्सी उस ज्ञानी को फिर भय नहीं देती, किन्तु
जो अज्ञानी है उसे तो साँप की भ्रान्ति से भय देती ही है । इसी
प्रकार प्रकृति की भी व्यवस्था है, कि जो विवेकी है उसके
वास्ते इसकी सृष्टि नहीं है, किन्तु अविवेकी के वास्ते है ।
कर्म निमित्तयोगाच्च ॥ ६७ ॥
अर्थ—सृष्टि के प्रवाह में जो कर्म हेतु हैं उनके कारण भी
प्रकृति सृष्टि करने से विमुख नहीं होती, और मुक्त मनुष्य के
कर्म छूट जाते हैं; इस कारण उसके वास्ते सृष्टि शान्त हो
जाती है ।
प्र०—जब सब मनुष्य समान और निरपेक्ष हैं, तो किसी

सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है ।

( १०७ )
के वास्ते प्रकृति सृष्टि की निवृत्ति और किसी के वास्ते प्रवृत्ति हो
इसमें क्या नियम है ?
उ०—कर्म का प्रवाह ही इसमें नियम है ।
प्र०—यह उत्तर ठीक नहीं, क्योंकि न मालूम किस मनुष्य
का कौन-सा कर्म है ? यह भी कोई निश्चय किया हुआ नियम
नहीं है ?
उ०—नैरपेक्ष्येऽपि प्रकृत्युपकारेऽविवेको
निमित्तम् ॥ ६८ ॥
अर्थ—यद्यपि सब पुरुष निरपेक्ष हैं, अर्थात् एक दूसरे की
अपेक्षा नहीं रखता, तथापि यह मेरा स्वामी है, मैं इसका सेवक
हूँ ; इस तरह प्रकृति के उपकार में ( सृष्टि करने में ) अविवेक
ही निमित्त है । प्रत्यक्ष यह है कि जब प्रकृति यह बात चाहती
है, कि यह मनुष्य मुक्त हो, तब ही उसको अपनी सृष्टि के भीतर
रखकर अनेक प्रकार के कार्यों में लगा देती है, और उन्हीं कार्यों
को करता हुआ वह मनुष्य किसी न किसी जन्म में विवेकी
( ज्ञानी ) होकर मुक्त हो जाता है; इसी वास्ते आचार्य ने
सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है ।
प्र०—जबकि प्रकृति का स्वभाव वर्त्तमान मान लिया है,
तो ज्ञान के उत्पन्न होने पर क्यों निवृत्त हो जाती है ? क्योंकि
जो जिसका स्वाभाविक धर्म है, वह सब जगह एकसा रहना
चाहिए ?
उ०—नर्त्तकीवत् प्रवृत्तस्यापि निवृत्तिश्चा-
रितार्थ्यात् ॥ ६९ ॥
अर्थ—जैसे नाच करनेवाली का नाच करना स्वभाव है, वह
सब सभा को नाच दिखाती है, और जब नाच करते करते उसके

( १०८ )
मनोरथ पूरे हो जाते हैं, तब वह नाच करने से निवृत्त हो
जाती है; इसी तरह यद्यपि प्रकृति का सृष्टि करना स्वभाव है,
परन्तु उस सृष्टि करने का जो प्रयोजन है वह विवेक के उत्पन्न
होने से निवृत्त होजाता है, अतएव उससे निवृत्त भी होजाती है।
अब मुक्ति से पुनरागमन होता है या नहीं, इसपर यहां
इस कारण विचार किया जाता है, कि इस ऊपर के सूत्र में
विवेक के उपरान्त सृष्टि की निवृत्ति प्रतिपादन कर चुके, और
इस पर यह सन्देह होता है, कि जब प्रकृति यह समझ लेती
होगी, कि पुरुष को मेरे संयोग से अनेक दुःखादि होते हैं, अत-
एव फिर उसका संयोग किसी काल में न कहना चाहिये। इसी
मत पर तो आचार्य विचार करते हैं।
दोषबोधेऽपि नोपसर्पणं प्रधानस्य कुल-
वधूवत् ॥ ७० ॥
अर्थ—पुरुष को मेरे संयोग से दुःख होगा, इस बात में
प्रकृति अपना दोष जानती है, तो क्या फिर उसका संयोग नहीं
करती, किन्तु अवश्य करती है, जैसे—अच्छे वंश की पतिव्रता स्त्री
से यदि कोई दोष हो भी जाय, और उससे स्वामी को कष्ट भी
पहुँचे, तब क्या वह अपने पति के पास का जाना छोड़ देगी ?
ऐसा नहीं होसकता, अवश्य जायगी; क्योंकि जो पति को त्यागती
है, तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट होता है। और भी प्रकार से
अन्य आचार्यों ने इस सूत्र का अर्थ किया है, कि जब प्रकृति
अपना दोष जान लेती है तब लज्जा के वश होकर फिर कभी
पुरुष के पास नहीं जाती, जैसे कुलवधू नहीं जाती। इस अर्थ
के करने से उनका तात्पर्य यह है, कि मुक्ति से पुनरावृत्ति नहीं
होती, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानभिक्षु ने "अपि"
शब्द का कुछ भी आशय नहीं निकाला, और न यह समझा

