रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
४ ( ४६ )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
सूने घर को मिलन २६ मद हाव २७
निशि चार को मिलन ३० श्रीराधिकाजू को मद हाव २८
अति भय को मिलन ३१ श्रीकृष्णजू को मद हाव २६
उत्सव को मिलन ३२ विभ्रम हाव ३०
व्याधि मिस को मिलन ३३ श्रीराधिकाजू को विभ्रम हाव ३१
न्योते के मिस को मिलन ३५ श्रीकृष्णजू को विभ्रम हाव ३२
वन-विहार के मिस को मिलन ३५ विहृत हाव ३३
जलविहार को मिलन ३६-३७ श्रीराधिकाजू को विहृत हाव ३४
उपसंहार ३८-४१ श्रीकृष्णजू को विहृत हाव ३५
६ विलास हाव ३६
भाव-लक्षण १ श्रीराधिकाजू को विलास हाव ३७
भाव के भेद २ श्रीकृष्णजू को विलास हाव ३८
विभाव-वर्णन ३ किलकिंचित हाव ३६
विभाव के भेद ४-५ श्रीराधिकाजू को किलकिंचित हाव ४०
आलंबन-स्थान ६ श्रीकृष्णजू को किलकिंचित हाव ४१
उद्दीपन ७ बिब्बोक हाव ४२
अनुभाव ८ श्रीराधिकाजू को बिब्बोक हाव ४३
स्थायी भाव ९ श्रीकृष्णजू को बिब्बोक हाव ४४
सात्त्विक भाव १० विच्छित्ति हाव ४५
व्यभिचारी भाव ११ श्रीराधिकाजू को विच्छित्ति हाव ४६
व्यभिचारी नाम १२-१४ श्रीकृष्णजू को विच्छित्ति हाव ४७
हाव-लक्षण १५ मोट्टाइत हाव ४८
हाव के प्रकार १६-१७ श्रीराधिकाजू को मोट्टाइत हाव ४६
हेला हाव १८ श्रीकृष्णजू को मोट्टाइत हाव ५०
श्रीराधिकाजू को हेला हाव १६ कुट्टमित हाव ५१
श्रीकृष्ण को हेला हाव २० श्रीराधिकाजू को कुट्टमित हाव ५२
लीला हाव २१ श्रीकृष्णजू को कुट्टमित हाव ५३
श्रीराधिकाजू को लीला हाव २२ बोधक हाव ५४
श्रीकृष्णजू को लीला हाव २३ श्रीराधिकाजू को बोधक हाव ५५
ललित हाव २४ श्रीकृष्णजू को बोधक हाव ५६
श्रीराधिकाजू को ललित हाव २५ उपसंहार ५७
श्रीकृष्णजू को ललित हाव २६
( ५० )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
७ स्वकीया-परकीया के अन्य भेद ३३
अष्टनायिका-वर्णन १ नायिका के समस्त भेद ३४
अष्टनायिका-नाम २-३ उत्तमा ३५-३६
स्वाधीनपतिका ४ मध्यमा ३७-३८
प्रच्छन्न स्वाधीनपतिका ५ अधमा ३६-४०
प्रकाश स्वाधीनपतिका ६ नायक-नायिका-भेद के तत्त्व ४१
उत्का ७ अगम्या नायिका ४२-४३
प्रच्छन्न उत्का ८ उपसंहार ४४
प्रकाश उत्का ६ ८
वासकसज्जा १० विप्रलंभ शृंगार १
प्रच्छन्न वासकसज्जा ११ विप्रलंभ शृंगार के भेद २
प्रकाश वासकसज्जा १२ पूर्वानुराग ३
अभिसंधिता १३ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग ४
प्रच्छन्न अभिसंधिता १४ श्रीराधिकाजू को प्रकाश पूर्वानुराग ५
प्रकाश अभिसंधिता १५ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग ६
खंडिता १६ श्रीकृष्णजू को प्रकाश पूर्वानुराग ७
प्रच्छन्न खंडिता १७ दशदशा-वर्णन ८
प्रकाश खंडिता १८ दशदशा-नामकथन ६
प्रोषितपतिका १६ अभिलाष १०
प्रच्छन्न प्रोषितपतिका २० श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न अभिलाष ११
प्रकाश प्रोषितपतिका २१ श्रीराधिकाजू को प्रकाश अभिलाष १२
विप्रलब्धा २२ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न अभिलाष १३
प्रच्छन्न विप्रलब्धा २३ श्रीकृष्णजू को प्रकाश अभिलाष १४
प्रकाश विप्रलब्धा २४ चिंता १५
अभिसारिका २५ श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न चिंता १६
स्वकीया अभिसारिका २६ श्रीराधिकाजू की प्रकाश चिंता १७
प्रच्छन्न प्रेमाभिसारिका २७ श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चिंता १८
प्रकाश प्रेमाभिसारिका २८ श्रीकृष्णजू की प्रकाश चिंता १६
प्रच्छन्न गर्वाभिसारिका २६ गुणकथन २०
प्रकाश गर्वाभिसारिका ३० श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुणकथन २१
प्रच्छन्न कामाभिसारिका ३१ श्रीराधिकाजू को प्रकाश गुणकथन २२
प्रकाश कामाभिसारिका ३२ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न गुणकथन २३
श्रीकृष्णजू को प्रकाश गुणकथन २
( ५१ )
विषय छंदसंख्या विषय छंद संख्या
स्मृति २५ मान के भेद २
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न स्मृति २६ गुरुमान ३
श्रीराधिकाजू की प्रकाश स्मृति २७ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुरुमान
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न स्मृति २८ चित्र-दर्शन तें ४
श्रीकृष्णजू की प्रकाश स्मृति २९ श्रीराधिकाजू को प्रकाश गुरुमान
उद्वेग ३० श्रवण तें ५
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उद्वेग ३१ नायक को गुरुमान-लक्षण ६
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उद्वेग ३२ श्रीकृष्ण को प्रच्छन्न गुरुमान ७
श्रीकृष्णजू कों प्रच्छन्न उद्वेग ३३ श्रीकृष्ण को प्रकाश गुरुमान ८
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उद्वेग ३४ लघुमान ९
प्रलाप ३५ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न लघुमान १०
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रलाप ३६ श्रीराधिकाजू को प्रकाश लघुमान ११
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रलाप ३७ प्रिय को लघुमान-लक्षण १२
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रलाप ३८ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न लघुमान १३
