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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 286 में से

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पृष्ठ 61

प्रथम प्रभाव ६१
काटने की तरह (दुःखदायिनी) लगती थी । (आज) उन्हीं के चले जाने पर
(उनके चले जाने की बात) सुनकर भी (वे ही कान) एक नहीं, दोनों के
दोनों, भली भाँति चुप हो गए हैं । (शांत हैं, ऐसा समाचार सुनकर कट नहीं
गए) पहले श्रीकृष्ण के देखने में थोड़ी देर के लिए भी परदा पड़ जाने पर,
घूँघट की आड़ में होने पर जो आँखें फूटने लगती थीं आज वे ही आँखें न
जाने कब से ब्रज को (श्रीकृष्ण से) सूना देख रही हैं (और फूटती नहीं हैं)।
किसी (अर्थात् अपने अंगों) की क्या परीक्षा ली जाय, अब तो अपने प्राणों
को बेहयाई का टीका लगाकर जी रही हैं।
(२४) अथ राधिका की प्रकाश वियोग शृंगार यथा- (सवैया)
जिनके मुख की दुति देखत हीं निस-बासर केसव दीठि अटी।
पुनि प्रेम बढ़ावन की बतियाँ तजि आन कछू रसना न रटी।
जिनके पद पानि उरोज सरोज हिये धरिकै पल नैन घटी।
तिनके संग छूटतहीं फटु रे हिय तोहिं कहा न दरार फटी ।२४।
सूचना- यह छंद प्राचीनतम हस्तलिखित प्रतियों और लीथो वाली
प्रति में नहीं है। सरदार कवि ने इस पर टीका नहीं लिखी है। नारायण
कवि ने तो इसे 'केशव' का छंद ही नहीं माना है।
(२५) अथ श्रीराधिकाजू को प्रकाश-वियोग-शृंगार, यथा- (कवित्त)
सीतल समीर टारि चंद्रचंद्रिका निवारि,
केसौदास ऐसे ही तो हरषु हिरातु है।
फूलन फैलाइ डारि झारि डारि घनसारु,
चंदन कौं ढारि चित्त चौगुनो पिरातु है।
नीरहीन मीन मुरझाइ जीवै नीर ही तें,
छीर छिरके तें कहा धीरजु घिरातु है।
पाई है तैं पीर कैधौं यों ही उपचारु करै,
आगि को तौ डाढ्यो आँगु आगिहीं सिरातु है ॥२५॥
शब्दार्थ-टारि = हटा दे । चंद्रचंद्रिका = चंद्रमा की चाँदनी । निवारि =
रोक दे । हरषु हिरातु है = हर्ष खोया जा रहा है । घनसा = कपूर ।
मीन = मछली । छीर० = दूध के छिड़कने से । घिरातु है = (धैर्य) धरा जा
सकता है । पाई है तैं पीर = क्या तूने मेरी पीड़ा का मर्म समझा है (अर्थात्
मेरी इस पीड़ा का क्या कारण है ?) । यों ही = व्यर्थ । उपचारु = उपाय
(रोग-शांति के लिए औषध करना) । डाढ्यो = जला हुआ । सिरातु है, ।
ठंडा हो जाता है ।
२५-डारि-डारे । ढारि-टारु । मुरझाइ-मुरझाति । तें-पै । छिरके तें-
के छिरीके । डाढ्यो-दाध्या । आँगु-अंग ।