( १०६ )
कि जो अपने दोष से पति को छोड़ दे, वह कुलवधू कैसे हो
सकती है। कुलवधू वही होती है, जो अपने दोष को स्वामी से
क्षमा कराकर अपने स्वामी की सेवा में तत्पर ( लगी ) रहे ;
किन्तु अन्य टीकाकारों ने इस दृष्टान्त के गूढ़ आशय को बिना
समझे जो लिख दिया है, सो योग्य नहीं है, अथवा आचार्य्य
को यही बात माननीय थी, कि मुक्ति से फिर नहीं लौटता, तो
इन से पहिले सूत्र में इस बात को एक दृष्टांत के द्वारा प्रतिपादन
कर ही चुके थे, फिर इस सूत्र को बनाकर पुनरुक्ति क्यों करते ।
इसी ज्ञापक से सिद्ध है, कि मुक्ति से फिर लौट आता है, लेकिन
इस पुनरुक्ति को अन्य आचार्य नहीं समझे। पुरुष का बन्ध और
मोक्ष किस से होता है ? इस बात का विचार करते हैं ।
नैकान्ततो बन्धमोक्षौ पुरुषस्याविवेकादृते ॥७१॥
अर्थ—पुरुष को बन्ध मोक्ष स्वाभाविक नहीं है, किन्तु
अविवेक ही से होते हैं।
प्रकृतेराञ्जस्यात् ससंगत्वात् पशुवत् ॥ ७२ ॥
अर्थ—जब विचार करते हैं, तो ज्ञात होता है, कि प्रकृति
का संयोग पुरुष को रहता है, उसीसे पुरुष का बन्ध है। प्रकृति
का संयोग छूटना ही मोक्ष है, जैसे पशु रस्सी के संयोग से
बँध जाता है; और उसका संयोग छूट जाता है, तब वह मुक्त हो
जाता है; इसी तरह मनुष्य को भी जानना चाहिये ।
प्र०-प्रकृति कौन-से साधनों से बन्धन करती है, और
कैसे मुक्त करती है ?
उ०—रूपैः सप्तभिरात्मानं बध्नाति प्रधानं
कोशकारवद्विमोचयत्येकरूपेण ॥ ७३ ॥
अर्थ-धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और

( ११० )
अनैश्वर्य—इन सात रूपों से प्रकृति पुरुष का बन्धन करती है,
जैसे—तलवार के म्यान बनानेवाले की कारीगरी से तलवार ढकी
रहती है, इसी तरह प्रकृति से पुरुष को भी समझना चाहिये,
और वही प्रकृति ज्ञान से आत्मा को दुःखों से मुक्त कर देती है।
प्र०—जब मुक्ति में हेतु ज्ञान कहा, और धर्म्मादिक सब
बन्धन के हेतु कहे, तो धर्म में क्यों किसी की प्रवृत्ति होगी, और
क्यों ध्यानादि के वास्ते उपाय किया जावेगा ?
उ०—निमित्तत्वमविवेकस्येति न दृष्टहानिः।७४
अर्थ—मुक्ति के न होने में अज्ञान ही ( अविवेक ) निमित्त
है, इस वास्ते उसकी निवृत्ति ही के वास्ते यत्न करना चाहिये
और उस यत्न में धर्म्मानुष्ठान आदि चित्तशोधक कर्म भी परि-
गणित हैं, अतः उसकी हानि नहीं हो सकती ; क्योंकि बिना धर्म,
ध्यान आदि किये, कोई भी ज्ञानवान् हो ही नहीं सकता। अब
विवेक कैसे होता है, उसका उपाय कहते हैं—
तत्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेक
सिद्धिः ॥ ७५ ॥
अर्थ—देह आत्मा नहीं है, पुत्र आत्मा नहीं है, इन्द्रियाँ
आत्मा नहीं हैं, मन आत्मा नहीं है। इस प्रकार नेति-नेति करके
त्याग से और तत्त्वाभ्यास करने से विवेक की सिद्धि हो जाती
है। श्रुति भी इसी आशय को कहती है, “अर्थात् आदेशो नेति
नेतीति त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः”।
अधिकारिभेदान्न नियमः ॥ ७६ ॥
अर्थ—कोई मूर्ख बुद्धिवाले होते हैं, कोई विलक्षण ( श्रेष्ठ )
बुद्धिवाले होते हैं। इस कारण एक ही जन्म में सबको विवेक

