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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 192 में से

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पृष्ठ 107

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है, कि ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनों में से एक के वास्ते प्रकृति
की उदासीनता ही को अपवर्ग मुक्ति कहते हैं ।
प्र०—जबकि विवेक के कारण प्रकृति पुरुष को मुक्त कर
देती है, तो और भी पुरुष विवेक से मुक्त हो जायेंगे, ऐसा विचार-
कर प्रकृति विवेक के डर के मारे सृष्टि करने से विरक्त क्यों
नहीं होती ?
उ०—अन्यसृष्ट्युपरागेपि न विरज्यते प्रबुद्ध-
रज्जुतत्वस्येवोरगः ॥ ६६ ॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति एक मनुष्य के ज्ञानी होने से उसके
वास्ते सृष्टि से विमुख हो जाती है, तथापि दूसरे अज्ञानी के
वास्ते प्रकृति सृष्टि करने से विमुख नहीं होती । दृष्टान्त—जैसे कि
किसी मनुष्य ने रस्सी को देखा, उस रस्सी को देखकर उसको
प्रथम साँप की भ्रान्ति हुई, और भय मालूम पड़ा । बाद को
जब उसने विचार करके देखा, तो उसको यथार्थ ज्ञान हो गया,
कि यह साँप नहीं है, किन्तु रस्सी है । जब उसको आनन्द हो
गया, तब वह रस्सी उस ज्ञानी को फिर भय नहीं देती, किन्तु
जो अज्ञानी है उसे तो साँप की भ्रान्ति से भय देती ही है । इसी
प्रकार प्रकृति की भी व्यवस्था है, कि जो विवेकी है उसके
वास्ते इसकी सृष्टि नहीं है, किन्तु अविवेकी के वास्ते है ।
कर्म निमित्तयोगाच्च ॥ ६७ ॥
अर्थ—सृष्टि के प्रवाह में जो कर्म हेतु हैं उनके कारण भी
प्रकृति सृष्टि करने से विमुख नहीं होती, और मुक्त मनुष्य के
कर्म छूट जाते हैं; इस कारण उसके वास्ते सृष्टि शान्त हो
जाती है ।
प्र०—जब सब मनुष्य समान और निरपेक्ष हैं, तो किसी