श्रीकृष्णजू को प्रकाश प्रलाप ३९ श्रीकृष्णजू को प्रकाश लघुमान १४
उन्माद ४० मध्यममान १५
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उन्माद ४१ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न मध्यममान १६
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उन्माद ४२ श्रीराधिकाजू को प्रकाश मध्यममान १७
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न उन्माद ४३ प्रिय को मध्यममान-लक्षण १८
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उन्माद ४४ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न मध्यममान १९
व्याधि ४५ श्रीकृष्णजू को प्रकाश मध्यममान २०
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न व्याधि ४६ उपसंहार
श्रीकृष्णजू की प्रकाश व्याधि ४७ १०
जड़ता ४८ मानमोचन-लक्षण
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न जड़ता ४९ मानमोचन-उपाय
श्रीराधिकाजू की प्रकाश जड़ता ५० साम उपाय
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न जड़ता ५१ श्रीराधिकाजू को साम उपाय ४
श्रीकृष्णजू की प्रकाश जड़ता ५२ श्रीकृष्णजू को साम उपाय ५
मरण ५३ दान उपाय ६-७
उपसंहार ५४-५७ श्रीराधिकाजू को दान उपाय ८-९
९ श्रीकृष्णजू को दान उपाय १०
मान-लक्षण १ भेद उपाय ११
( ५२ )
विषय छंद संख्या विषय छंदसंख्या
श्रीराधिकाजू को भेद उपाय १२ श्रीराधिकाजू की निद्रा १४
श्रीकृष्णजू को भेद उपाय १३ श्रीकृष्णजू की निद्रा १५
प्रणति उपाय १४ श्रीराधिकाजू की सखीकी पत्री १६-१७
श्रीराधिकाजू की प्रेम तें प्रणति १५ श्रीकृष्णजू की सखी की पत्री १८
श्रीराधिकाजू की अति काम उपसंहार १९
तें प्रणति १६ १२
प्रणति में रसहानि १८ सखी-वर्णन १-२
श्रीकृष्णकी प्रणति अति हिततें १९ धाइ को वचन राधिका सों ३
उपेक्षा २० धाइ को वचन श्रीकृष्ण सों ४
श्रीराधिकाजू की उपेक्षा २१ जनी को वचन राधिका सों ५
श्रीकृष्णजू की उपेक्षा २२ जनी को वचन श्रीकृष्ण सो ६
प्रसंगविध्वंस २३ नाइनि को वचन राधिका सों ७
श्रीराधिकाजू को प्रसंगविध्वंस २४ नाइनि को वचन श्रीकृष्ण सों ८
श्रीकृष्णजू को प्रसंगविध्वंस २५ नटी को वचन राधिका सों ९
मानमोचन-हेतु २६-२७ नटी को वचन श्रीकृष्ण सों १०
उपसंहार २८-३३ परोसिन को वचन राधिका सों ११
११ परोसिन को वचन श्रीकृष्ण सों १२
करुणाविरह १-२ मालिन को वचन राधिका सों १३
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न मालिन को वचन श्रीकृष्ण सों १४
करुणाविरह ३ बरइनि को वचन राधिका सों १५
श्रीराधिकाजू को प्रकाश बरइनि को वचन श्रीकृष्ण सों १६
करुणाविरह ४ शिल्पिनी को वचन राधिका सो १७
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न करुणाविरह ५ शिल्पिनी को वचन श्रीकृष्ण सों १८
श्रीकृष्णजू को प्रकाश करुणाविरह ६ चुरिहेरिन को वचन राधिका सों १९
प्रवासविरह ७ चुरिहेरिन को वचन श्रीकृष्ण सों २०
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न सुनारिन को वचन राधिका सों २१
प्रवासविरह ८ सुनारिन को वचन श्रीकृष्ण सों २२
श्रीराधिकाजू को प्रकाश रामजनी को वचन राधिका सों २३
प्रवासविरह ९ रामजनी को वचन श्रीकृष्ण सों २४
श्रीराधिकाजू को विरहभयविभ्रम १० संन्यासिनि को वचन राधिका सों २५
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रवास विरह ११ संन्यासिनि को वचन श्रीकृष्णसों २६
श्रीकृष्णजू को विरहभय-विभ्रम १३ पटइनि को वचन राधिका सों २७-२८
( ५३ )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
पटइनि को वचन श्रीकृष्ण सों २६ कृष्ण को अतिहास १४
उपसंहार ६० परिहास-लक्षण १५
१३ राधा को परिहास १६
सखीजन-कर्म १ कृष्ण को परिहास १७
राधिका सों शिक्षा २ करुणरस-लक्षण १८
कृष्ण की शिक्षा ३ श्रीराधिकाजू को करुणरस १६
राधा सों विनय ४ श्रीकृष्णजू को करुणरस २०
कृष्ण सों विनय ५ रौद्ररस-लक्षण २१
राधा को मनाइबो ६-७ श्रीराधिकाजू को रौद्ररस २२
कृष्ण को मनाइबो ८ श्रीकृष्णजू को रौद्ररस २३
राधा को मिलैबो ६-११ वीररस-लक्षण २४
कृष्ण को मिलैबो १२ श्रीराधिकाजू को वीररस २५
राधिका को श्रृंगार १३ श्रीकृष्णजू को वीररस २६
कृष्ण को शृंगार १४ भयानकरस-लक्षण २७
राधा को झुकिबो १५-१६ श्रीराधिकाजू को भयानकरस २८
कृष्ण को झुकिबो १७ श्रीकृष्णजू को भयानकरस २६
राधिका सों उराहनो १८ बीभत्सरस-लक्षण ३०
कृष्ण को उराहनो १६ श्रीराधिकाजू को वीभत्सरस ३१
राधावचन सखी सों २० श्रीकृष्णजू को वीभत्सरस ३२
उपसंहार २१-२२ अद्भुतरस-लक्षण ३३
१४ श्रीराधिकाजू को अद्भुतरस ३४-३५
हास्यरस-लक्षण १ श्रीकृष्णजू को अद्भुतरस ३६
हास्यरस के भेद २ शमरस-लक्षण ३७
मंदहास-लक्षण ३ श्रीराधिकाजू को शमरस ३८
ग्रंथविस्तार-भय ४ श्रीकृष्णजू को शमरस ३६-४०
राधिका को मंदहास ५-६ उपसंहार ४१
कृष्ण को मंदहास ७ १५
कलहास-लक्षण ८ वृत्ति-वर्णन १
राधिका को कलहास ६-१० कैशिकी २-३
कृष्ण को कलहास ११ भारती ४-५
अतिहास-लक्षण १२ आरभटी ६-७
राधिका को अतिहास १३ सात्वती ८-६
उपसंहार १०
( ५४ )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
