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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

१३ असली कोकशास्त्र १६३
आन्तरिक दुःखों को भूल जायगा, उसकी थकावट दूर हो जायगी
और वह सच्चे प्रेम का अनुभव कर परम सुखी होगा। वह सुखी
होकर तुम्हारी शुभ कामनायें सोचने लगेगा। जब वह घर से जाने
लगे तब भी प्रेमपूर्वक प्रसन्न-मुख होकर नमस्ते करना चाहिए।
इसका प्रभाव उस पर यह होता है कि वह बाहर काम से छुट्टी
पाने पर घर की ओर आने के लिए व्याकुल हो जाता है और कोई
उपहार में देने योग्य नयी वस्तु भी लाने से नहीं चूकता।
८—सुन्दर वस्त्र और आभूषणों को पहन कर पत्नी को चाहिए
कि वह हाव-भाव के साथ वेश्या की तरह पति को रिझाये। वेश्या
धन की लालसा से झूठा प्रेम दिखाकर पुरुषों को मोहती हैं और
उनका छल, बल, कल से सब धन हरण कर लेती हैं। कहना
चाहिए कि उनकी इच्छा पूरी हो जाती है। यदि स्त्री भी उपरोक्त-
बलाओं से काम लेकर पति को मोह ले तो उसे भी रति-सुख और
प्रेम की प्राप्ति अवश्य हो जायगी, और उनका अटूट सम्बन्ध
स्थिर रहेगा।
९—जिस प्रकार माता बड़े प्रेम के साथ बच्चे को भोजन
कराते हुए मीठे-मीठे बचन कहती और तरह-तरह के मन बहलाने
वाले चुटकले कहती है। प्रत्येक खाद्य-पदार्थ की तारीफ कर अधिक
खिलाने की तरकीब करती है। कहती है—अभी तुमने कुछ नहीं
खाया, तुम्हारी भूख घट गयी है, ऐसा करने से शरीर कैसे बना
रहेगा, इत्यादि अनेकविध बचनों से उत्साहित करती है तथा

१६४ असली कोकशास्त्र
भोजन भी बदल-बदल कर तरह-तरह के बनाती है। यह है सच्चा
मातृ-प्रेम। कुलटा माताओं में यह प्रेम नहीं होता। वैसे पत्नी को
भी खिलाने पिलाने में सच्चे मातृ-प्रेम वाली माता के समान
व्यवहार करने वाली बनना चाहिए।
१०—स्त्री को चाहिए बच्चों की सफाई का ध्यान रक्खे।
इससे बच्चे निरोग और बुद्धिमान् होते हैं। जब वे बड़े हों तब
उन्हें बड़ों के प्रति बोलने के छोटे-छोटे वाक्य सिखाने चाहिएँ।
वर्णमाला का शुद्ध उच्चारण कराना सिखाना चाहिए। उस समय
जिन वर्णों का उच्चारण बच्चा शुद्ध नहीं कर पाता वह थोड़े ही
प्रयास से ठीक हो जाता है। उसका बहुत कोमल जबान होती है।
किन्तु यदि उस समय ध्यान न दिया जाय तो फिर सुधारना बड़ा
कठिन हो जाता है।
११—घर की छोटी से लेकर बड़ी वस्तु तक कोई भी बिना
पति की राय के किसी को न देना चाहिए। तुम्हें नहीं मालूम पति
को इन वस्तुओं के जुटाने में किन-किन मुसीबतों का सामना करना
पड़ा। वह यदि फिर जुटाने की शक्ति रक्खेगा तो तुम्हें आज्ञा दे
देगा। अन्यथा समय पर तकलीफ उठानी पड़ेगी और पति से भी
दो बात सुननी पड़ेगी।
१२—बिना पति की आज्ञा के किसी से कोई वस्तु लेनी भी न
चाहिए। क्योंकि उस वस्तु को देखकर पति के मन में सन्देह उत्पन्न
हो सकता है। ऐसे कुलटा स्त्रियों के व्यवहार देखे गये हैं कि वे

