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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 286 में से

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पृष्ठ 60

६० रसिकप्रिया
(२२) प्रकाश संयोग यथा—( सवैया )
केसव एक समै हरि-राधिका आसन एक लसैं रँगभीनें।
आनँद सों सिंद-आनन की दुति देखत दर्पन में दृग दीनें।
भाल के लाल में बाल बिलोकितहीं भरि लाल न लोचन लीनें।
सासन पीय सबासन सीय हुतासन में मनो आसन कीनें।२२।
शब्दार्थ—रँगभीने = प्रेम से युक्त। लाल = माणिक। बाल = (बाला)
नायिका (राधिका)। लालन = नायक (श्रीकृष्ण)। सासन = आज्ञा। पीय =
प्रिय (रामचंद्र)। सबासन = वस्त्रों सहित (कपड़े पहने हुए)। हुतासन = अग्नि।
भावार्थ—(बहिरंग सखी की उक्ति बहिरंग सखी से) हे सखी, एक
बार श्रीकृष्ण और राधिका प्रेमपूर्वक एक ही आसन पर विराजमान थे और
श्रीकृष्ण दर्पण में आनंदसहित राधिका के मुख की छवि टकटकी लगाकर
देख रहे थे। (दर्पण में राधिका का प्रतिबिंब पड़ रहा था। उस प्रतिबिंब में
राधिका के भाल की लाल टिकुली में उनका-राधिका का-पुनः प्रतिबिंब
पड़ रहा था।) उस भाल पर की बेंदी के माणिक में पड़नेवाले राधिका के
प्रतिबिंब को देखकर तुरंत श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रों में आँसू भर लिए।
(श्रीकृष्ण को अपने रामावतार के उस समय की सुध आ गई जब पति की
आज्ञा से सीता ने अग्निप्रवेश किया था।) मानो अपने पति रामचंद्र की
आज्ञा से सीता ने (अग्निपरीक्षा के लिए) सवस्त्र अग्नि में प्रवेश किया हो।
अलंकार—स्मरण और उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा का अंगांगिभाव संकर।
(२३) अथ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्नवियोग श्रृंगार, यथा (सवैया)
कीट ज्यों काटत काननि कान्ह सों मानहूँ में कहि आवत ऊनो।
ताहि चलैं सुनिकै चुप ह्वै रहे नीकहिं केसव एक न दूनो।
नेक अटें पट फूटति आँखि सु देखति हैं कब कों व्रज सूनो।
काहे कों काहू को कीजै परेखो'ब जीजै री जीव की नाक दै चूनो।२३।
शब्दार्थ—कहि आवत = कहा जाता था, कहते थे। ऊनो = बुरा।
नीकहिं = भली भाँति। नेक = थोड़ा, थोड़ी देर के लिए। अटें पट = परदा
पड़ जाने पर, घूँघट पड़ जाने पर। परेखो = परीक्षा। नाक चूनो दै जीजै =
नाक में चूना लगाकर जीती हैं, बदनामी सहती हुई बेहयाई के साथ जी रही हैं।
भावार्थ—(नायिका का वचन सखी से) श्रीकृष्ण पहले मान में भी बुरी
बात (बाहर चले जाने की बात) कहते थे तो वह जिन कानों को कीड़े के
२२—दर्पन में-दर्पन त्यों। बिलोकि०-बिलोकति ही। मनो-जनु।
२३—कांटत-काट त्यों। कान्ह-कान। मानहूँ-मानहि। नीकहिं-नीके
हीं। एक-एकहि। पट-पर। जीजै-जीजिए, जीय के।