रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ रसिकप्रिया
भावार्थ - (नायिका की उक्ति सखी से) हे सखी, शीतल वायु को हटा,
चंद्रमा की चाँदनी को रोक, क्योंकि इसी प्रकार (के पदार्थों) से तो मेरा
हर्ष खोया जा रहा है (इनसे मुझे कष्ट हो रहा है)। फूलों को फेंक दे,
कपूर को झाड़ डाल, (घिसे) चंदन को (अन्यत्र) उड़ेल दे, क्योंकि इनसे
मेरे चित्त में चौगुनी पीड़ा होती है। मछली जल से रहित होकर अचेत होती
है तो जल पाने पर ही जी सकती है। उसके ऊपर दूध छिड़कने से उसे क्या
धैर्य होगा (वह जल छिड़कने से ही जीती है, दूध से नहीं)। (नायक से मेरा
वियोग हुआ है। अतः मैं उन्हीं को पाने पर जी सकती हूँ, इन उपचारों से
नहीं)। तूने मेरी इस पीड़ा का मर्म समझ भी पाया है या यों ही इसके लिए
उपचार कर रही है। (क्या तू नहीं जानती कि) आग का जला हुआ अंग
आग द्वारा (सेंकने से) ही ठंडा होता है। (इन उपचारों से मेरी व्याधि
दूर नहीं हो सकती, नायक के दर्शन होने पर ही इसका अंत होगा)।
अलंकार - व्याघात (शीतल उपचारों से विरहाग्नि के भड़कने से)।
(२६) श्रीकृष्ण को वियोग-श्रृंगार, यथा-( सवैया )
केसव रूठि रहा। तुम्हीं सों किधौं भय काहू के भीत भयो है।
बेच्यो है काहू के हाथनि नाथ किधौं तुम काहू के साथ दयो है।
मेरी सौं मा सहुँ भानहु बेगि इहाँ मनु नाहिं कँहाँ पठयो है।
साँची कहौ हरि हारयो है काहू सों काहू हरयो कि हिराइ गयो है।२६।
शब्दार्थ - सहुँ = से। भानहु = कहो। हिराइ० = खो गया है।
(२७) श्रीकृष्ण को प्रकाश-वियोग-श्रृंगार, यथा-( सवैया )
बात कहैं न सुनै कछु काहू त्यों हेरैं नहीं कोउ कैसेहूँ हेरो।
खाइँ कछू न पियैं कछु केसौ छुवै न कछू कर कोंरो करेरों।
हूलि उठी ब्रज बैठी कहा उठि आवहु देखि कह्यो करि मेरो।
जानै को माइ कहा भयो कान्ह कों जोग-सँजोग बियोग कि तेरो।२७।
शब्दार्थ - कोंरो = कोमल। करेरो = कठोर। जोग० योग की किसी
क्रिया का प्रभाव।
सूचना - संख्या २६-२७ नवलकिशोर प्रेस की प्रति में नहीं हैं।
(२८) (दोहा)
यों परछन्न प्रकास बिधि, बरने जोग बियोग।
अब नायक-लच्छन कहौं, गूढ़ अगूढ़ प्रयोग ॥२८॥
२८-बिधि-सब।