असली कोकशास्त्र १६५
उपपति ( जार ) से प्राप्त किये उपहार को सखी का उपहार कह-
कर पति को धोखा दे देती हैं । जब पति को घर में आयी वस्तु
का असली रूप मालूम रहेगा, तब किसी प्रकार का सन्देह नहीं
हो सकेगा । इस लिए ऐसा काम मत करो कि जिससे घर में
कलह को स्थान मिले ।
१३—पत्नी को पति के सोने के बाद सोना चाहिए और
जागने के पहले उठना । पति जब सबेरे सो कर उठे तब उनके
चरण छू कर नमस्ते करे ।
१४—स्त्री को चाहिए कि जो रुपया पति से प्राप्त हो उसे
एक कापी में जमा कर ले और जिस-जिस काम में खर्च हो
ब्योरेवार लिखकर उन्हें समझा दे । यदि कोई बड़ी रकम खर्च
करने का समय आये तो उनकी स्वीकृति लेकर खर्च करे ।
१५—जिसके शरीर में चर्बी अधिक हो उसे महीने में दो-चार
उपवास कर डालने चाहिएँ । चर्बी अधिक बढ़ जाने से गर्भ स्थिर
नहीं होता । गर्भ अवस्था में हल्का और सुपच भोजन करना उत्तम
है गरिष्ठ नहीं । गर्भावस्था में उपवास सर्वथा वर्जित है । क्योंकि
उससे गर्भस्थ बालक को हानि पहुँचती है । बच्चे की सब जिम्मे-
दारी माता पर ही निर्भर है ।
१६—पति जितना रुपया मासिक पैदा करता हो, स्त्री को
उसके अन्दर ही खर्च कर कुछ बचाना चाहिए । जिससे बच्चों की
पढ़ाई-लिखाई और विवाह आदि का काम चल सके । रोग-भोग

१६६ असली कोकशास्त्र
का तो ठिकाना नहीं कब आ उपस्थित हो। उस समय की रक्षा
बचे धन से ही हो सकती है। जो नारी इस बात पर ध्यान नहीं
देती और फजूल खर्च करती है, उसके पति को कर्ज लेकर दूसरे
का ऋणी होना पड़ता है। जिसका परिणाम यह होता है कि कर्जा
उतारते-उतारते बच्चों को दुःख उठाना पड़ता है। लिखा है "ऋण-
कर्त्ता पिता शत्रुः" अर्थात् ऋण का करनेवाला पिता अपनी सन्तानों
का शत्रु होता है। ऐसा करने से उसका कारण तुम हो जाओगी।
१७- क्या तुम अपने माता पिता भाई बहिन की बुराई पति-
मुख से सुनना पसन्द करती हो ? यदि नहीं ! तो तुम भी पति के
सम्मुख उनके माता पिता और भाई बहन की बुराई मत करो !
क्योंकि उनको भी यह अच्छा प्रतीत नहीं होगा। यदि यश कामना
चाहो तो उनकी प्रशंसा करो। पति प्रसन्न होगा और यदि वे भी
सुनेंगे तो तुम्हारा यश गायेंगे। प्रशंसा-से-प्रशंसा और बुराई से
बुराई मिलती है। जैसा बोता है वैसा काटता है।
१८-यदि तुम अपनी सखियों की अपेक्षा अपने आपको
विशेष बुद्धिमती, स्वच्छ, पवित्र श्रृंगार वेषभूषा तथा भोजन आदि
पदार्थ बनाने में कुशल व श्रेष्ठ बनाओगी तो तुम्हारे पति का मन
तुम्हें छोड़कर और किसी स्त्री पर नहीं जायगा।
१९-जब कभी किसी के घर विवाह आदि संस्कार में जाना
हो, तब पति से पूछकर उनकी अनुमति से जाना चाहिए अन्यथा
नहीं। जो पराये घर में बिना प्रयोजन केवल बातें करने के लिए,

