सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

प्रथम प्रभाव ५६.
(२०) अथ प्रच्छन्न-संयोग-शृंगार, यथा—( सवैया )
बन में वृषभानुकुमारि मुरारि रमे रुचि सों रसरूप पियें ।
कल कूजत पूजत कामकला बिपरीत रची रति केलि कियें ।
मनि सोभित स्याम जराइ जरी अति चौकी चलै चल चारु हियें।
मखतूल के मूल झुलावत केसव भानु मनो सनि अंक लियें ॥२०॥
शब्दार्थ—मुरारि = कृष्ण । रसरूप पियें = सौंदर्यरस का पान किए
हुए । कल = सुंदर । कूजत = बोलते हैं । पूजत = पूर्ण करते हैं। काम-कला =
शृंगारिक चेष्टाएँ । विपरीत रति = नायक नायिका की उलटी काम-क्रीड़ा ।
केलि कियें = काम क्रीड़ा करते हुए । मनि = माणिक, लाल रत्न । स्याम =
नीलम । जराइ जरी = पच्चीकारी की हुई । चौकी = गले में पहनने का एक
गहना, उरबसी, पदक । चारु = सुंदर । हियें = वक्षःस्थल पर । मखतूल =
काला रेशम । भानु = सूर्य । अंक = गोद ।
भावार्थ—( नायिका की अंतरंग सखी नायक की अंतरंग सखी से कहती
है ) वन में श्रीराधिका और कृष्ण सौंदर्यरस का पान किए हुए रुचिपूर्वक
रमण करने लगे, वे काम की कला को पूर्ण करनेवाले सुंदर शब्दयुक्त
कामक्रीड़ा करते हुए विपरीत रति में संलग्न हुए । ( उस समय राधिका जी
के झूमने से उनके ) गले में पड़ी हुई माणिक में नीलम से जटित अत्यंत
सुंदर और चंचल चौकी का हिलना ऐसा प्रतीत होता हैं मानो सूर्य शनि को
अपनी गोद में लिए हुए काले रेशम के झूले में झुला रहा है (यहाँ पर
माणिक की बनी चौकी भानु और नीलम शनैश्चर है । जिसमें चौकी पिरोई
हुई है वह काले रेशम का धागा झूले की डोर है ) ।
अलंकार—उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा ।
सूचना—सूरति मिश्र और उनके अनुगमन पर सरदार कवि ने इस सवैये
पर कई शंकाएँ उठाई हैं, यथा—'शृंगार में मुरारि नाम, विपरीत रति में सूर्य
और शनि ( पिता-पुत्र ) की उत्प्रेक्षा आदि । उन्होंने इनका अपने ढंग से
समाधान भी किया है ।
(२१) अथ प्रकाश-संयोग औ प्रकाश-वियोग-लक्षण--( दोहा )
सो प्रकास संजोग अरु, कहैं प्रकास बियोग ।
अपने अपने चित्त में, जानैं सिगरे लोग ॥२१॥
भावार्थ—जिस संयोग और वियोग शृंगार को अंतरंग-बहिरंग सखी-
सखा आदि सब जानें उसे प्रकाश संयोग और प्रकाश वियोग कहते हैं ।
२०—किये-हिए । सोहत-सोभित ।