पादन करती है ।

( १११ )
( ज्ञान ) हो जावे, यह नियम नहीं है, किन्तु श्रेष्ठ अधिकारी
एक जन्म में भी विवेकी हो सकता है ।
बाधितानुवृत्त्या मध्यविवेकतोऽप्यपभोगः ॥ ७७
अर्थ—जिसको विवेक साक्षात्कार हो भी गया है, उसको
भी कर्मों का भोग भोगना होगा ही, क्योंकि यद्यपि कर्म एकबार
बाधित भी कर दिये जाते हैं, तथापि उनकी अनुवृत्ति होती है ।
प्रारब्ध आदि संज्ञावाले कर्म सर्वथा विनाश को प्राप्त नहीं होते ।
जीवन्मुक्तश्च ॥ ७८ ॥
अर्थ—जब विवेक हो जाता है तब इस शरीर की मौजूदगी
में भी मुक्त हो सकता है, उसको ही जीवन्मुक्त कहते हैं । अब
जीवन्मुक्त होने का उपाय भी कहते हैं ।
उपदेश्योपदेष्टृत्वात् तत्सिद्धिः ॥ ७६ ॥
अर्थ—जब शिष्य बनकर गुरु के मुख से शास्त्रों को पढ़ेगा
और विचार करने से विवेक की उत्पत्ति हो जावेगी, तो जीवन्
मुक्त होना कुछ कठिन बात नहीं है । बिना गुरु द्वारा उपदेश
के जीवन्मुक्त नहीं हो सकता । इसी विषय को श्रुति भी प्रति-
पादन करती है ।
श्रुतिश्च ॥ ८० ॥
“तद्विज्ञानार्थं सगुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म-
निष्ठम्। तस्मै सविद्वानुपासन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमा-
न्विताय येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाचतान्तत्वतो ब्रह्मविद्याम् ।”
अर्थ—जबकि जिज्ञासु पुरुष को सत्य के जानने की अभि-
लाषा हो, उस समय समित्पाणि अर्थात् पुष्पादिक हाथ में लेकर
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ (वेद के जाननेवाले) गुरु की शरण ले, फिर
उस महात्मा गुरु को चाहिये, कि ऐसे शिष्य को धोखे में न डाले,

( ११२ )
और वह उपदेश करना चाहिये, जिस कारण से वह शिष्य
सत्यमार्ग को प्राप्त हो जाय ।
प्र०-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की ही शरण क्यों ले, और भी तो
बहुतेरे होते हैं ?
उ०-इतरथान्धपरम्परा ॥ ८१ ॥
यदि ज्ञानवान् ब्रह्मनिष्ठ गुरु से ज्ञान न लिया जावे, तो
क्या मूर्खों से लिया जायगा, फिर तो अन्ध-परम्परा गिनी जायेगी,
जैसे- एक अन्धा कुवें में गिरा, तो सब ही अन्धे कुवें में गिर पड़े;
इसी प्रकार मूर्ख की शरण लेने से सब मूर्ख रह जाते हैं ।
प्र०-जब ज्ञान से कर्म नाश हो जाते हैं, तो फिर शरीर
क्यों रहता है, और उसकी जीवन्मुक्त संज्ञा कैसे होती है ?
उ०-चक्रभ्रमणवद्धृतशरीरः ॥ ८२ ॥
अर्थ-जैसे कुम्हार का चाक भोलुआ इत्यादि के बनाने
के समय डंडे से चलाया जाता है, और कुम्हार-बर्तनों को बना-
कर उतार भी लेता है, लेकिन उस चलाने का ऐसा वेग होता
है कि पीछे बहुत देर तक वह चाक घूमता रहता है; इसी तरह
ज्ञान के उत्पन्न होते ही यद्यपि नये कर्म उत्पन्न नहीं होते तथापि
प्रारब्ध कर्मों के बेग से शरीर को धारण किये हुये जीवन्मुक्त
रहता है ।
प्र०-यद्यपि चक्र के घूमने में दण्डे की कोई ताड़ना उस
समय नहीं है, तो भी वह पहिली ताड़ना के कारण से चलता है,
किन्तु जब जीवन्मुक्त के सब रागादि नाश हो जाते हैं, तो वह
उपभोग किसके सहारे से करता है ?
उ०-संस्कारलेशतस्तत्सिद्धिः ॥ ८३ ॥
अर्थ-रागादिकों के संस्कार का भी लेश रहता है, उसी के

