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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 286 में से

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पृष्ठ 56

५६ रसिकप्रिया
सूचना—( १ ) 'जय' के प्रयोग से यह आशीर्वादात्मक मंगल है।
( २ ) सरदार कवि ने अपनी टीका में इसका अर्थ प्रणव और श्रीकृष्ण पर
भी घटाया है। (३) सूरति मिश्र ने 'रसग्राहकचंद्रिका' नाम्नी अपनी टीका में
'मदनकदन' को शृंगार में अप्रयुक्त प्रयोग मानकर इसका अर्थ 'धतूरा
खानेवाला' किया है। फिर यह शंका उठाकर कि धतूरे के अनेक पर्यायवाचक
शब्दों के होते हुए 'मदन' ही क्यों रखा गया, 'मदन' का अर्थ 'मद नहीं'
और 'कदन' का अर्थ सृष्टिसंहारकर्ता रुद्र ग्रहण किया है। इसी प्रकार के
अनेक प्रश्नोत्तर हैं। ( ४ ) 'जगनायक' का अर्थ 'त्रिदेव' करने में महादेव भी
आते हैं। महादेव गणेश के पिता हैं। ये उनके भी नायक कहे जाएँ तो
अनुचित है, ऐसा नहीं समझना चाहिए—'सुर अनादि जिय जानि।'
( २ ) श्रीकृष्णवंदना—( छप्पय ) .
श्रीबृषभानुकुमारिहेत शृंगाररूप भय।
बास हासरस हरे मातुबंधन करुनामय।
केसी प्रति अति रौद्र बीर मारो बत्सासुर।
भय दावानलपान पियो बीभत्स बकी उर।
अति अद्भुत बंचि बिरंचिमति, सांत संततै सोच चित।
कहि केसब सेवहु रसिकजन, नवरसमय ब्रजराज नित। २।
शब्दार्थ—श्रीवृषभानुकुमारि = श्रीराधिका। हेत = ( हेतु ) लिए।
भय = ( भए ) हुए। बास हरे = गोपियों के वस्त्र हरण किए। मातुबंधन =
कंस के कारागार में माता देवकी का बंधन। केसी = केशी राक्षस। बत्सासुर =
एक राक्षस। दावानलपान = एकबार श्रीकृष्ण दवाग्नि पी गए थे। बकी =
पूतना ( बकासुर की बहन )। उर पियो = स्तनपान किया। बंचि = ठगकर।
विरंचिमति = ब्रह्मा की बुद्धि। संततै = निरंतर ही। ब्रजराज = श्रीकृष्ण।
भावार्थ—जो श्रीकृष्ण श्रीराधिका के लिए शृंगाररस-रूप हुए, गोपि-
काओं के चीरहरण में हास्यरस-रूप बने, माता देवकी का कारावास में कष्ट
देखकर करुणरस-रूप हुए, केशी के प्रति क्रोध करके रौद्ररस-रूप दिखाई पड़े,
वत्सासुर के मारने में वीररस-मय हुए, दावाग्नि का पान करके भयानकरस-
युक्त हुए, पूतना का स्तनपान करके बीभत्सरस-मय दिखाई दिए, ब्रह्मा की
बुद्धि को छलने में अद्भुतरस-युक्त प्रतीत हुए तथा अर्जुन का मोह देखकर
चिंतित चित्त हो जाने के कारण शांतरस-मय लक्षित हुए, उन नवरसमय
ब्रजराज की सेवा रसिकजन नित्य करें।
अलंकार—उल्लेख और तृतीय विशेष का संदेह-संकर तथा रत्नावली
( क्रम से रसों का नाम आने के कारण ) ।
*—संततै-सांत से।