सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 103

( १०२ )
अपने स्वामी के वास्ते नाना प्रकार की चेष्टा ( टहल ) करती
है, वैसे ही उसका पुत्र भी अपने स्वामी के प्रसन्नतार्थ नाना प्रकार
की चेष्टा करने लगता है, अतएव जो जैसा कर्म करेगा उसकी
सृष्टि भी वैसा ही कर्म करेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ।
प्र०—ऊर्ध्व की सृष्टि सत्त्वगुण प्रधान है, तो मनुष्य उसी
से कृतार्थ हो सकता है, फिर मोक्ष से क्या करना है ?
उ०—आवृत्तिस्तत्राप्युत्तरोत्तरयोनियोगाद्धेयः॥५२
अर्थ—उन ऊपर के और नीचे के देशों में भी आवृत्ति योग
रहता है, अर्थात् जब वहाँ गये तब सात्विकी वृत्ति रही, और
यहाँ रहे तब वही रजोगुण फिर आगया, और वहाँ भी छोटी
बड़ी जातियाँ होती हैं, उनमें जन्म होने से ठीक-ठीक सत्व नहीं
रहता ; इस वास्ते ऐसा विचार करना सब तरह छोड़ने योग्य है।
और भी इस पक्ष को पुष्ट करते हैं ।
समानं जरामरणादिजं दुःखम् ॥५३॥
किसी शरीर में हों, चाहे देवता हों, चाहे सामान्य मनुष्य
अथवा पशु, पक्षी—बुढ़ापे और मृत्यु का दुःख सब में होता है ;
इस कारण सब शरीरों की अपेक्षा मुक्त होना ही उत्तम है ।
प्र०—जिस से यह शरीर उत्पन्न हुआ है, यदि उसी में लय
हो जाय, तब क्या मुक्ति नहीं मानी जायगी ?
उ०—न कारणलयात् कृतकृत्या मग्नव-
दुत्थानात् ॥५४॥
अर्थ—कारण में लय हो जाने से भी कृतकृत्यता नहीं होती,
क्योंकि जैसे मनुष्य जब जल में डूबता है, तो कभी तो ऊपर
को आता है, और कभी नीचे को बैठ जाता है । इसी तरह
जो मनुष्य कारण में लय हो गया है, कभी जन्म को प्राप्त होता

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका · पृष्ठ 103, कुल 192 में से · SarvaKosh