चतुर्थोऽध्यायः

( ११३ )
सहारे से उपभोग की सिद्धि जीवन्मुक्त को हो जाती है, वास्त-
विक राग जीवन्मुक्त को नहीं रहते। यह सब जीवन्मुक्त के
विषय में कहा। अब बिना देह की मुक्ति के वास्ते अपना
परमसिद्धान्त कहकर अध्याय को समाप्त करते हैं।
विवेकान्निःशेष दुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेत-
रान्नेतरात् ॥ ८४ ॥
अर्थ—विवेक ही से सब दुःख दूर होते हैं, तब जीव कृत-
कृत्य होता है, दूसरे से नहीं होता, नहीं होता। पुनरुक्ति
अर्थात् नेतरात् इसका दुबारा कहना पक्ष की पुष्टि और अध्याय
की समाप्ति के वास्ते है।
इति सांख्यदर्शने तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
चतुर्थोऽध्यायः
इस अध्याय में विवेक (ज्ञान) के साधनों का वर्णन करेंगे—
राजपुत्रवत्तत्वोपदेशात् ॥ १ ॥
अर्थ—पूर्व सूत्र से यहाँ विवेक की अनुवृत्ति आती है।
राजा के पुत्र के समान तत्त्वोपदेश होने से विवेक होता है।
यहाँ यह कथा है, कि कोई राजा का पुत्र गंडमाला रोग से युक्त
उत्पन्न हुआ था, इस कारण वह शहर में से निकाल दिया गया,
और उसको किसी शवर ( भील ) ने पाल लिया। जब वह बड़ा
हो गया, तब अपने को भी शवर मानने लगा। कालान्तर में
( कुछ दिनों के बाद ) उस राजपुत्र को जीता हुआ देखकर कोई

( ११४ )
वृद्ध मन्त्री बोला—हे वत्स ( पुत्र ) तू शवर नहीं है, किन्तु
राजपुत्र है, ऐसे वाक्यों को सुनकर वह राजपुत्र शीघ्र ही उस
शवरभाव के मान को त्यागकर सात्विक राजभाव को धारण
करने लगा, कि मैं तो राजा हूँ। इस प्रकार चिरबद्ध जीव भी
अपने को बद्ध मानता है, और जब तत्त्वोपदेश से उसको ईश्वर
विषयक ज्ञान होता है, तब विवेकोत्पत्ति से उसको मुक्ति प्राप्त
होती है। इस सूत्र के अर्थ से कोई-कोई टीकाकार “ब्रह्मास्मि”
वाला सिद्धान्त निकालते हैं, कि जीव पहिले ब्रह्म था, इस
कारण मुक्त था, किन्तु अज्ञान से बंध गया है, जब तत्त्वोपदेश
हुआ तो विवेक होने से मुक्ति हो गई। लेकिन ऐसा मानना
ठीक नहीं है, क्योंकि पहिले तो ग्रन्थ के आरम्भ में इस बात का
खण्डन किया है ; दूसरे सूत्र में जो राजपुत्र ऐसा शब्द कहा है,
उससे प्रत्यक्ष मालूम होता है कि आचार्य जीव और ब्रह्म में भेद
मानते हैं, इस वास्ते जीव को छोटा मान कर राज पुत्रवत् ऐसा
कहा है, नहीं तो राजवत् ऐसा ही कह देते, किन्तु दो अक्षरों का
अधिक कहना इसी आशय से है, कि कोई एक ब्रह्म के रूपान्तर
का अर्थ न समझ ले ।
पिशाचवदन्यार्थोपदेशेऽपि ॥ २ ॥
अर्थ—एक के वास्ते जो उपदेश किया जाता है, उससे
दूसरा भी मुक्त हो जाता है, जैसे—एक समय श्रीकृष्णजी
अर्जुन को उपदेश कर रहे थे, लेकिन एक पिशाच भी सुन रहा
था, वह पिशाच उस उपदेश को सुनकर उसके अनुष्ठान द्वारा
मुक्ति को प्राप्त हो गया ।
आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ३ ॥
अर्थ—यदि एक बार के उपदेश से विवेक-प्राप्ति न हो, तो
फिर उपदेश करना चाहिये, क्योंकि छान्दोग्य उपनिषद् में लिखा

