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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

प्रथम प्रभाव ५७
अथ कविवर्णन—( दोहा )
(३) नदी बेतवै-तीर जहाँ, तीरथ तुंगारन्य ।
नगर ओछड़ो बहु बसै, धरनीतल में धन्य । ३ ।
शब्दार्थ —तुंगारन्य = ( तुंगारण्य ) ओछड़े के चारों ओर का जंगल ।
बहु बसै = घना बसा हुआ ।
(४ आश्रम चारि बसै जहाँ, चारि बर्न सुभ कर्म ।
जप तप विद्या वेद-बिधि, सबै बढ़े धन धर्म । ४ ।
(५) दिनप्रति जहाँ दूनो लहै, जहाँ दया अरु दान ।
एक तहाँ केसव सुकबि, जानत सकल जहान । ५ ।
(६) अपने अपने धर्म तहँ, सबै सदा सुखकारि ।
जासों देस बिदेस के, रहे सबै नृप हारि । ६ ।
(७) रच्यो बिरंचि बिचारि तहँ, नृपमनि मधुकरसाहि ।
गहरवार कासीस-रबि, कुलमंडन जसु जाहि । ७ ।
(८) ताको पुत्र प्रसिद्ध महिमंडन दूलहराम ।
इंद्रजीत ताको अनुज, सकल धर्म को धाम । ८ ।
(६) दीन्ही ताहि नृसिंहजू, तन मंन रन जयसिद्धि ।
हित करि लच्छन-राम ज्यों, भई राज की वृद्धि । ६ ।
(१०) तिन कबि केसवदास सों, कीन्हों धर्मसनेहु ।
सब सुख दैकरि यों कह्यो, रसिकप्रिया करि देहु ।१०।
शब्दार्थ—धर्मसनेहु कीन्हों = धर्म का स्नेह किया अर्थात् गुरु बनाकर
दीक्षा ग्रहण की ।
(११) संबत सोरह सै बरष, बीते अठतालीस ।
कातिग सुदि तिथि सप्तमी, बार बरनि रजनीस ।११।
शब्दार्थ—बरनि = बरनो, कहो ।
भावार्थ- संवत् १६४८ कार्तिक शुक्ला सप्तमी सोमवार के दिन केशव
ने 'रसिकप्रिया' का आरंभ किया ।
(१२) अति रति-गति मति एक करि, विविध-बिबेक-विलास ।
रसिकन कों रसिकप्रिया, कीनी केशवदास ।१२।
शब्दार्थ —रति-गति एक करि = अपनी प्रीति को सब ओर से खींचकर ।
मति एक करि = बुद्धि को एकाग्र करके ।
भावार्थ—अन्य शास्त्रों से अपनी प्रीति को खींचकर और बुद्धि को
६—तहँ-तें । ६—राज की-राजसी । १०—कीन्हों०-कियो धर्म सों
नेहु । ११—गति०-मति गति ।