असली कोकशास्त्र १६७

अपने घर का काम-काज छोड़कर जाती है। उसका आचार-विचार
अच्छा नहीं समझा जाता और वह पति की नजरों से गिर जाती है।
२०—स्त्री को चाहिए कि सखियों के अथवा अन्य स्त्रियों के
साथ बैठकर किसी दूसरे की निन्दा न करे और न सुने ही। यदि
कोई स्त्री निन्दा करती हो तो उसे मीठे वचनों से समझा दे कि
निन्दा अच्छी वस्तु नहीं, किसी का बुरा सोचना अच्छा नहीं, ऐसा
करने से दोष अपने में इकट्ठे होने लगते हैं। यदि इस प्रकार
समझाने से मानकर वह कोई अच्छी बात आरम्भ कर दे तो
अच्छा, अन्यथा वहाँ से टल जाय। बुराई करने या सुनने से दोनों
की हानि होती है, इस लिए इसका सर्वथा त्याग रखना चाहिए।
२१—पति यदि कोई वस्तु भेंट करे, तो तुम उसे बड़े प्रेम से
अपनाओ और उसको प्रशंसा करो, इससे पति का मन प्रसन्न होगा
और भविष्य में और वस्तु लाने के लिए उसका मन उत्साहित होगा।
२२—पति को प्रसन्न करने के लिए तुम भी कोई अपने हाथ
की बनी हुई चीज भेंट करो जो उनके व्यवहार में हमेशा रहनेवाली
हो। इससे उनका मन खुशी से फूल उठेगा और उन्हें इस बात का
गर्व होगा कि हमारी धर्म-पत्नी दस्तकारी में सिद्धहस्त है। इसी
प्रकार आदान प्रदान से परस्पर प्रेम की वृद्धि होती है।
२३—घर में सब प्रकार नौकरों-चाकरों की सुविधा होते हुए
भी तुम पति की सेवा अपने हाथ से करो। नौकरों पर उसका भार
मत छोड़ दो, यह तुम्हारा धर्म है। यदि तुम नौकरों के भरोसे

१६८ असली कोकशास्त्र
अपना कर्त्तव्य छोड़ दोगी तो धर्मच्युत हो जाओगी। उसका फल
तुम्हारा विनाश होगा। क्योंकि धर्मशास्त्र में लिखा है—“धर्म एव
हतो हन्ति, धर्मोरक्षति रक्षितः” नाश किया हुआ धर्म, अपने
नाशक का नाश कर डालता है और रक्षा किया हुआ अपने रक्षक
की रक्षा करता है। इसकी सत्यता बड़े-बड़े धनिक घरानों में स्पष्ट
दिखायी दे रही है। पति पत्नी की कुछ भी परवाह नहीं करता।
वहाँ स्त्रियाँ केवल विलास की सामग्री बनी बैठी हैं, और सब काम
नौकरों द्वारा निकल जाता है। जब गृहपत्नी की रूपछटा कम हुई
तब वे हृदयरूप-सिंहासन से उतार दी जाती हैं और बाजारू
वेश्याओं के पास पहुँचते हैं। बस यही सुख उन्हें पत्नी से मिलता
था और सब सम्बन्ध तो नौकरों से था। तुम्हारा सम्बन्ध केवल
भोग-विलास के लिए नहीं हुआ प्रत्युत् पति-सेवा के लिए भी है।
इसी लिए तुम धर्मपत्नी सहायिका समझी जाती हो। जो स्त्री
पतिसेवा अपने आप करती है उसका पति उसे जीवनभर नहीं
छोड़ता। उसका प्रेम वृद्धा हो जाने पर भी वैसा ही अटल रहता
है जैसा युवावस्था में था।
२४—पत्नी को चाहिए कि पति के इष्ट-मित्रों के साथ मीठा
व्यवहार करे उनका नम्रतापूर्वक सम्मान करे। जिसे पति देखकर
प्रसन्न हो।
२५—सेवक के विषय में लोग कहते हैं—“हमें काम प्यारा है,
चाम प्यारा नहीं” इस जनश्रुति से स्पष्ट मालूम होता है कि चाम

असली कोकशास्त्र २०३
इन दोनों के प्रकोप से रज-स्राव का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
इसके लिए खट्टे, उष्ण तथा तीखे पदार्थों का यथाशक्ति सेवन
करना लाभदायक होता है।
११—प्रदर, गर्मी तथा सूजाक आदि रोगों के कारण भी
गर्भ की स्थिति में बाधा पड़ती है।
१२—गर्भ स्थिर न होने का कारण नपुंसकता भी है। जो
मनुष्य स्त्री के साथ रमण करने की इच्छा करे, लेकिन अपनी
निर्बलता के कारण इच्छा पूरी न कर सके या स्त्री के पास जाते
ही जिसका पतला वीर्य अपने आप ही निकल जाय, दम फूलने
लगे, उसे नपुंसक कहते हैं। भावप्रकाश में सात प्रकार की
नपुंसकता लिखी है।
क्लीवःस्यात्सुरता शक्तस्तद्भावः क्लैब्यमुच्यते ।
तच्च सप्तविधं प्रोक्तं निदानं तस्य कथ्यते ॥ भावप्रकाश
मन की निर्बलता के कारण उत्पन्न हुई नामर्दी को 'मानस
क्लैव्य' पित्त की अधिकता से पैदा हुई नामर्दी को 'पित्तज-क्लैव्य'
वीर्य की कमी के कारण होनेवाली नपुंसकता को 'वीर्य-क्षय जन्य-
क्लैव्य' बीमारी के कारण नामर्दी को 'रोग-जन्य क्लैव्य' वीर्य-
वाहक नसों के कट जाने के कारण पैदा हुई नामर्दी को 'शिरोच्छेद
जन्य क्लैव्य' वीर्य के रोकने से उत्पन्न होने वाली नामर्दी को
'शुक्रस्तम्भन-क्लैव्य' और जन्म से ही नामर्दी को 'सहज-क्लैव्य'
कहते हैं।