( ११५ )
है कि श्वेतकेतु के वास्ते आरुणि आदि मुनियों ने बारबार
उपदेश किया था।
पितापुत्रवदुभयोर् दृष्टत्वात् ॥ ४ ॥
अर्थ—विवेक के द्वारा प्रकृति और पुरुष दोनों ही दीखते हैं।
दृष्टान्त—कोई मनुष्य अपनी गर्भिणी स्त्री को छोड़कर परदेश
गया था, जब वह आया देखता क्या है, कि पुत्र उत्पन्न होकर
पूरा युवा हो गया, लेकिन न तो वह पुत्र जानता है, कि यही मेरा
पिता है, और न वह पुरुष जानता है, कि यही मेरा पुत्र है, तब
उस स्त्री ने दोनों को प्रबोध ( ज्ञान ) कराया, कि यह तेरा पिता
है, तू इसका पुत्र है। इसी तरह विवेक भी प्रकृति और पुरुष का
जानने वाला है।
श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥ ५ ॥
अर्थ—संसार का यह नियम है कि जब-जब द्रव्य-प्राप्ति
होती है, तब-तब तो आनन्द, और जब वह द्रव्य चला जाता है
तब ही दुःख होता है। दृष्टान्त—कोई श्येन ( बाज़ ) किसी पक्षी
का मांस लिये चला जाता था, उसी समय किसी व्याध ने पकड़
लिया और उससे वह मांस छीन लिया, तो वह अत्यन्त दुःखी
होने लगा। यदि आप ही उस मांस को त्याग देता तो क्यों दुःख
भोगता ? इस कारण आप ही विषय-वासना इत्यादि का त्याग
कर देना चाहिये।
अहिनिर्ल्वयिनीवत् ॥ ६ ॥
अर्थ—जैसे साँप पुरानी केंचली को छोड़ देता है, इसी
तरह मुमुक्षु ( मोक्ष की इच्छा करने वाले ) को विषय त्याग
देने चाहिये।
छिन्नहस्तवद्वा ॥ ७ ॥

( ११६ )
अर्थ—जैसे किसी मनुष्य का हाथ कटकर गिर पड़ता है, फिर
वह कटे हुए हाथ से किसी तरह का संबंध नहीं रखता, इसी तरह
विवेक प्राप्त होने पर जब विषय-वासना नष्ट हो जाता है, तब
मुमुक्षु फिर उन विषय-वासनाओं से कुछ संबंध नहीं रखता है।
असाधनानुचिन्तनं बन्धाय भरतवत् ॥ ७ ॥
अर्थ—जो मोक्ष का साधन नहीं है लेकिन धर्म में गिनकर
साधन वर्णन कर दिया तो उसका जो विचार है, वह केवल बंधन
का ही कारण होगा, न कि मोक्ष का । दृष्टांत—जैसे राजर्षि
भरत यद्यपि मोक्ष की इच्छा करने वाले थे, लेकिन किसी ने कोई
अनाथ हरिण का बच्चा महात्मा को पालने के लिये दे दिया,
और उस अनाथ हरिण के बच्चे के पालन-पोषण में महात्मा के
विवेक-प्राप्ति का समय नष्ट हो गया, और मुक्ति न हुई । यद्यपि
अनाथ का पालन राजा का धर्म था, तथापि पालन के विचार
में महात्मा से विवेक साधन न हो सका, इस वास्ते बंध का
हेतु हो गया । इसी वास्ते कहते हैं कि धर्म कोई और वस्तु है,
और विवेक साधन कुछ और वस्तु है ।
बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिःकुमारीशंखवत्।६
अर्थ---विवेक-साधन समय बहुतों का संग न करे, किन्तु
अकेले ही विवेक-साधन को करे ; क्योंकि बहुतों के साथ में
राग-द्वेषादि की प्राप्ति होती है, उससे साधन में विघ्न होने का
भय प्राप्त हो जाता है । दृष्टान्त—जैसे कि कोई कुमारी ( कन्या )
हाथों में चूड़ियाँ पहन रही थी, जब दूसरी कन्या के साथ उस-
का मेल हुआ, तब आपस में धक्का लगकर चूड़ियों का झनकार
शब्द हुआ, इसी तरह यहाँ भी विचारना चाहिये, कि बहुतों के
संग में विवेक साधन नहीं हो सकता ।