१६
अनरस-वर्णन १ पात्रादुष्ट १०-११
प्रत्यनीक २-३ रस-बैर १२
नीरस ४-५ रसोत्पत्ति-क्रम १३
विरस ६-७ भूल-सुधार-प्रार्थना १४
दुःसंधान ८-६ फलश्रुति १५-१६
रसिकप्रिया
प्रथम प्रभाव
अथ मंगलाचरण
(१) गणेशवंदना ( छप्पय )
एकरदन गजबदन, सदनबुधि, मदनकदनसुत ।
गौरिनंद आनंदकंद जगबंद, चंदजुत ।
सुखदायक दायक सुकीर्ति जगनायक-नायक ।
खलघायक घायक दरिद्र सब लायक-लायक ।
गुरु गुनअनंत भगवंत भव भगतिवंत-भवभयहरन ।
जय केसवदास निवासनिधि लंबोदर असरनसरन ।१।
प्रियाप्रसाद तिलक
शब्दार्थ—एकरदन = एक दाँतवाले । वदन = मुख । सदनबुधि = बुद्धि
के घर । मदन = कामदेव । कदन = नाश करनेवाले । मदनकदन = महादेव ।
गौरिनंद = पार्वती को आनंद देनेवाले । कंद = जड़ । जगबंद = ( जगद्वंद्य )
संसार के पूज्य । जगनायक = त्रिदेव ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश ) । नायक =
स्वामी । घायक = ( घातक ) मारनेवाले । लायक-लायक = योग्यों में भी
योग्य, सर्वश्रेष्ठ । गुरु = बड़े । भगवंत भव = संसार में समस्त ऐश्वर्यों से युक्त ।
( भग = षडैश्वर्य ) । भगतिवंत = भक्त । भव = आवागमन । निवासनिधि =
नव निधियों के घर ।
भावार्थ—एक दांतवाले, गजमुख, बुद्धि के घर, कामदेव का नाश करने-
वाले महादेव के पुत्र, अपनी माता पार्वती को आनंदित करनेवाले, आनंद
की जड़, संसार के वंदनीय, ललाट पर चंद्रमा धारण करनेवाले, सुखदायक,
कीर्ति देनेवाले, त्रिदेवों के भी स्वामी, दुष्टों को मारनेवाले, दरिद्रता को दूर
करनेवाले, सब योग्यों से भी योग्य, असंख्य बड़े गुणवाले, संसार में समस्त
समृद्धियों से संयुक्त, भक्तों का जन्ममरण का भय हरनेवाले, निधियों के निवास-
स्थान, असहाय को भी आश्रय देनेवाले लंबोदर श्रीगणेशजी की जय हो ।
अलंकार—आशिष ( केशव के मत से ), उल्लेख ।
पाठांतर १—सुकीर्ति-सुकृति । जग-गन । गुरु-गुन-गुन-गन । भगति-
भाग ।
तृतीय एवं चतुर्थ प्रभाव: नायक-भेद, सखा एवं दूत-लक्षण निरूपण
५६ रसिकप्रिया
सूचना—( १ ) 'जय' के प्रयोग से यह आशीर्वादात्मक मंगल है।
( २ ) सरदार कवि ने अपनी टीका में इसका अर्थ प्रणव और श्रीकृष्ण पर
भी घटाया है। (३) सूरति मिश्र ने 'रसग्राहकचंद्रिका' नाम्नी अपनी टीका में
'मदनकदन' को शृंगार में अप्रयुक्त प्रयोग मानकर इसका अर्थ 'धतूरा
खानेवाला' किया है। फिर यह शंका उठाकर कि धतूरे के अनेक पर्यायवाचक
शब्दों के होते हुए 'मदन' ही क्यों रखा गया, 'मदन' का अर्थ 'मद नहीं'
और 'कदन' का अर्थ सृष्टिसंहारकर्ता रुद्र ग्रहण किया है। इसी प्रकार के
अनेक प्रश्नोत्तर हैं। ( ४ ) 'जगनायक' का अर्थ 'त्रिदेव' करने में महादेव भी
आते हैं। महादेव गणेश के पिता हैं। ये उनके भी नायक कहे जाएँ तो
अनुचित है, ऐसा नहीं समझना चाहिए—'सुर अनादि जिय जानि।'
( २ ) श्रीकृष्णवंदना—( छप्पय ) .
श्रीबृषभानुकुमारिहेत शृंगाररूप भय।
बास हासरस हरे मातुबंधन करुनामय।
केसी प्रति अति रौद्र बीर मारो बत्सासुर।
भय दावानलपान पियो बीभत्स बकी उर।
अति अद्भुत बंचि बिरंचिमति, सांत संततै सोच चित।
कहि केसब सेवहु रसिकजन, नवरसमय ब्रजराज नित। २।
शब्दार्थ—श्रीवृषभानुकुमारि = श्रीराधिका। हेत = ( हेतु ) लिए।
भय = ( भए ) हुए। बास हरे = गोपियों के वस्त्र हरण किए। मातुबंधन =
कंस के कारागार में माता देवकी का बंधन। केसी = केशी राक्षस। बत्सासुर =
एक राक्षस। दावानलपान = एकबार श्रीकृष्ण दवाग्नि पी गए थे। बकी =
पूतना ( बकासुर की बहन )। उर पियो = स्तनपान किया। बंचि = ठगकर।
विरंचिमति = ब्रह्मा की बुद्धि। संततै = निरंतर ही। ब्रजराज = श्रीकृष्ण।
भावार्थ—जो श्रीकृष्ण श्रीराधिका के लिए शृंगाररस-रूप हुए, गोपि-
काओं के चीरहरण में हास्यरस-रूप बने, माता देवकी का कारावास में कष्ट
देखकर करुणरस-रूप हुए, केशी के प्रति क्रोध करके रौद्ररस-रूप दिखाई पड़े,
वत्सासुर के मारने में वीररस-मय हुए, दावाग्नि का पान करके भयानकरस-
युक्त हुए, पूतना का स्तनपान करके बीभत्सरस-मय दिखाई दिए, ब्रह्मा की
बुद्धि को छलने में अद्भुतरस-युक्त प्रतीत हुए तथा अर्जुन का मोह देखकर
चिंतित चित्त हो जाने के कारण शांतरस-मय लक्षित हुए, उन नवरसमय
ब्रजराज की सेवा रसिकजन नित्य करें।
अलंकार—उल्लेख और तृतीय विशेष का संदेह-संकर तथा रत्नावली
( क्रम से रसों का नाम आने के कारण ) ।
*—संततै-सांत से।
प्रथम प्रभाव ५७
अथ कविवर्णन—( दोहा )
(३) नदी बेतवै-तीर जहाँ, तीरथ तुंगारन्य ।
नगर ओछड़ो बहु बसै, धरनीतल में धन्य । ३ ।
शब्दार्थ —तुंगारन्य = ( तुंगारण्य ) ओछड़े के चारों ओर का जंगल ।
बहु बसै = घना बसा हुआ ।
(४ आश्रम चारि बसै जहाँ, चारि बर्न सुभ कर्म ।
जप तप विद्या वेद-बिधि, सबै बढ़े धन धर्म । ४ ।
(५) दिनप्रति जहाँ दूनो लहै, जहाँ दया अरु दान ।
एक तहाँ केसव सुकबि, जानत सकल जहान । ५ ।
(६) अपने अपने धर्म तहँ, सबै सदा सुखकारि ।
जासों देस बिदेस के, रहे सबै नृप हारि । ६ ।
(७) रच्यो बिरंचि बिचारि तहँ, नृपमनि मधुकरसाहि ।
गहरवार कासीस-रबि, कुलमंडन जसु जाहि । ७ ।
(८) ताको पुत्र प्रसिद्ध महिमंडन दूलहराम ।
इंद्रजीत ताको अनुज, सकल धर्म को धाम । ८ ।