२०४ असली कोकशास्त्र
वन्ध्या प्रकार और उसकी चिकित्सा
काकवन्ध्या मृतवत्सा गर्भस्त्राव्यस्तु याः स्त्रियः ।
आदि वन्ध्याश्च गीयन्ते दोषैरेभिर्नचान्यथा ॥
—बालतन्त्रम् ।
वन्ध्या चार प्रकार की होती हैं । काकवन्ध्या, मृतवत्सा,
गर्भस्त्रावी और आदिवन्ध्या या जन्मवन्ध्या ।
काकवन्ध्या उसे कहते हैं जिस स्त्री के एक सन्तान होकर
फिर गर्भ न रहे ।
मृतवत्सा वह है, जिसके बच्चे पैदा होकर मर जायँ—जियें
नहीं ।
गर्भस्त्रावी उस स्त्री को कहते हैं, जिस स्त्री के गर्भ स्थित हो-
हो कर नष्ट हो जायँ ।
आदिवन्ध्या, जो स्त्री कभी भी गर्भ धारण न करे ।
ये चारो वन्ध्यायँ ऊपर कही गयीं रक्त-पित्तादि दोषोंवाली
वन्ध्याओं से सर्वथा भिन्न प्रकार की हैं । इनके अतिरिक्त आठ
प्रकार की वन्ध्यायँ और होती हैं ।
त्रिपक्षी शुभ्रती सञ्ज्ञा त्रिमुखी व्याघ्रिणी बकी ।

असली कोकशास्त्र २०५

द्वे जीरके श्वेतवचाकर्कौट्याश्च फलं समम् ॥
तण्डुलोदक संपिष्टं चेत्स्थिता सूर्य सम्मुखो ।
त्रिदिनं च पिबेन्नारी दुग्धभक्तं च भोजनम् ॥
त्रिपक्षी, शुभ्रती, सज्जा, त्रिमुखी, व्याघ्रिणी, बकी कमली और
व्यक्तिनी । ये आठ प्रकार की वन्ध्यायें और होती हैं । अब इनके
लक्षण अलग-अलग कहे जाते हैं । जो स्त्री तीन पक्ष में ऋतुमती
हो, उसे 'त्रिपक्षी वन्ध्या' कहते हैं । दोनों जीरे, खुरासानी वच,
ककोड़े का फूल इन चीजों को बराबर-बराबर लेकर चावल के
पानी में पीसकर सूर्य के सामने खड़ी हो तीन दिन प्रातःकाल
पीना चाहिए और दूध तथा चावल के अतिरिक्त दूसरी कोई भी
चीज खाना उचित नहीं है । ऐसा करने से अवश्य गर्भ रह जाता
है, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ।
शुभ्रती नाम की वन्ध्या का शरीर संकुचित-सा रहता है और
देह में विवर्णता रहती है । यह बन्

२०६ असली कोकशास्त्र
जो स्त्री अनियमित समय में, कभी तो महीने के भीतर और
कभी महीने में कई बार और कभी डेढ़ दो महीने बाद रजस्वला
होती है उसे 'सज्जा वन्ध्या' कहते हैं । इसके लिए स्याहजीरा,
सफेद जीरा, खुरासानी बच, मँजीठ, ककोड़ो, हड़जोड़ी इन
औषधियों को बराबर भाग में ले चावल के पानी में महीन पीस
छानकर तीन दिन तक सबेरे सेवन करना चाहिए ।
जो स्त्री भोजन और मैथुन से कभी तृप्त नहीं होती तथा
सम्भोग के समय जिसकी योनि से जल निकले उसे त्रिमुखी वन्ध्या
कहते हैं । यह भी गर्भ नहीं धारण करती ।
'व्याघ्रणी' वन्ध्या उसे कहते हैं, जिसके एक बच्चा अधिक
अवस्था हो जाने पर पैदा हो और फिर गर्भ न रहे । इसके लिए
वही औषधि गुणकारी है जो त्रिपक्षी वन्ध्या के लिए लिखी गयी है ।
जिस स्त्री के आठवें दसवें दिन सफेद खून धातु के समान
गिरे और कोई सन्तान न हो उसे 'बका वन्ध्या' कहते हैं । इस
वन्ध्या के लिए किसी प्रकार की दवा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि
यह वन्ध्यात्व कभी भी दूर नहीं हो सकता ।
जिस स्त्री की योनि से निरन्तर पानी झरता रहे और गर्भ
न रहे उसे कमलिनी वन्ध्या कहते हैं । यह भी असाध्य है, किसी
प्रकार की दवा करना बेकार है ।
व्यक्तिनां बन्ध्या उसे कहते हैं जिसकी योनि से सफेद धातु
प्रति दिन गिरे यानी सोम प्रदर हो गया हो । लाल चिरायते के

