सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११० )
अनैश्वर्य—इन सात रूपों से प्रकृति पुरुष का बन्धन करती है,
जैसे—तलवार के म्यान बनानेवाले की कारीगरी से तलवार ढकी
रहती है, इसी तरह प्रकृति से पुरुष को भी समझना चाहिये,
और वही प्रकृति ज्ञान से आत्मा को दुःखों से मुक्त कर देती है।
प्र०—जब मुक्ति में हेतु ज्ञान कहा, और धर्म्मादिक सब
बन्धन के हेतु कहे, तो धर्म में क्यों किसी की प्रवृत्ति होगी, और
क्यों ध्यानादि के वास्ते उपाय किया जावेगा ?
उ०—निमित्तत्वमविवेकस्येति न दृष्टहानिः।७४
अर्थ—मुक्ति के न होने में अज्ञान ही ( अविवेक ) निमित्त
है, इस वास्ते उसकी निवृत्ति ही के वास्ते यत्न करना चाहिये
और उस यत्न में धर्म्मानुष्ठान आदि चित्तशोधक कर्म भी परि-
गणित हैं, अतः उसकी हानि नहीं हो सकती ; क्योंकि बिना धर्म,
ध्यान आदि किये, कोई भी ज्ञानवान् हो ही नहीं सकता। अब
विवेक कैसे होता है, उसका उपाय कहते हैं—
तत्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेक
सिद्धिः ॥ ७५ ॥
अर्थ—देह आत्मा नहीं है, पुत्र आत्मा नहीं है, इन्द्रियाँ
आत्मा नहीं हैं, मन आत्मा नहीं है। इस प्रकार नेति-नेति करके
त्याग से और तत्त्वाभ्यास करने से विवेक की सिद्धि हो जाती
है। श्रुति भी इसी आशय को कहती है, “अर्थात् आदेशो नेति
नेतीति त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः”।
अधिकारिभेदान्न नियमः ॥ ७६ ॥
अर्थ—कोई मूर्ख बुद्धिवाले होते हैं, कोई विलक्षण ( श्रेष्ठ )
बुद्धिवाले होते हैं। इस कारण एक ही जन्म में सबको विवेक