(६) दीन्ही ताहि नृसिंहजू, तन मंन रन जयसिद्धि ।
हित करि लच्छन-राम ज्यों, भई राज की वृद्धि । ६ ।
(१०) तिन कबि केसवदास सों, कीन्हों धर्मसनेहु ।
सब सुख दैकरि यों कह्यो, रसिकप्रिया करि देहु ।१०।
शब्दार्थ—धर्मसनेहु कीन्हों = धर्म का स्नेह किया अर्थात् गुरु बनाकर
दीक्षा ग्रहण की ।
(११) संबत सोरह सै बरष, बीते अठतालीस ।
कातिग सुदि तिथि सप्तमी, बार बरनि रजनीस ।११।
शब्दार्थ—बरनि = बरनो, कहो ।
भावार्थ- संवत् १६४८ कार्तिक शुक्ला सप्तमी सोमवार के दिन केशव
ने 'रसिकप्रिया' का आरंभ किया ।
(१२) अति रति-गति मति एक करि, विविध-बिबेक-विलास ।
रसिकन कों रसिकप्रिया, कीनी केशवदास ।१२।
शब्दार्थ —रति-गति एक करि = अपनी प्रीति को सब ओर से खींचकर ।
मति एक करि = बुद्धि को एकाग्र करके ।
भावार्थ—अन्य शास्त्रों से अपनी प्रीति को खींचकर और बुद्धि को
६—तहँ-तें । ६—राज की-राजसी । १०—कीन्हों०-कियो धर्म सों
नेहु । ११—गति०-मति गति ।
५८ रसिकप्रिया
अत्यंत एकाग्र करके केशवदास ने विवेकपूर्वक अनेक रीतियों से रसिकों के
लिए 'रसिकप्रिया' की रचना की ।
(१३) ज्यों बिनु दीठि न सोभिजै, लोचन लोल बिसाल ।
त्यों ही केसव सकल कबि, बिन बानी न रसाल ॥१३॥
भावार्थ—जिस प्रकार दृष्टि के बिना बड़े और चंचल नेत्र भी शोभित
नहीं होते उसी प्रकार रसिक कवि भी बिना वाणी के शोभा नहीं पाते ।
अलंकार—उपमा ।
(१४) तातें रुचि सों सोचि पचि कीजै सरस कबित्त ।
केसव स्याम सुजान को, सुनत होइ बस चित्त ॥१४॥
भावार्थ—इसलिए रुचि से सोच विचार कर सरस श्रीकृष्णविषयक
कविता करनी चाहिए, जिसे सुनकर सबका चित्त वशीभूत हो जाय ।
अथ नवरसवर्णन—(दोहा)
(१५) प्रथम सिँगार सुहास्य रस, करुना रुद्र सु बीर ।
भय बीभत्स बखानिये, अद्भुत सांत सुधीर ॥१५॥
(१६) नवहू रस के भाव बहु, तिनके भिन्न विचार ।
सबको केसवदास हरि, नायक है सृंगार ॥१६॥
अथ श्रृंगारसलक्षण—(दोहा)
(१७) रति-मति की अति चातुरी, रतिपति-मंत्र विचार ।
ताही सों सब कहत हैं, कबि कोविद् श्रृंगार ॥१७॥
शब्दार्थ—रति = प्रीति । रतिपति = कामदेव । कोविद = पंडित ।
भावार्थ—जहाँ रति (प्रीति) संयुक्त बुद्धि की अत्यंत चतुरता और काम
(कला) के विचार का वर्णन रहता है उसे कवि और पंडित लोग श्रृंगार कहते हैं।
अथ श्रृंगार के भेद—( दोहा )
(१८) सुभ संजोग बियोग पुनि द्वै सिंगार की जाति ।
पुनि प्रच्छन्न प्रकाश करि, दोऊ द्वै द्वै भाँति ॥१८॥
अथ प्रच्छन्न-संयोग-शृंगार-लक्षण—(दोहा)
(१९) सो प्रच्छन्न संजोग अरु, कहैं बियोग प्रमान ।
जानें पीउ प्रिया कि सखि, होइ जु तिनहिं समान ॥१६॥
भावार्थ—प्रच्छन्न संयोग और वियोग शृंगार वह है जिसे नायक-नायिक ।
या उन्हीं के समान सखी ही जानें ।
१३—सोभिजै—सोभिये । १४—सों-सुचि । १८—द्वै सिंगार-दोउ
सिंगार । १६—प्रिया-पिया । होइ होहि ।
प्रथम प्रभाव ५६.
(२०) अथ प्रच्छन्न-संयोग-शृंगार, यथा—( सवैया )
बन में वृषभानुकुमारि मुरारि रमे रुचि सों रसरूप पियें ।
कल कूजत पूजत कामकला बिपरीत रची रति केलि कियें ।
मनि सोभित स्याम जराइ जरी अति चौकी चलै चल चारु हियें।
मखतूल के मूल झुलावत केसव भानु मनो सनि अंक लियें ॥२०॥
शब्दार्थ—मुरारि = कृष्ण । रसरूप पियें = सौंदर्यरस का पान किए
हुए । कल = सुंदर । कूजत = बोलते हैं । पूजत = पूर्ण करते हैं। काम-कला =
शृंगारिक चेष्टाएँ । विपरीत रति = नायक नायिका की उलटी काम-क्रीड़ा ।
केलि कियें = काम क्रीड़ा करते हुए । मनि = माणिक, लाल रत्न । स्याम =
नीलम । जराइ जरी = पच्चीकारी की हुई । चौकी = गले में पहनने का एक
गहना, उरबसी, पदक । चारु = सुंदर । हियें = वक्षःस्थल पर । मखतूल =
काला रेशम । भानु = सूर्य । अंक = गोद ।
भावार्थ—( नायिका की अंतरंग सखी नायक की अंतरंग सखी से कहती
है ) वन में श्रीराधिका और कृष्ण सौंदर्यरस का पान किए हुए रुचिपूर्वक
रमण करने लगे, वे काम की कला को पूर्ण करनेवाले सुंदर शब्दयुक्त
कामक्रीड़ा करते हुए विपरीत रति में संलग्न हुए । ( उस समय राधिका जी
के झूमने से उनके ) गले में पड़ी हुई माणिक में नीलम से जटित अत्यंत
सुंदर और चंचल चौकी का हिलना ऐसा प्रतीत होता हैं मानो सूर्य शनि को
अपनी गोद में लिए हुए काले रेशम के झूले में झुला रहा है (यहाँ पर
माणिक की बनी चौकी भानु और नीलम शनैश्चर है । जिसमें चौकी पिरोई
हुई है वह काले रेशम का धागा झूले की डोर है ) ।
अलंकार—उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा ।
सूचना—सूरति मिश्र और उनके अनुगमन पर सरदार कवि ने इस सवैये
पर कई शंकाएँ उठाई हैं, यथा—'शृंगार में मुरारि नाम, विपरीत रति में सूर्य
और शनि ( पिता-पुत्र ) की उत्प्रेक्षा आदि । उन्होंने इनका अपने ढंग से
समाधान भी किया है ।
(२१) अथ प्रकाश-संयोग औ प्रकाश-वियोग-लक्षण--( दोहा )
सो प्रकास संजोग अरु, कहैं प्रकास बियोग ।
अपने अपने चित्त में, जानैं सिगरे लोग ॥२१॥
भावार्थ—जिस संयोग और वियोग शृंगार को अंतरंग-बहिरंग सखी-
सखा आदि सब जानें उसे प्रकाश संयोग और प्रकाश वियोग कहते हैं ।
२०—किये-हिए । सोहत-सोभित ।
६० रसिकप्रिया
(२२) प्रकाश संयोग यथा—( सवैया )
