सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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और वह उपदेश करना चाहिये, जिस कारण से वह शिष्य
सत्यमार्ग को प्राप्त हो जाय ।
प्र०-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की ही शरण क्यों ले, और भी तो
बहुतेरे होते हैं ?
उ०-इतरथान्धपरम्परा ॥ ८१ ॥
यदि ज्ञानवान् ब्रह्मनिष्ठ गुरु से ज्ञान न लिया जावे, तो
क्या मूर्खों से लिया जायगा, फिर तो अन्ध-परम्परा गिनी जायेगी,
जैसे- एक अन्धा कुवें में गिरा, तो सब ही अन्धे कुवें में गिर पड़े;
इसी प्रकार मूर्ख की शरण लेने से सब मूर्ख रह जाते हैं ।
प्र०-जब ज्ञान से कर्म नाश हो जाते हैं, तो फिर शरीर
क्यों रहता है, और उसकी जीवन्मुक्त संज्ञा कैसे होती है ?
उ०-चक्रभ्रमणवद्धृतशरीरः ॥ ८२ ॥
अर्थ-जैसे कुम्हार का चाक भोलुआ इत्यादि के बनाने
के समय डंडे से चलाया जाता है, और कुम्हार-बर्तनों को बना-
कर उतार भी लेता है, लेकिन उस चलाने का ऐसा वेग होता
है कि पीछे बहुत देर तक वह चाक घूमता रहता है; इसी तरह
ज्ञान के उत्पन्न होते ही यद्यपि नये कर्म उत्पन्न नहीं होते तथापि
प्रारब्ध कर्मों के बेग से शरीर को धारण किये हुये जीवन्मुक्त
रहता है ।
प्र०-यद्यपि चक्र के घूमने में दण्डे की कोई ताड़ना उस
समय नहीं है, तो भी वह पहिली ताड़ना के कारण से चलता है,
किन्तु जब जीवन्मुक्त के सब रागादि नाश हो जाते हैं, तो वह
उपभोग किसके सहारे से करता है ?
उ०-संस्कारलेशतस्तत्सिद्धिः ॥ ८३ ॥
अर्थ-रागादिकों के संस्कार का भी लेश रहता है, उसी के