( ११७ )
द्वाभ्यामपि तथैव ॥ १० ॥
अर्थ—दो के साथ भी विवेक साधन नहीं हो सकता,
क्योंकि दो आदमियों में भी राग-द्वेषादि का होना सम्भव है।
निराशः सुखी पिंगलावत् ॥ ११ ॥
अर्थ—जो मनुष्य आशा को त्याग देता है, वह सदैव
पिंगला नाम वेश्या के समान सुख को प्राप्त होता है। दृष्टांत—
पिंगला नाम वाली एक वेश्या थी, उसको जार मनुष्यों के आने
का समय देखते-देखते बहुत रात बीत गई, लेकिन कोई विषयी
उसके पास न आया, तब वह जाकर सो रही, बाद को फिर उस
वेश्या को ख्याल हुआ शायद अब कोई आदमी आव, ऐसा
विचार कर वह वेश्या फिर उठ आई, और बहुत समय तक
फिर जागती रही, लेकिन फिर भी कोई न आया, तब उस
वेश्या ने अपने चित्त में बड़ी ग्लानि मानी और कहा कि
“आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्” आशा बड़े दुःख
देती है, और नैराश्य में बड़ाभारी सुख है, ऐसा विचार कर उस
वेश्या ने उस दिन से आशा त्याग दी और परम सुख को
प्राप्त हुई। इसी तरह जो मनुष्य आशा को त्यागेंगे वह परम
सुख को प्राप्त होंगे।
अनारम्भेऽपि परगृहे सुखीसर्पवत् ॥ १२ ॥
अर्थ—गृहादिकों के विना बनाये भी पराये घर में सुख पूर्वक
रह सकता है, जैसे—साँप पराये घर में सुख-पूर्वक वास
करता है।
बहुशास्त्रगुरुपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥ १३
अर्थ-बहुत से शास्त्रों से और गुरुओं से सार वस्तु जो विवेक

( ११८ )
का साधन है उस ही को लेना चाहिये, जैसे—भौंरा फूलों का
जो सार मद है उसको ग्रहण करता है ; इसी तरह
सार का लेना योग्य है ।
इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधि हानिः ॥ १४ ॥
अर्थ—जिसका मन एकाग्र रहता है, उसकी समाधि में
किसी समय किसी प्रकार की भी हानि नहीं हो सकती । दृष्टांत—
कोई बाण बनानेवाला अपने स्थल पर बैठा हुआ बाण बना
रहा था, उसी समय उसकी बगल से होकर कटक सहित राजा
निकल गया ; लेकिन उसको न मालूम हुआ कौन चला गया,
और उसके काम में भी किसी प्रकार की बाधा न हुई ; क्योंकि
उसका मन अपने काम में आसक्त था ।
कृतनियमलङ्घनादानर्थक्यं लोकवत् ॥ १५ ॥
अर्थ—शौच, आचार आदि जो नियम विवेक की वृद्धि के
वास्ते माने गये हैं, उनके लंघन से अर्थात् ठीक तौर से न
पालने पर अनर्थ होता है, और उन नियमों का -फिर कुछ भी
फल नहीं होता, जैसे कि रोगी के वास्ते वैद्य ने पथ्य बताया
वास्ते नफे के, लेकिन उसने कुछ पथ्य न किया, उसको कुछ फल
अच्छा न होगा, किन्तु रोग वृद्धि को ही प्राप्त होगा ।
तद्विस्मरणेऽपि भेकीवत् ॥ १६ ॥
अर्थ—तत्वज्ञान के भूलने से दुःख प्राप्त होता है । दृष्टांत—
कोई राजा शिकार खेलने के वास्ते वन को गया था, वहाँ पर
उस राजा ने दिव्यस्वरूप एक कन्या को देखा, और उस कन्या
को देखकर राजा मोहित हो गया, और बोला, कन्ये ! तुम कौन
हो ? वह बोली राजन् ! मैं भेकराज ( मेढकों के राजा ) की
कन्या हूँ । तब राजा अपनी स्त्री होने के वास्ते उससे प्रार्थना

