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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ज्ञान ) हो जावे, यह नियम नहीं है, किन्तु श्रेष्ठ अधिकारी
एक जन्म में भी विवेकी हो सकता है ।
बाधितानुवृत्त्या मध्यविवेकतोऽप्यपभोगः ॥ ७७
अर्थ—जिसको विवेक साक्षात्कार हो भी गया है, उसको
भी कर्मों का भोग भोगना होगा ही, क्योंकि यद्यपि कर्म एकबार
बाधित भी कर दिये जाते हैं, तथापि उनकी अनुवृत्ति होती है ।
प्रारब्ध आदि संज्ञावाले कर्म सर्वथा विनाश को प्राप्त नहीं होते ।
जीवन्मुक्तश्च ॥ ७८ ॥
अर्थ—जब विवेक हो जाता है तब इस शरीर की मौजूदगी
में भी मुक्त हो सकता है, उसको ही जीवन्मुक्त कहते हैं । अब
जीवन्मुक्त होने का उपाय भी कहते हैं ।
उपदेश्योपदेष्टृत्वात् तत्सिद्धिः ॥ ७६ ॥
अर्थ—जब शिष्य बनकर गुरु के मुख से शास्त्रों को पढ़ेगा
और विचार करने से विवेक की उत्पत्ति हो जावेगी, तो जीवन्
मुक्त होना कुछ कठिन बात नहीं है । बिना गुरु द्वारा उपदेश
के जीवन्मुक्त नहीं हो सकता । इसी विषय को श्रुति भी प्रति-
पादन करती है ।
श्रुतिश्च ॥ ८० ॥
“तद्विज्ञानार्थं सगुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म-
निष्ठम्। तस्मै सविद्वानुपासन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमा-
न्विताय येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाचतान्तत्वतो ब्रह्मविद्याम् ।”
अर्थ—जबकि जिज्ञासु पुरुष को सत्य के जानने की अभि-
लाषा हो, उस समय समित्पाणि अर्थात् पुष्पादिक हाथ में लेकर
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ (वेद के जाननेवाले) गुरु की शरण ले, फिर
उस महात्मा गुरु को चाहिये, कि ऐसे शिष्य को धोखे में न डाले,