असली कोकशास्त्र २०७
बीज, मिश्री, आँवला और रतनजोत को समान भाग में लेकर
गो-दुग्ध में पीस २१ दिन तक पीने से यह रोग दूर हो जाता है ।
जब सोम प्रदर दूर हो जाय तब दोनों जीरे, काला अगर, केसर,
ककोड़ा, मोरशिखा इन औषधियों को बराबर बराबर लेकर बछड़ा
ब्यायी हुई गाय के दूध में पीस कर तीन दिन तक सेवन करना
चाहिए ।
यदि वन्ध्या स्त्री रजस्वला ठीक समय से हो, पर गर्भ धारण
न करे तो समझना चाहिए कि उसका आर्त्तव दूषित है । यदि
ऋतुकाल में जामुन के फल का सा काला रज निकले, कमर में
शूल हो, पेट में जलन रहे, हाथ-पैर गरम रहे तथा रुधिर भी
गरम निकले तो समझना चाहिए कि आर्त्तव पित्त दूषित है ।
कमलगट्टा, तगर, कूट, मुलहठी और सफेद चन्दन इनको समान
भाग में लेकर कूट डाले । बाद बकरी के दूध में पीस छान कर
ऋतुकाल में तीन दिन या जितने दिन आर्त्तव जारी रहे, पान करे ।
फिर लक्ष्मणा जड़ी को गाय के दूध में पीस छानकर बारह दिन
तक पान करे और सूँघे ।
यदि ऋतुकाल में खून बहुत सूक्ष्म गिरे और उसका रंग कुसुम
के रंग का हो, कटि तथा योनि में दर्द हो, ज्वर हो, तो वायु दूषित
आर्त्तव समझना चाहिए। आम की जड़ का छिलका, दोनों कटेरियों
की जड़, जामुन की जड़ का छिलका । इनको बराबर बराबर लेकर
गऊ के दूध में पीसकर ऋतुकाल में पीना चाहिए । बाद लक्ष्मणा

२०८ असली कोकशास्त्र
जड़ी का सेवन ऊपर लिखे अनुसार करे । इससे वायु दूषित
बन्ध्यात्व मिट जाता है ।
यदि रक्त चिकना और अधिक गिरे और उसका रंग बहुत
लाल न होकर प्याज के रंग का सा हो तथा नाभि के पास पीड़ा
हो तो कफ दूषित आर्त्तव समझना चाहिए । आक की जड़,
मेंहदी, लौंग, नागकेसर, खरेटी की जड़ और गंगेरन की छाल सम
भाग में लेकर बकरी के दुध में घोंटकर पाने से कफ दूषित वन्ध्यात्व
दूर होता है । अथवा आँवला, हड़, बहेड़ा, सोंठ, मिर्च, चीता
इनको सम मात्रा में लेकर बकरी के दूध में पीस छानकर ऋतुकाल
में पीने से भी उक्त दोष समूल नष्ट हो जाता है ।
यदि ऋतुकाल में जोरों से बुखार हो, रक्त काला गिरे, वह
रक्त बहुत गर्म और चिकना हो, काँख, योनि, और कटि में शूल
हो, हड़फूटन रहे, नींद अधिक आवे तो समझो कि सन्निपात दूषित
वन्ध्यात्व है । अरंड ( रेंडी ) की छाल, आम की छाल, निसोथ,
कमलगट्टा, तगर, कूट, मुलहठी, सफेद चन्दन, इनको सम मात्रा
में लेकर बकरी के दूध में पीस-छान कर सात दिन तक सेवन
करे या रजस्राव होने पर्यन्त सेवन करे । बाद योनि-विकार
शुद्ध हो जाने पर आम की जड़, छोटी खटाई की जड़, लक्ष्मणा,
बाँझ ककोड़ी, सफेद फूलवाली विष्णुकान्ता, इनको सम मात्रा में
ले गाय के दूध में पीस छानकर नासिका के दाहिने छिद्र से पीने
पर पुत्र और बाम छिद्र से पीने पर कन्या उत्पन्न हो, वन्ध्यात्व

