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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 440 में से

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१६६ असली कोकशास्त्र
का तो ठिकाना नहीं कब आ उपस्थित हो। उस समय की रक्षा
बचे धन से ही हो सकती है। जो नारी इस बात पर ध्यान नहीं
देती और फजूल खर्च करती है, उसके पति को कर्ज लेकर दूसरे
का ऋणी होना पड़ता है। जिसका परिणाम यह होता है कि कर्जा
उतारते-उतारते बच्चों को दुःख उठाना पड़ता है। लिखा है "ऋण-
कर्त्ता पिता शत्रुः" अर्थात् ऋण का करनेवाला पिता अपनी सन्तानों
का शत्रु होता है। ऐसा करने से उसका कारण तुम हो जाओगी।
१७- क्या तुम अपने माता पिता भाई बहिन की बुराई पति-
मुख से सुनना पसन्द करती हो ? यदि नहीं ! तो तुम भी पति के
सम्मुख उनके माता पिता और भाई बहन की बुराई मत करो !
क्योंकि उनको भी यह अच्छा प्रतीत नहीं होगा। यदि यश कामना
चाहो तो उनकी प्रशंसा करो। पति प्रसन्न होगा और यदि वे भी
सुनेंगे तो तुम्हारा यश गायेंगे। प्रशंसा-से-प्रशंसा और बुराई से
बुराई मिलती है। जैसा बोता है वैसा काटता है।
१८-यदि तुम अपनी सखियों की अपेक्षा अपने आपको
विशेष बुद्धिमती, स्वच्छ, पवित्र श्रृंगार वेषभूषा तथा भोजन आदि
पदार्थ बनाने में कुशल व श्रेष्ठ बनाओगी तो तुम्हारे पति का मन
तुम्हें छोड़कर और किसी स्त्री पर नहीं जायगा।
१९-जब कभी किसी के घर विवाह आदि संस्कार में जाना
हो, तब पति से पूछकर उनकी अनुमति से जाना चाहिए अन्यथा
नहीं। जो पराये घर में बिना प्रयोजन केवल बातें करने के लिए,