सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

( १०४ )
उ०-प्रधानसृष्टिः परार्थं स्वतोऽप्यभोक्तृत्वा-
दुष्ट्रकुङ्कुमवहनवत् ॥ ५८ ॥
अर्थ-प्रधान जो सृष्टि है उसकी सृष्टि दूसरे के वास्ते है ;
क्योंकि वह स्वयं भोग नहीं कर सकती । दृष्टान्त-जैसे कि ऊँट
केशर को अपने ऊपर लादकर पराये वास्ते ले जाता है लेकिन उस
केशर से अपना कुछ स्वार्थ नहीं रखता । इसी प्रकार प्रकृत की
सृष्टि भी दूसरे के वास्ते है ।
प्र०-ऊँट का जो दृष्टांत दिया गया सो ऊँट चेतन है, और
चेतन की चेष्टा दूसरे के वास्ते हो सकती है, लेकिन जड़ की नहीं
हो सकती ?
उ०--अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य ॥५९
अर्थ-यद्यपि प्रकृति अचेतन है, तथापि उसकी प्रवृत्ति
दूसरे के वास्ते है । दृष्टान्त-जैसे कि दूध जड़ है, लेकिन उसकी
प्रवृत्ति चैतन्य बछड़ा आदि के वास्ते है । और भी दृष्टान्त है-
कर्म्मवद्दृष्टेर्वा कालादेः ॥६०॥
अर्थ-जैसेकि खेती के करने में बीज बोया जाता है, वह
अपनी ऋतु के समय में वृक्षरूप को धारण कर दूसरों के
उपकारार्थ फल देता है ; इसी प्रकार प्रकृति की सृष्टि भी दूसरों के
वास्ते है ।
प्र०-ऊँट तो पिटने के डर से केशर को लादकर ले जाता
है, लेकिन प्रकृति को तो किसी का डर नहीं है ?
उ०-स्वभावाच्चेष्टितमनभिसन्धानाद्भृत्य-
वत् ॥ ६१ ॥
अर्थ-जैसे चतुर सेवक अपने स्वामी का सब काम करता
है, और उसमें अपने स्वार्थ का कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता,