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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १०६ )
कि जो अपने दोष से पति को छोड़ दे, वह कुलवधू कैसे हो
सकती है। कुलवधू वही होती है, जो अपने दोष को स्वामी से
क्षमा कराकर अपने स्वामी की सेवा में तत्पर ( लगी ) रहे ;
किन्तु अन्य टीकाकारों ने इस दृष्टान्त के गूढ़ आशय को बिना
समझे जो लिख दिया है, सो योग्य नहीं है, अथवा आचार्य्य
को यही बात माननीय थी, कि मुक्ति से फिर नहीं लौटता, तो
इन से पहिले सूत्र में इस बात को एक दृष्टांत के द्वारा प्रतिपादन
कर ही चुके थे, फिर इस सूत्र को बनाकर पुनरुक्ति क्यों करते ।
इसी ज्ञापक से सिद्ध है, कि मुक्ति से फिर लौट आता है, लेकिन
इस पुनरुक्ति को अन्य आचार्य नहीं समझे। पुरुष का बन्ध और
मोक्ष किस से होता है ? इस बात का विचार करते हैं ।
नैकान्ततो बन्धमोक्षौ पुरुषस्याविवेकादृते ॥७१॥
अर्थ—पुरुष को बन्ध मोक्ष स्वाभाविक नहीं है, किन्तु
अविवेक ही से होते हैं।
प्रकृतेराञ्जस्यात् ससंगत्वात् पशुवत् ॥ ७२ ॥
अर्थ—जब विचार करते हैं, तो ज्ञात होता है, कि प्रकृति
का संयोग पुरुष को रहता है, उसीसे पुरुष का बन्ध है। प्रकृति
का संयोग छूटना ही मोक्ष है, जैसे पशु रस्सी के संयोग से
बँध जाता है; और उसका संयोग छूट जाता है, तब वह मुक्त हो
जाता है; इसी तरह मनुष्य को भी जानना चाहिये ।
प्र०-प्रकृति कौन-से साधनों से बन्धन करती है, और
कैसे मुक्त करती है ?
उ०—रूपैः सप्तभिरात्मानं बध्नाति प्रधानं
कोशकारवद्विमोचयत्येकरूपेण ॥ ७३ ॥
अर्थ-धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और