१४ असली कोकशास्त्र २०६
छूट जाय । यहाँ पर यह बात ध्यान में रहे कि ऊपर जो
औषधियाँ लिखी गयी हैं, उनका सेवन किसी अनुभवी वैद्य से
राय लेकर करना चाहिए । क्योंकि लक्षण पहचानना बड़ा
कठिन काम है ।
—०—
गर्भ स्थिति के लिए आवश्यक बातें
१—स्त्री पुरुष को स्नानादि से स्वच्छ होकर पवित्र और
साफ वस्त्र पहनना चाहिए । स्त्री यदि सफेद वस्त्र न पहन कर
रंगीन पहने तो कोई हर्ज नहीं, पर इतना जरूर हो कि वस्त्र का
रंग हलका और सफेदी लिए हुए हो, जैसे मोतिया रंग । काला
वस्त्र कभी न पहने ।
२—शयन-गृह साफ-सुथरा और सफेदी किया हुआ होना
चाहिये । उस घर में आवश्यक चाजों के सिवा अधिक चीजों का
रहना ठीक नहीं है । बहुधा लोग अपने सोने के कमरे में श्लील
चित्र टाँगा करते हैं; किन्तु यह बहुत बुरा बात है । ऐसे चित्रों
का बहुत ही बुरा असर सन्तान पर पड़ता है । कमरे में ऐसे ही
चित्र हों, जिनके देखने से मानस में विकार उत्पन्न न हो बल्कि
उत्पन्न हुए विकार नष्ट हो जायें और स्वाभाविक ही हृदय में उच्च
भाव पैदा हों ।
३—कमरा उत्तम गन्ध से परिपूर्ण होना चाहिए । यदि कोई

२१० असली कोकशास्त्र
फूल हो तो वह भी सफेद रंग का ही हो जैसे-बेला, चमेली आदि ।
४—कमरे में न तो बहुत अन्धेरा रहे और न तीक्ष्ण प्रकाश
ही हो; मन्द प्रकाश उत्तम है।
५—स्थान एकान्त और भय-रहित होना जरूरी है। गर्भाधान
करने के समय चारो ओर सन्नाटा छाया हुआ रहे ।
६—इस आनन्द के समय में स्त्री-पुरुष को निर्लज्ज और
निरंकुश नहीं हो जाना चाहिए, किन्तु अधिक लज्जा करना भी
ठीक नहीं। देखिये न, राजा विचित्र वीर्य की स्त्री ने लज्जा के
कारण गर्भाधान के समय आँखों पर पट्टी बाँध ली थी, जिसका
फल यह हुआ कि अन्ध-पुत्र धृतराष्ट्र पैदा हुआ। इस लिए इसका
भी पूरा ध्यान रखना उचित है।
७—मादक वस्तु का सेवन इस दिन कभी न करे। प्यास लगी
रहने या पानी पीकर तुरन्त गर्भाधान करने में प्रवृत्त न होना
चाहिए। भूखे पेट या भरे पेट रहना भी इस समय के लिए ठीक
नहीं। शरीर शिथिल, किसी प्रकार के रोग से पीड़ित या निद्रा-
युक्त होने पर गर्भ स्थित करने की चेष्टा एकदम त्याग देनी चाहिए।
८—सन्तान को जिस विषय में योग्य बनाना हो उसी विषय
का दोनों को चिन्तन करना चाहिए और जिस रूप की सन्तान
उत्पन्न करने की इच्छा हो उसी रूप को हृदय में स्थिर करना
उत्तम है।
—०—

असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम और निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
[...] यम से रहने वाले
[...] नहीं होता, उसीका
[...] ाय और रोग का
[...] वाहिए और आगे
[...] । इस प्रकरण में
[...] लोग किया है
[...] दिन जीवन पर
[...] नाशकारी रोग
[...] ही हैं। एक का
[...] रु से ही है।
[...] है और प्रमेह
[...] है।
[...] केवल स्त्रियों
[...] खट्टा, तीक्ष्ण
[...] से, चिन्ता से,
[...] , गर्भपात से,
[...] यह रोग उत्पन्न