केसव एक समै हरि-राधिका आसन एक लसैं रँगभीनें।
आनँद सों सिंद-आनन की दुति देखत दर्पन में दृग दीनें।
भाल के लाल में बाल बिलोकितहीं भरि लाल न लोचन लीनें।
सासन पीय सबासन सीय हुतासन में मनो आसन कीनें।२२।
शब्दार्थ—रँगभीने = प्रेम से युक्त। लाल = माणिक। बाल = (बाला)
नायिका (राधिका)। लालन = नायक (श्रीकृष्ण)। सासन = आज्ञा। पीय =
प्रिय (रामचंद्र)। सबासन = वस्त्रों सहित (कपड़े पहने हुए)। हुतासन = अग्नि।
भावार्थ—(बहिरंग सखी की उक्ति बहिरंग सखी से) हे सखी, एक
बार श्रीकृष्ण और राधिका प्रेमपूर्वक एक ही आसन पर विराजमान थे और
श्रीकृष्ण दर्पण में आनंदसहित राधिका के मुख की छवि टकटकी लगाकर
देख रहे थे। (दर्पण में राधिका का प्रतिबिंब पड़ रहा था। उस प्रतिबिंब में
राधिका के भाल की लाल टिकुली में उनका-राधिका का-पुनः प्रतिबिंब
पड़ रहा था।) उस भाल पर की बेंदी के माणिक में पड़नेवाले राधिका के
प्रतिबिंब को देखकर तुरंत श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रों में आँसू भर लिए।
(श्रीकृष्ण को अपने रामावतार के उस समय की सुध आ गई जब पति की
आज्ञा से सीता ने अग्निप्रवेश किया था।) मानो अपने पति रामचंद्र की
आज्ञा से सीता ने (अग्निपरीक्षा के लिए) सवस्त्र अग्नि में प्रवेश किया हो।
अलंकार—स्मरण और उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा का अंगांगिभाव संकर।
(२३) अथ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्नवियोग श्रृंगार, यथा (सवैया)
कीट ज्यों काटत काननि कान्ह सों मानहूँ में कहि आवत ऊनो।
ताहि चलैं सुनिकै चुप ह्वै रहे नीकहिं केसव एक न दूनो।
नेक अटें पट फूटति आँखि सु देखति हैं कब कों व्रज सूनो।
काहे कों काहू को कीजै परेखो'ब जीजै री जीव की नाक दै चूनो।२३।
शब्दार्थ—कहि आवत = कहा जाता था, कहते थे। ऊनो = बुरा।
नीकहिं = भली भाँति। नेक = थोड़ा, थोड़ी देर के लिए। अटें पट = परदा
पड़ जाने पर, घूँघट पड़ जाने पर। परेखो = परीक्षा। नाक चूनो दै जीजै =
नाक में चूना लगाकर जीती हैं, बदनामी सहती हुई बेहयाई के साथ जी रही हैं।
भावार्थ—(नायिका का वचन सखी से) श्रीकृष्ण पहले मान में भी बुरी
बात (बाहर चले जाने की बात) कहते थे तो वह जिन कानों को कीड़े के
२२—दर्पन में-दर्पन त्यों। बिलोकि०-बिलोकति ही। मनो-जनु।
२३—कांटत-काट त्यों। कान्ह-कान। मानहूँ-मानहि। नीकहिं-नीके
हीं। एक-एकहि। पट-पर। जीजै-जीजिए, जीय के।
प्रथम प्रभाव ६१
काटने की तरह (दुःखदायिनी) लगती थी । (आज) उन्हीं के चले जाने पर
(उनके चले जाने की बात) सुनकर भी (वे ही कान) एक नहीं, दोनों के
दोनों, भली भाँति चुप हो गए हैं । (शांत हैं, ऐसा समाचार सुनकर कट नहीं
गए) पहले श्रीकृष्ण के देखने में थोड़ी देर के लिए भी परदा पड़ जाने पर,
घूँघट की आड़ में होने पर जो आँखें फूटने लगती थीं आज वे ही आँखें न
जाने कब से ब्रज को (श्रीकृष्ण से) सूना देख रही हैं (और फूटती नहीं हैं)।
किसी (अर्थात् अपने अंगों) की क्या परीक्षा ली जाय, अब तो अपने प्राणों
को बेहयाई का टीका लगाकर जी रही हैं।
(२४) अथ राधिका की प्रकाश वियोग शृंगार यथा- (सवैया)
जिनके मुख की दुति देखत हीं निस-बासर केसव दीठि अटी।
पुनि प्रेम बढ़ावन की बतियाँ तजि आन कछू रसना न रटी।
जिनके पद पानि उरोज सरोज हिये धरिकै पल नैन घटी।
तिनके संग छूटतहीं फटु रे हिय तोहिं कहा न दरार फटी ।२४।
सूचना- यह छंद प्राचीनतम हस्तलिखित प्रतियों और लीथो वाली
प्रति में नहीं है। सरदार कवि ने इस पर टीका नहीं लिखी है। नारायण
कवि ने तो इसे 'केशव' का छंद ही नहीं माना है।
(२५) अथ श्रीराधिकाजू को प्रकाश-वियोग-शृंगार, यथा- (कवित्त)
सीतल समीर टारि चंद्रचंद्रिका निवारि,
केसौदास ऐसे ही तो हरषु हिरातु है।
फूलन फैलाइ डारि झारि डारि घनसारु,
चंदन कौं ढारि चित्त चौगुनो पिरातु है।
नीरहीन मीन मुरझाइ जीवै नीर ही तें,
छीर छिरके तें कहा धीरजु घिरातु है।
पाई है तैं पीर कैधौं यों ही उपचारु करै,
आगि को तौ डाढ्यो आँगु आगिहीं सिरातु है ॥२५॥
शब्दार्थ-टारि = हटा दे । चंद्रचंद्रिका = चंद्रमा की चाँदनी । निवारि =
रोक दे । हरषु हिरातु है = हर्ष खोया जा रहा है । घनसा = कपूर ।
मीन = मछली । छीर० = दूध के छिड़कने से । घिरातु है = (धैर्य) धरा जा
सकता है । पाई है तैं पीर = क्या तूने मेरी पीड़ा का मर्म समझा है (अर्थात्
मेरी इस पीड़ा का क्या कारण है ?) । यों ही = व्यर्थ । उपचारु = उपाय
(रोग-शांति के लिए औषध करना) । डाढ्यो = जला हुआ । सिरातु है, ।
ठंडा हो जाता है ।
२५-डारि-डारे । ढारि-टारु । मुरझाइ-मुरझाति । तें-पै । छिरके तें-
के छिरीके । डाढ्यो-दाध्या । आँगु-अंग ।
६२ रसिकप्रिया
भावार्थ - (नायिका की उक्ति सखी से) हे सखी, शीतल वायु को हटा,
चंद्रमा की चाँदनी को रोक, क्योंकि इसी प्रकार (के पदार्थों) से तो मेरा
हर्ष खोया जा रहा है (इनसे मुझे कष्ट हो रहा है)। फूलों को फेंक दे,
कपूर को झाड़ डाल, (घिसे) चंदन को (अन्यत्र) उड़ेल दे, क्योंकि इनसे
मेरे चित्त में चौगुनी पीड़ा होती है। मछली जल से रहित होकर अचेत होती
