सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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सहारे से उपभोग की सिद्धि जीवन्मुक्त को हो जाती है, वास्त-
विक राग जीवन्मुक्त को नहीं रहते। यह सब जीवन्मुक्त के
विषय में कहा। अब बिना देह की मुक्ति के वास्ते अपना
परमसिद्धान्त कहकर अध्याय को समाप्त करते हैं।
विवेकान्निःशेष दुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेत-
रान्नेतरात् ॥ ८४ ॥
अर्थ—विवेक ही से सब दुःख दूर होते हैं, तब जीव कृत-
कृत्य होता है, दूसरे से नहीं होता, नहीं होता। पुनरुक्ति
अर्थात् नेतरात् इसका दुबारा कहना पक्ष की पुष्टि और अध्याय
की समाप्ति के वास्ते है।
इति सांख्यदर्शने तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
चतुर्थोऽध्यायः
इस अध्याय में विवेक (ज्ञान) के साधनों का वर्णन करेंगे—
राजपुत्रवत्तत्वोपदेशात् ॥ १ ॥
अर्थ—पूर्व सूत्र से यहाँ विवेक की अनुवृत्ति आती है।
राजा के पुत्र के समान तत्त्वोपदेश होने से विवेक होता है।
यहाँ यह कथा है, कि कोई राजा का पुत्र गंडमाला रोग से युक्त
उत्पन्न हुआ था, इस कारण वह शहर में से निकाल दिया गया,
और उसको किसी शवर ( भील ) ने पाल लिया। जब वह बड़ा
हो गया, तब अपने को भी शवर मानने लगा। कालान्तर में
( कुछ दिनों के बाद ) उस राजपुत्र को जीता हुआ देखकर कोई