(पृष्ठ पर चिपकी पर्ची पर हस्तलिखित पाठ / Handwritten text on the attached slip):

  • Facility. (फैसिलीटी) सुगमता
  • urgent.
  • Present hours of service
  • Precisely. - (प्रै सिस-)

२१० असली कोकशास्त्र
फूल हो तो वह भी सफेद रंग का ही हो जैसे-बेला, चमेली आदि।
४—कमरे में न तो बहुत अन्धेरा रहे और न तीक्ष्ण प्रकाश
ही हो; मन्द प्रकाश उत्तम है।
५—स्थान एकान्त और भय-रहित होना जरूरी है। गर्भाधान
करने के समय चारो ओर सन्नाटा छाया हुआ रहे।
६—इस आनन्द के समय में स्त्री-पुरुष को निर्लज्ज और
निरंकुश नहीं हो जाना चाहिए, किन्तु अधिक लज्जा करना भी
ठीक नहीं। देखिये न, राजा विचित्र वीर्य की स्त्री ने लज्जा के
कारण गर्भाधान के समय आँखों पर पट्टी बाँध ली थी, जिसका
फल यह हुआ कि अन्ध-पुत्र धृतराष्ट्र पैदा हुआ। इस लिए इसका
भी पूरा ध्यान रखना उचित है।
७—मादक वस्तु का सेवन इस दिन कभी न करे। प्यास लगी
रहने या पानी पीकर तुरन्त गर्भाधान करने में प्रवृत्त न होना
चाहिए। भूखे पेट या भारी पेट रहना भी इस समय के लिए ठीक
नहीं है। शरीर शिथिल, किसी प्रकार के रोग से पीड़ित या निद्रा-
युक्त होने पर गर्भ स्थित करने की चेष्टा एकदम त्याग देनी चाहिए।
८—सन्तान को जिस विषय में योग्य बनाना हो उसी विषय
का दोनों को चिन्तन करना चाहिए और जिस रूप की सन्तान
उत्पन्न करने की इच्छा हो उसी रूप को हृदय में स्थिर करना
उत्तम है।
—०—

असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम ओर निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
दूर रहने के लिए पूरी चेष्टा करनी चाहिए। संयम से रहने वाले
मनुष्य को रोग नहीं घेरते। जो मनुष्य संयमी नहीं होता, उसीका
रोग पीछा करता है। यदि कभी कोई भूल हो जाय और रोग आ
घेरे तो तुरन्त ही उसके शमन का उपाय करना चाहिए और आगे
के लिए पूर्णरीति से सावधान हो जाना चाहिए। इस प्रकरण में
दो ऐसे रोगों की चर्चा की जायगी, जिन्हें बहुधा लोग छिपाते हैं
और जिसका फल यह होता है कि किसी न किसी दिन जीवन पर
ही आ बनती है। ये दोनों ही महा भयानक और नाशकारी रोग
हैं। उत्तम सन्तानोत्पत्ति के तो ये जानी दुश्मन ही हैं। एक का
नाम प्रदर और दूसरे का नाम प्रमेह है। दो रोग एक से ही हैं।
भेद केवल इतना ही है कि प्रदर रोग स्त्री को होता है और प्रमेह
पुरुष को। पहले प्रदर रोग का वर्णन किया जाता है।
प्रदर रोग निर्बलता से हुआ करता है। यह रोग केवल स्त्रियों
को ही होता है, पुरुषों को नहीं। अति मैथुन से, खट्टा, तीक्ष्ण
चीजों के अधिक सेवन से, दिन में सोने से, अजीर्ण से, चिन्ता से,
शोक से, चोट लगने से, मादक वस्तुओं के सेवन से, गर्भपात से,
गर्भस्राव से तथा अप्राकृतिक भोजन करने से यह रोग उत्पन्न

यहाँ प्रस्तुत हस्तलिखित पृष्ठ (अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश/शब्दावली) का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