है तो जल पाने पर ही जी सकती है। उसके ऊपर दूध छिड़कने से उसे क्या
धैर्य होगा (वह जल छिड़कने से ही जीती है, दूध से नहीं)। (नायक से मेरा
वियोग हुआ है। अतः मैं उन्हीं को पाने पर जी सकती हूँ, इन उपचारों से
नहीं)। तूने मेरी इस पीड़ा का मर्म समझ भी पाया है या यों ही इसके लिए
उपचार कर रही है। (क्या तू नहीं जानती कि) आग का जला हुआ अंग
आग द्वारा (सेंकने से) ही ठंडा होता है। (इन उपचारों से मेरी व्याधि
दूर नहीं हो सकती, नायक के दर्शन होने पर ही इसका अंत होगा)।
अलंकार - व्याघात (शीतल उपचारों से विरहाग्नि के भड़कने से)।
(२६) श्रीकृष्ण को वियोग-श्रृंगार, यथा-( सवैया )
केसव रूठि रहा। तुम्हीं सों किधौं भय काहू के भीत भयो है।
बेच्यो है काहू के हाथनि नाथ किधौं तुम काहू के साथ दयो है।
मेरी सौं मा सहुँ भानहु बेगि इहाँ मनु नाहिं कँहाँ पठयो है।
साँची कहौ हरि हारयो है काहू सों काहू हरयो कि हिराइ गयो है।२६।
शब्दार्थ - सहुँ = से। भानहु = कहो। हिराइ० = खो गया है।
(२७) श्रीकृष्ण को प्रकाश-वियोग-श्रृंगार, यथा-( सवैया )
बात कहैं न सुनै कछु काहू त्यों हेरैं नहीं कोउ कैसेहूँ हेरो।
खाइँ कछू न पियैं कछु केसौ छुवै न कछू कर कोंरो करेरों।
हूलि उठी ब्रज बैठी कहा उठि आवहु देखि कह्यो करि मेरो।
जानै को माइ कहा भयो कान्ह कों जोग-सँजोग बियोग कि तेरो।२७।
शब्दार्थ - कोंरो = कोमल। करेरो = कठोर। जोग० योग की किसी
क्रिया का प्रभाव।
सूचना - संख्या २६-२७ नवलकिशोर प्रेस की प्रति में नहीं हैं।
(२८) (दोहा)
यों परछन्न प्रकास बिधि, बरने जोग बियोग।
अब नायक-लच्छन कहौं, गूढ़ अगूढ़ प्रयोग ॥२८॥
२८-बिधि-सब।
द्वितीय प्रभाव ५२
शब्दार्थ—जोग = संयोग । गूढ़=असाधारण । अगूढ़=साधारण, सामान्य ।
इति श्रीमन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायाँ
रसिकप्रियायाँ प्रच्छन्नप्रकाशसंयोग-
वियोग वर्णनं नाम प्रथमः
प्रभावः । १ ।
द्वितीय प्रभाव
( २६ ) अथ साधारण-नायक लक्षण—( दोहा )
अभिमानी त्यागी तरुन, कोककलानि प्रबीन ।
भव्य छमी सुंदर धनी, सुचिरुचि सदा कुलीन ।१।
शब्दार्थ—तरुन = युवा । कोककलानि प्रवीन = कामशास्त्र में पंडित ।
भव्य = रूपवान् । छमी=क्षमाशील । सुचिरुचि=पवित्र रुचि (इच्छा) वाला ।
( ३० ) ये गुन केसव जासु में, सोई नायक जानि ।
अनुकुल दछ सठ धृष्ट पुनि, चौबिधि ताहि बखानि ।२।
शब्दार्थ—अनुकुल = अनुकूल । दछ = ( दक्ष ) दक्षिण । चौविधि =
चार प्रकार के ( अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट ) ।
( ३१ ) अथ अनुकूल-लक्षण—( दोहा )
प्रीति करै निज नारि सों, परनारी-प्रतिकूल ।
केसव मन-बच-कर्म करि, सो कहिये अनुकूल ।३।
( ३२ ) अथ प्रच्छन्न-अनुकूल, यथा—( सवैया )
और के हास-विलास न भावत साधुनि को यह सिद्ध सुभावै ।
बात वहै जु सदा निबहै हरि, कोऊ कहूँ कछु सोधु न पावै ।
आसन बास सुबासन भूषन केसव क्योंहूँ यहौ बनि आवै ।
मो बिन पान न खात जु कान्ह सु बैरु किधौं यह प्रीति कहावै ।४।
शब्दार्थ—और = ( अपर ) अन्य । हास-विलास = हंसी-विनोद । साधु =
सज्जन । सिद्ध सुभावै = निश्चित प्रकृति ही है । सोधु = पता । बास = वस्त्र ।
सुबास = सुगंध । भूषन = गहना ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति नायक प्रति ) आपको जो ( मेरा हास-
विलास छोड़कर) किसी दूसरे का हास-विलास नहीं अच्छा लगता, वह सज्जनों
का निश्चित स्वभाव ही है । किंतु हे हरि, बात वही करनी चाहिए जिसका सदा
१—कोक-केलि । २—जासु-जाहि । अनुकुल-अतुलदक्ष । ३—नारी-
नारिनि । ४—जु-सु ।
६४ रसिकप्रिया
निर्वाह हो सके और जिसका कहीं किसी को कुछ पता भी न चल सके । (आपने
मेरे प्रेम के कारण जो ) आसन, वस्त्र, सुगंध और गहने छोड़ दिए हैं, यहाँ
तक तो किसी प्रकार बात बनी है पर आप जो मेरे (खिलाए ) बिना पान
नहीं खाते, हे कन्हैया यह आप मेरे साथ प्रीति कर रहे हैं या वैर ? क्योंकि
सखियाँ मेरी खिल्ली उड़ाती हैं जिससे मुझे क्लेश होता है ) ।
सूचना — इस सवैये में नायक के अनुकूलत्व वस्तु से लेशालंकार व्यंग्य है ।
(३३) अथ प्रकाश अनुकूल, यथा — ( सवैया )
केसव सूधे बिलोचन सूधी बिलोकनि कों अवलोकें सदाई ।
सूधियै बात सुनें समुझें कहि आवति सूधियै बात सुहाई ।
सूधी सी हाँसी सुधा निधि सो मुख सोधि लई बसुधा की सुधाई ।
सूधे सुभाइ सबै सजनी बस कैसैं किये अति टेढ़े कन्हाई ।५।
शब्दार्थ -- बिलोचन = ( द्विलोचन ) दोनों नेत्र । बिलोकनि = दृष्टि,
नजर । सदाई = सदैव । सुधानिधि = चंद्रमा, श्लेष से सिधाई ( सुधाई ) का
भांडार, अत्यंत सीधा । सोधि लई = खोज कर एकत्र कर ली । बसुधा =
पृथ्वी । सुधाई = सीधापन; अमृतत्व ।
भावार्थ — ( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, तेरे नेत्र सीधे हैं
और तू सीधी नजर से सदा देखती भी है । तू सीधी ही बात सुनती-समझती
है और सदैव सीधी ही बात कहती भी है । तेरी हँसी भी सीधी है और तेरा
मुख भी सुधाकर के समान है । तूने वसुधा का साग सुधातव (अमृतत्व और
स धापन) ढूँढ़-ढूँढ़कर एकत्र कर लिया है । इस प्रकार सब तरह के सीधे
स्वभाव की होकर तूने अत्यंत टेढ़े श्रीकृष्ण को कैसे अपने वश में कर लिया ?