( ११६ )
करने लगा, तब वह कन्या बोलो, राजन् ! अगर मुझको जल
का दर्शन हो जायगा, तब ही मैं तेरा साथ छोड़ दूँगी ; इसवास्ते
मुझको जल का दर्शन न होना चाहिये, यह मेरा नियम पालन
करना होगा । राजा ने प्रसन्न होकर इस बात को स्वीकार कर
लिया । एक समय वह दोनों आनन्द में आसक्त थे, तब वह
कन्या राजा से बोलो कहाँ जल है, तब राजा ने उस बात को
भूल कर उसको जल दिखा दिया । जल के दर्शन समय ही
वह कन्या उस रूप को छोड़कर जल में प्रवेश कर गई । तब
राजा ने दुःखी होकर उस कन्या को जल के अन्दर बहुत देखा,
लेकिन वह फिर न प्राप्त हुई, जैसे—यह राजा उस तत्त्व बात
को भूल कर दुःख को प्राप्त हुये, इसी तरह मनुष्य भी तत्त्वज्ञान
के भूलने से दुःख को प्राप्त होता है ।
नोपदेशश्रवणेऽपि कृतकृत्यता परामर्शादृते
विरोचनवत् ॥ १७ ॥
अर्थ—उपदेश के सुनने ही मात्र से कृतकृत्यता नहीं होती
जब तक कि उसका विचार न किया जाय । दृष्टान्त—बृहस्पति-
जी ने विरोचन और इन्द्र इन दोनों को सत्योपदेश किया था ।
इन्द्र ने उस उपदेश को सुनकर विचारा भी, परन्तु विरोचन ने
न विचारा, किन्तु कान ही पवित्र किये ।
दृष्टस्तयोरिन्द्रस्य ॥ १८ ॥
अर्थ—देखने में आया है, कि उस श्रवण से इन्द्र को ही
विवेक ज्ञान हुआ, विरोचन को नहीं ; क्योंकि इन्द्र ने तो उस
उपदेश का विचार किया था ।
प्रणतिब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहु-
कालात् तद्वत् ॥ १९ ॥

( १२० )
अर्थ—गुरु से नम्र रहना, सदा गुरु की सेवा करना, ब्रह्म-
चर्य को धारण करना, और वेद पढ़ने के वास्ते गुरु के पास
जाना, इन्हीं कर्मों के करने से विवेक की सिद्धि हो जाती है,
से कि इन्द्र को हुई थी।
न कालनियमो वामदेववत् ॥ २० ॥
अर्थ—इतने दिनों में विवेक उत्पन्न होगा, ऐसा कोई नियम
नहीं है; क्योंकि वामदेव नाम वाले ऋषि को पूर्व जन्म के
संस्कारों के कारण थोड़े ही दिनों में विवेक उत्पन्न हो गया था।
अध्यस्तरूपोपासनात् पारम्पर्येण यज्ञोपास-
कानामिव ॥ २१ ॥
अर्थ—शरीर ही आत्मा है, वा मन ही आत्मा है, इस प्रकार
अध्याहार करके जो उपासना की जाती है, उसके परंपरा संबंध
से विवेक होता है, जैसे—पहिले पुत्र को आत्मा माना, पीछे
शरीर को, उसके पश्चात् इन्द्रियों को, इसी प्रकार करते-करते
आत्म-विवेक हो जाता है जैसे—यज्ञ करने वालों की परम्परा
संबन्ध से मुक्ति होती है; क्योंकि यज्ञ करने से चित्त की
शुद्धि होती है, और चित्त शुद्धि से वासनाओं की न्यूनता आदि
परम्परा से मुक्ति होती है, इसी प्रकार अध्यस्त उपासना से भी
जानना चाहिये ।
इतरलाभेऽप्यावृत्तिः पंचाग्नियोगतो जन्म-
श्रुतेः ॥ २२ ॥
अर्थ—यदि पञ्चाग्नि योग से इतर अर्थात् शान्ति का लाभ
भी कर लिया, तो भी कर्मों की वासना बलवती बनी रहेगी;
अतएव वह कर्म फिर भी उत्तरोत्तर उत्पन्न होते जायेंगे, इसी