... क, रखकर
Reckoned (रेकन्ड) हिसाब, गिनना, आदर करना.
Existing (एग्जिस्टिंग) जान रखना, जीना, होना, रहना.
Regional (री-जन) देश, धरातल, लोक, जिला, खण्ड, मुल्क.
Basic
Liberal (लिवरेल) साफ़ उदार, दाता, सीधा,
Atmospheric (ऐटमोसफेरिक) पवन, बतास, वायुमंडल.
Specified (स्पेसिफाईड) विशेष वर्णन किया
either (आइ-दर) कोई, एक न एक, प्रत्येक.
Effort (एफ-फर्ट) दौड़ धूप उपाय, परिश्रम.
Trace (ट्रेस) रेखा (खांचना), पैर का चिन्ह, पता लगाना.
substitute (सबस्टिच्यूट) एक वस्तु जो दूसरे के तौर रखी जाय
Failing (फेलिंग) भूलत हुए,
Type (टाईप) छापे के अक्षर, चिन्ह, नमूना.
Endeavour (एन-डेवर) उद्योग करना, दौड़ धूप करना, हाथ पाँव-
Abandoned मारना.
Acceptable (एक्सेप्टेबिल) स्वीकार योग्य, भला, मनभावना, अच्छा
Mature (मै-च्यूर) पका, तैयार.
attached table (ऐ-टैच्ड) जोड़ा, मिलाया, कुर्क किया, नत्थी कीया, ठीक
Associated (एस-सो-शि-ऐटेड) मिलाया, रोश्त, संगत, साथी (अपनाया)
He may also state :- साथ कहना
Alternative ओलटरनेटिव) दो में से एक पसंद करना, चाहे जौन सा,
(indicating) (इन्डीकेटिंग) बताना. विकल्प
Regards (री-गार्ड) आदर करना, मुलाहिजा करना, ख्याल करना, सम्बन्ध
guarantee (गारंटी) जिम्मेवार. (कृपा करना, मियाद रखना

specifically. (स्पे-सि-फि-के-ली) ब्योरा, विशेष वर्णन.
desires - डिजाइर / चाहता है, इच्छा
Extension - एक्स्टेन्शन - फैलाव.
Applicable - (एप्पली
Provided - (प्रोवाईडेड) बशर्ते कि, इस प्रतिज्ञा / तजवीज़ किया यदि
Limited - (लिमिटेड) सीमा, रोकता, किनारा, घेरा,
Terminate - (टरमीनेट) समाप्त करना,
Definitely. (डेफिनेटली) निश्चय.
Enables. (एन-ए-बिल) शक्त बनाना, समर्थ करना.
unless.
confident. (कानफीडेन्ट) निःसन्देह, विश्वास पात्र.
interruption
additional (ऐ-डिश-अन-ऐल) अधिक, फालतू,
Facility. (फैसिलीटी) सुगमता, तेजी, होशियारी.
urgent.
Present hours of service are 14-30 to 18--30 (I.S.T)
Precisely. - (प्रीसिस-ली) हूबहू, ठीक रीति से

असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम और निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
दूर रहने के लिए पूरी चेष्टा करनी चाहिए। संयम से रहने वाले
मनुष्य को रोग नहीं घेरते। जो मनुष्य संयमी नहीं होता, उसीका
रोग पीछा करता है। यदि कभी कोई भूल हो जाय और रोग आ
घेरे तो तुरन्त ही उसके शमन का उपाय करना चाहिए और आगे
के लिए पूर्णरीति से सावधान हो जाना चाहिए। इस प्रकरण में
दो ऐसे रोगों की चर्चा की जायगी, जिन्हें बहुधा लोग छिपाते हैं
और जिसका फल यह होता है कि किसी न किसी दिन जीवन पर
ही आ बनती है। ये दोनों ही महा भयानक और नाशकारी रोग
हैं। उत्तम सन्तानोत्पत्ति के तो ये जानी दुश्मन ही हैं। एक का
नाम प्रदर और दूसरे का नाम प्रमेह है। दो रोग एक से ही हैं।
भेद केवल इतना ही है कि प्रदर रोग स्त्री को होता है और प्रमेह
पुरुष को। पहले प्रदर रोग का वर्णन किया जाता है।
प्रदर रोग निर्बलता से हुआ करता है। यह रोग केवल स्त्रियों
को ही होता है, पुरुषों को नहीं। अति मैथुन से, खट्टा, तीक्ष्ण
चीजों के अधिक सेवन से, दिन में सोने से, अजीर्ण से, चिन्ता से,
शोक से, चोट लगने से, मादक वस्तुओं के सेवन से, गर्भपात से,
गर्भस्राव से तथा अप्राकृतिक भोजन करने से यह रोग उत्पन्न