अलंकार — श्रीकृष्ण जो सबसे टेढ़े रहते हैं वे नायिका के वश में हैं, यही
अनुकूलता है । नायक को वश में कर लेने की बात सब लोग जान गए इससे
'प्रकाश अनुकूल' है ।
(३४) अन्यच्च (सवैया)
मेरे तो नाहिन चंचल लोचन नाहिन केसव बानी सुधाई ।
जानौं न भूषन-भेद के भावनि भूलिहू मैं नहिं भौंह चढ़ाई ।
भोरेहूँ ना चितयो हरि ओर त्यों घूँरु करूँ इहिं भाँति लुगाई ।
रंचक तौ चतुराई न चित्तहि कान्ह भए बस काहे तें माई ।६।
शब्दार्थ - बानी (वाणी) = बोली । सुधाई = अमृत की भाँति, मीठी ।
५-कों-सों । सुधानिधि सो-सुधाकर से। सुभाइ-स्वभाव ।
६-नाहिन-नाहिनैं। बानी०-बानि सुहाई। भावनि०-भाव के भेदनि ।
मैं नहिं-नेनहिं; नैनन । चतुराई०-चतुराइ चित्त न । काहे०-कासु कें ।
५ द्वितीय प्रभाव ६५
भूषण-भेद के भाव = सोलहो शृंगार करके पति को रिझाना। भोरहूँ = भूलकर
भी । घेरु = बदनामी । लुगाई = स्त्रियाँ । रंचक = किंचित्, थोड़ी । माई =
हे सखी (स्त्रियों का संबोधन) ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, न तो मेरे नेत्र ही
चंचल हैं और न मेरी वाणी ही मनोहर है। न तो मैं सोलहो शृंगार करके
पति को रिझाने का ढंग ही जानती हूँ और न मैंने उन्हें रिझाने के लिए
कभी भौंहें ही चढ़ाई हैं (तिरछी नजर की है)। इसी प्रकार मैंने भूलकर भी
कृष्ण की ओर वैसे नही देखा जैसी ये स्त्रियाँ मेरी बदनामी कर रही हैं। मेरे
चित्त में (पति को वश में करनेवाली) चतुरता भी किञ्चिन्मात्र नहीं, पर न
जाने श्रीकृष्ण मेरे वश में कैसे हो गए !
अलंकार—प्रथम विभावना ।
सूचना—इस सवैये में 'भोरेहूँ ना चितयो' (भूलकर भी दृष्टिपात नहीं
किया) को लेकर शंका की जाती है कि नायिका ने जब श्रीकृष्ण की ओर देखा
ही नहीं तो उसमें स्वकीयत्व कहाँ रहा । पर 'त्यों' शब्द से नायिका का लक्ष्य
'घेरु' की अतिशयता की ओर है। इससे उक्त शंका का परिहार हो जाता है।
( ३५ ) अथ दक्षिण-लच्छन—(दोहा)
पहिले सो हिय हेतु डर, सहज बड़ाई कानि ।
चित्त चलैहूँ ना चलै, दच्छिन-लच्छन जानि । ७ ।
शब्दार्थ—पहिलो सो = पहले का सा ही । हेतु = प्रेम । सहज =
स्वाभाविक । कानि = मर्यादा ।
भावार्थ—दूसरी प्रेमिकाओं का प्रिय हो जाने पर भी जो पूर्व की प्रेमिका
से पहले का सा ही प्रेम करे और डरता रहे, स्वभाव से ही जिसमें बड़प्पन
की मर्यादा है और चित्त चलने पर भी जो अपने को संभालता है, वह
दक्षिण नायक है ।
( ३६ ) अथ प्रच्छन्न दक्षिण, यथा—(कबित्त)
हरि से हितू सों भ्रम भूलिहू न कीजै मान,
हातो कियें हियहूँ तें होति हित हानियै ।
लोक में अलोक आनि नीकेहूँ कों लागतु है,
सीताजू कों दूत-गोत कैसे उर आनियै ।
आँखिनि जो देखियति सोई साँची केसवदास,
काननि की सुनी साँची कबहुँ न मानियै ।
७—पहिलो सो-पहिली सों । बड़ाई-बढ़ाई । ८—भ्रम-भ्रमि । मान-
मन । कियें-करि । नीकेहूँ-नीके हौ; नीकहू । को लागतु-लगावत । गोत-
गोता । केसोदास-केसौराइ । को न-कहा ।
६६ रसिकप्रिया
गोकुल की कुलटा ये यौं हीं उलटावति हैं,
आजु लौं तौ वैसेई हैं कालि की न जानियै ।८।
शब्दार्थ—हातो कियें = दूर करने से । अलोक = निंदा, कलंक ।
नीकेहूँ = भले को भी । गीत = कथित वृत्तांत । दूत-गीत = (बहुव्रीहि) दूत
का कहा (धोबी ने सीताजी पर अपयश लगाया था जिसे ‘दुर्मुख’ नामक
दूत ने राम को सुनाया था) । कैसे उर आनियै = कैसे विश्वास किया जाय ।
कुलटा = व्यभिचारिणी । उलटावति हैं = उलटा-पलटा करती रहती हैं, कुछ
का कुछ कह देती हैं ।
भावार्थ—(अंतरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू श्रीकृष्ण सरीखे प्रेमी
के संबंध में भ्रम भूलकर भी मत कर । यदि तू उन्हें अपने हृदय से दूर करती
है तो भी प्रेम की हानि होती है । संसार में लोग भले को भी अपयश लगा
देते हैं । भला दूत ने सीताजी के संबंध में जो (कलंकवाली धोबी की) बात
कही थी उस पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ? जो आँखों से देखी जाय
उसी को सत्य मानना चाहिए । कान से सुनी (बात) को कभी सत्य न समझना
चाहिए । ये गोकुल की कुलटाएँ इसी प्रकार बातें पलट दिया करती हैं ।
आज तक तो कृष्ण पूर्ववत् ही (निरपराध) हैं, कल की कौन (राम) जाने ।
अलंकार—काव्यलिंग, दृष्टांत ।
( ३७ ) अथ प्रकाश दक्षिण, यथा—( सवैया )
चित चोप चितैबे की तैसियै है अरु तैसियै भाँति डरात घनै ।
अरु तैसोई कोमल बोल गुपाल के मोहत हैं तिहिं भाँति मनै ।
गुन तैसोई, हास-बिलास सबै हुते तैसोई केसव कौन गनै ।
सखि तू कहै आन बधू के अधीन हैं सो परतीक किधौं सपनै । ६ ।
शब्दार्थ—चोप = चाव, इच्छा । घनै = अत्यंत । मनै = मन को ।
हुते = थे । आन = ( अन्य ) दूसरी । बधू = स्त्री । परतीक = ( प्रत्यक् )
प्रत्यक्ष, वास्तव में । सपनै = स्वप्न अर्थात् झूठ ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति बहिरंग सखी से ) हे सखी, श्रीकृष्ण में
पहले ही जैसा मुझे देखने का चित्त में चाव है और वैसे ही वे मुझसे अब भी
