सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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अर्थ—ब्राह्मणों से लेकर स्थावरादि तक जितनी सृष्टि है,
वह सर्व पुरुष के ही वास्ते है, और उसे भी विवेक के होने तक
ही सृष्टि रहती है, बाद को मुक्ति होने से छूट जाती है। अब
तीन सूत्रों से सृष्टि के विभाग को कहते हैं—
ऊर्ध्वं सत्वविशाला ॥४८॥
अर्थ—जो सृष्टि ऊपर है, वह सत्व-प्रधान है। यहाँपर ऊपर
कहने से आचार्य का प्रयोजन ज्ञान के मार्ग से उन्नति करने
वालों से है, अर्थात् सतोगुणी उन्नति करते हैं, क्योंकि सतो-
गुण प्रकाश करता है, इस कारण सतोगुणी अर्थात् ज्ञानी लोग
सदा उन्नति करते हैं, इस कारण ऊपर जाते हैं।
तमोविशाला मूलतः ॥४९॥
अर्थ—तमोगुणी अन्तःकरण वाले जीव नीच गति अर्थात्
पशु-पक्षी और कीड़े आदि की योनियों को प्राप्त होते हैं।
मध्ये रजोविशाला ॥५०॥
अर्थ—और बीच में जो शरीर हैं, वे रजोगुण प्रधान हैं।
बीच का शरीर सामान्य मनुष्य का जन्म है, और सब शरीर
इसकी अपेक्षा ऊँचे हैं, या नीचे। सामान्य मनुष्य रजोगुणी
होता है। सत्पुरुष सतोगुणी, पशु आदि तमोगुणी। इस के अन्दर
भी भेद हैं।
प्र०—प्रकृति तो एक ही है, लेकिन सृष्टि अनेक तरह की
क्यों होती है ?
उ०—कर्मवैचित्र्यात् प्रधानचेष्टा गर्भदासवत् ॥५१
अर्थ—यह सब प्रधान अर्थात् प्रकृति की चेष्टा कर्मों की
विचित्रता से होती है, इस में दृष्टान्त भी है, जैसे—कोई दासी