रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ रसिकप्रिया
अत्यंत एकाग्र करके केशवदास ने विवेकपूर्वक अनेक रीतियों से रसिकों के
लिए 'रसिकप्रिया' की रचना की ।
(१३) ज्यों बिनु दीठि न सोभिजै, लोचन लोल बिसाल ।
त्यों ही केसव सकल कबि, बिन बानी न रसाल ॥१३॥
भावार्थ—जिस प्रकार दृष्टि के बिना बड़े और चंचल नेत्र भी शोभित
नहीं होते उसी प्रकार रसिक कवि भी बिना वाणी के शोभा नहीं पाते ।
अलंकार—उपमा ।
(१४) तातें रुचि सों सोचि पचि कीजै सरस कबित्त ।
केसव स्याम सुजान को, सुनत होइ बस चित्त ॥१४॥
भावार्थ—इसलिए रुचि से सोच विचार कर सरस श्रीकृष्णविषयक
कविता करनी चाहिए, जिसे सुनकर सबका चित्त वशीभूत हो जाय ।
अथ नवरसवर्णन—(दोहा)
(१५) प्रथम सिँगार सुहास्य रस, करुना रुद्र सु बीर ।
भय बीभत्स बखानिये, अद्भुत सांत सुधीर ॥१५॥
(१६) नवहू रस के भाव बहु, तिनके भिन्न विचार ।
सबको केसवदास हरि, नायक है सृंगार ॥१६॥
अथ श्रृंगारसलक्षण—(दोहा)
(१७) रति-मति की अति चातुरी, रतिपति-मंत्र विचार ।
ताही सों सब कहत हैं, कबि कोविद् श्रृंगार ॥१७॥
शब्दार्थ—रति = प्रीति । रतिपति = कामदेव । कोविद = पंडित ।
भावार्थ—जहाँ रति (प्रीति) संयुक्त बुद्धि की अत्यंत चतुरता और काम
(कला) के विचार का वर्णन रहता है उसे कवि और पंडित लोग श्रृंगार कहते हैं।
अथ श्रृंगार के भेद—( दोहा )
(१८) सुभ संजोग बियोग पुनि द्वै सिंगार की जाति ।
पुनि प्रच्छन्न प्रकाश करि, दोऊ द्वै द्वै भाँति ॥१८॥
अथ प्रच्छन्न-संयोग-शृंगार-लक्षण—(दोहा)
(१९) सो प्रच्छन्न संजोग अरु, कहैं बियोग प्रमान ।
जानें पीउ प्रिया कि सखि, होइ जु तिनहिं समान ॥१६॥
भावार्थ—प्रच्छन्न संयोग और वियोग शृंगार वह है जिसे नायक-नायिक ।
या उन्हीं के समान सखी ही जानें ।
१३—सोभिजै—सोभिये । १४—सों-सुचि । १८—द्वै सिंगार-दोउ
सिंगार । १६—प्रिया-पिया । होइ होहि ।