अत्यंत डरा करते हैं । उनकी वाणी भी वैसी ही (पूर्ववत्) कोमल है और वे
वैसे ही मेरे मन को मोहते भी हैं । उनमें वैसे ही गुण अब भी हैं और वैसे
ही (पहले के से) सब हास-विलास भी वर्तमान हैं। इन सब (बातों) को
कौन गिनाए । इसलिए तू जो यह कह रही है कि वे अब दूसरी स्त्री के वश
में हो गए हैं, यह प्रत्यक्ष सत्य है अथवा स्वप्न (झूठ) है । ( मुझे विश्वास
१—परतीक-परतीत ।
द्वितीय प्रभाव ६७
नहीं होता कि श्रीकृष्ण ने किसी दूसरी स्त्री से प्रेम कर लिया है) ।
(३८) बहि-अंतर गूढ़-अगूढ़ निरंतर कामकला कुल कौन गनै ।
कहि केसव हास-बिलास सबै प्रतिद्यौस बढ़ें रसरीति सनै ।
जिनको जिय मेरेई जीव जियै सखि काय मनो बच प्रीति घनै ।
तिनकों कहैं आन बधू के अधीन हैं सो परतीक किधौं सपने ।१०।
शब्दार्थ—बहि = बहिः, बाहर । अंतर = भीतर ।
सूचना—सरदार इस सवैये को केशव का नहीं मानते ।
(३६) अथ शठ-लक्षण— (दोहा)
मुँह मीठी बातैं कहै, निपट कपट जिय जानि ।
जाहिन डरु अपराध को, सठ करि ताहि बखानि ।११।
शब्दार्थ—निपट = अत्यंत । जानि = जानो । सठ करि = 'शठ' नाम
से । बखानि = बखानो, कहो ।
(४०) अथ प्रच्छन्न शठ, यथा—(सवैया)
रुचि पंकज चंदन बंदन कंचन रंच न रोचनहू की बची ।
कहिये किहिं कारन को इते लायक का पर भामिनि भौंह नची ।
अनुमानत हौं अँखियाँ लखि लाल ये नाहिंनै राति के रोष रची ।
तन तेरे बियोग तप्यो तरुनी तिहिं मानहुँ मो हिय माँह तची ।१२।
शब्दार्थ—रुचि = छवि, शोभा । पंकज = ( यहाँ पर ) लाल कमल ।
चंदन = लाल चंदन । बंदन = सिंदूर । कंचन = सोना । रंच = थोड़ा ।
रोचन = रोली । कों इते लायक = इस योग्य कौन है, इसका पात्र कौन है ।
भामिनी = स्त्री (संबोधन में) । भौंह नची = भौंह चढ़ाई है । तची = तप्त हुई ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति मानिनी नायिका से ) तुम्हारे नेत्रों के
द्वारा लाल कमल, रक्त चंदन, सिंदूर, सोना और रोली की शोभा कुछ भी
बच न सकी ( उन्हीं की भाँति ये लाल हैं ) । इसका क्या कारण हैं ? कौन
इस ( क्रोध ) के योग्य है जिस पर तुमने भौंहें चढ़ाई हैं ? तुम्हारी लाल
आँखें देखकर अनुमान करता हूँ कि ये ( मेरी अनुपस्थिति के कारण ) रात
में किए गए रोष से लाल नहीं हैं । प्रत्युत मेरा शरीर ( रात में ) तुम्हारे
वियोग में तप रहा था इसी कारण मानो तुम्हारी आँखें मेरे हृदय ( की
वियोगाग्नि ) से तपकर लाल हो गई हैं । ( क्योंकि तुम मेरे हृदय में निवास
करती हो ) ।
अलंकार—सापह्नव हेतूत्प्रेक्षा ।
१०— तिनकों-तिनसौं । १२— रंचन-चंपक । बची-रची । अनुमानत-
नमडानत ।
६८ रसिकप्रिया
अथ प्रकाश शठ, यथा—( कवित्त )
(४१) काननि के रँगे रंग नैननि के डोलो संग,
नासा-अंग रसना के रसहीं समाने हौ ।
और गूढ़ कहा कहौँ मूढ़ हौ जू ? जानि जाहु,
प्रौढ़िरूढ़ केसवदास नीके करि जाने हौ ।
तन आन, मन आन, कपट-निधान कान्ह,
साँची कहौ मेरी आन काहे कौं डराने हौ ।
वे तो हैं बिकानी हाथ मेरें, हौं तिहारें हाथ,
तुम ब्रजनाथ हाथ कौन के बिकाने हौ ? ।१३।
शब्दार्थ—काननि के रँगे रंग = कानों के रंग में रँगे हुए हो अर्थात्
जिसकी प्रशंसा अपने कानों से सुनते हो उसी को देखने के लिए उतावले हो
जाते हो । नासा-अंग = नासिका के अंग में । नासा० = नासिका के अंग में या
रसना के रस में ही डूबे रहते हो । नासिका जिस नायिका की गंध की ओर
खींचती है उधर को जाते हो । जीभ जो कहने को कहती है वही कहते हो ।
गूढ़ = भेद की बात । प्रौढ़ि = ढिठाई । रूढ़ = विचार में दृढ़ । नीकें करि = भली
भाँति । आन = ( अन्य ) दूसरी बात । निधान = खजाना । आन = सौगंध,
कसम । हौं = मैं ।
भावार्थ— ( बहिरंग सखी की उक्ति नायक से ) तुम कानों के रंग में
रँगे हुए हो ( कान से जिसकी प्रशंसा सुन पाते हो उसी को देखने के लिए
उत्सुक हो जाते हो ) । तुम अपने नेत्रों के संग-संग घूमते फिरते हो ( नेत्र
जिसके रूप पर मुग्ध होते हैं, उसे देखने के लिए नेत्रों के इशारे पर घूमते
रहते हो ) । यही नहीं, नासिका जिस गंध की ओर ले जाती है उधर ही
जाते हो, जीभ जो कहलाती है वही कहते हो (नाक में जिस किसी की सुगंध
पहुँचती है, वाणी द्वारा उसी से बात करने के लिए उत्कंठित हो उठते हो)।
अधिक गूढ़ बातें और क्या कहूँ तुम नादान तो हो नहीं ( कि समझाने की
आवश्यकता पड़े, बस इतने से ही ) समझ लो कि तुम ढिठाई के रंग-ढंग में
निपुण हो और इसे लोग भली भाँति जानते भी हैं । तुम्हारे शरीर (मुख)
में कुछ और मन में कुछ (और बात) रहा करती है । कृष्ण, तुम बड़े कपटी
हो । तुमको मेरी सौगंध है, सच बताओ तुम क्यों डर रहे हो ? वे (नायिका)
तो मेरे हाथ बिकी हैं (मेरे वश में हैं) और मैं तुम्हारे हाथ बिकी हूँ (तुम्हारे
इच्छानुकूल कार्य करने को तत्पर रहती हूँ ) । पर यह तो बताओ कि हे
१३—काननि०-कान रंग रँगे नैन तिनही के डोलें संग । सयाने-सों
साने । प्रौढ़िरूढ़-प्रौढ़ि रूढ़ि ।