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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 286 में से

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पृष्ठ 63

द्वितीय प्रभाव ५२
शब्दार्थ—जोग = संयोग । गूढ़=असाधारण । अगूढ़=साधारण, सामान्य ।
इति श्रीमन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायाँ
रसिकप्रियायाँ प्रच्छन्नप्रकाशसंयोग-
वियोग वर्णनं नाम प्रथमः
प्रभावः । १ ।
द्वितीय प्रभाव
( २६ ) अथ साधारण-नायक लक्षण—( दोहा )
अभिमानी त्यागी तरुन, कोककलानि प्रबीन ।
भव्य छमी सुंदर धनी, सुचिरुचि सदा कुलीन ।१।
शब्दार्थ—तरुन = युवा । कोककलानि प्रवीन = कामशास्त्र में पंडित ।
भव्य = रूपवान् । छमी=क्षमाशील । सुचिरुचि=पवित्र रुचि (इच्छा) वाला ।
( ३० ) ये गुन केसव जासु में, सोई नायक जानि ।
अनुकुल दछ सठ धृष्ट पुनि, चौबिधि ताहि बखानि ।२।
शब्दार्थ—अनुकुल = अनुकूल । दछ = ( दक्ष ) दक्षिण । चौविधि =
चार प्रकार के ( अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट ) ।
( ३१ ) अथ अनुकूल-लक्षण—( दोहा )
प्रीति करै निज नारि सों, परनारी-प्रतिकूल ।
केसव मन-बच-कर्म करि, सो कहिये अनुकूल ।३।
( ३२ ) अथ प्रच्छन्न-अनुकूल, यथा—( सवैया )
और के हास-विलास न भावत साधुनि को यह सिद्ध सुभावै ।
बात वहै जु सदा निबहै हरि, कोऊ कहूँ कछु सोधु न पावै ।
आसन बास सुबासन भूषन केसव क्योंहूँ यहौ बनि आवै ।
मो बिन पान न खात जु कान्ह सु बैरु किधौं यह प्रीति कहावै ।४।
शब्दार्थ—और = ( अपर ) अन्य । हास-विलास = हंसी-विनोद । साधु =
सज्जन । सिद्ध सुभावै = निश्चित प्रकृति ही है । सोधु = पता । बास = वस्त्र ।
सुबास = सुगंध । भूषन = गहना ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति नायक प्रति ) आपको जो ( मेरा हास-
विलास छोड़कर) किसी दूसरे का हास-विलास नहीं अच्छा लगता, वह सज्जनों
का निश्चित स्वभाव ही है । किंतु हे हरि, बात वही करनी चाहिए जिसका सदा
१—कोक-केलि । २—जासु-जाहि । अनुकुल-अतुलदक्ष । ३—नारी-
नारिनि । ४—जु-सु ।