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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

१५२ रसिकप्रिया
सूचना—(१) प्रेम का रंग लाल होता है और रोष का भी रंग
लाल होता है।
(२) इस छंद के अनेक शंका-समाधान टीकाकारों ने किए हैं।
अथ प्रोषितपतिका-लक्षण—(दोहा)
(२५६) जाको प्रीतम दै अवधि, गयो कौनहूँ काज।
ताकौं प्रोषितप्रेयसी, कहि बरनत कबिराज ।१६।
प्रच्छन्न प्रोषितपतिका—यथा, (सवैया)
(२५७) केसव कैसेहूँ पूरब पुन्य मिल्यो मनभावतो भाग भरयो री ।
जानै को माई कहा भयो क्यौंहूँ जु औधि को अधिक द्योस टरचोरी।
ताकहूँ तूं न अजौं हँसि बोलै जऊ मेरो मोहन पाइ परयो री।
काठहु तै हठ तेरो कठोर इतैं बिरहानलहूँ न जरयो री ।२०।
शब्दार्थ—मनभावती = मनचहेता (नायक) । भाग भरयो = भाग्यवती
हुई। माई = हे माई, आश्चर्यबोधक। अधिक = आधा। द्योस = दिवस, दिन।
टरचो री = टल गया, बीत गया। अजौं = अब भी। इतैं = इतने तीव्र ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) हे सखी, न जाने क्या कारण
हुआ कि अवधि से केवल आधा दिन ही किसी प्रकार अधिक व्यतीत हो गया
और श्रीकृष्ण प्रतिज्ञानुसार समय पर नहीं पहुँच सके। इतने थोड़े समय के
विलंब के लिए तू अब भी उनसे हँसकर नहीं बोल रही है, यद्यपि वे तेरे पैरों
पड़ रहे हैं। यह नहीं समझती कि न जाने किस पूर्वजन्म के पुण्य से प्रिय से
भेंट हुई है, भाग्योदय का समय आया है। इसलिए मेरी दृष्टि में निश्चय ही
तेरा हठ काठ से भी कड़ा है। क्योंकि उनके वियोग की विरहाग्नि में भी
वह न जल सका ( तो अब क्या आशा की जाय, अब भी तो तू अपना हठ
नहीं छोड़ती )।
प्रकाश प्रोषितपतिका, यथा—(सवैया)
(२५८) औधि दै आए उहाँ उनसों यह भोजन कै अब ही हम ऐहैं।
ताकहँ तौ अब लौं बहराइके राखी बरघाइ मरु करि मैं हैं।
बैठे कहा इनके ढिग केसव जाउ नहीं कोउ आइ जु कैहैं।
जानत हौ उन आँखिनि तें अँसुवा उमहैं बहुरयो पुनि रहैं ।२१।
शब्दार्थ—उनसों = उस नायिका को। अब ही = अभी। ऐहैं = आएँगे।
अब लौं = अब तक। बहराइकै = भुलावा दे करके। बरघाइ = बलात् । मरु
१६—प्रोषितपतिका-प्रोषित प्रेयसी । २०— क्यौंहूँ जु-कैसेहूँ, कान्ह को ।
अधिक-आधो कु । टरचो-ढरचो । बोलै०-बोलति मेरो ज्यौं । हूँ न-
दूनो । २१—आए-आपु । उनसों-उनको । यह-यहाँ । बरघाइ-स्ववाह, बराइ ।
मरु०-बरु कहि । इनके-इनकी । जाप-जाउ । उन-इन । उमहै-उमड्यो ।

करि = अत्यंत कठिनाई से । कहा = क्यों । इनके = इस नायिका के । ढिग =
पास । कहैं = कहिहैं, कह देंगे । जाउ ० = जाते क्यों नहीं, कोई जाकर यदि ये
समाचार (उस नायिका को जिससे भोजन करके आने की कह आए हैं) सुना
आए तो । उमहे = उमड़ने पर । बहुरयो = तदनंतर । रैहैं = रहिहैं, रहेंगे,
रुकेंगे । पुनि रैहैं = क्या फिर रोके रुक सकेंगे ?
अथ विप्रलब्धा-लक्षण--( दोहा )
(२५६) दूती सों संकेत कहि लैन पठाई आप ।
लब्धविप्र सो जानियै, अनआए संताप ।२२।
शब्दार्थ-लैन पठाई = बुलाने के लिए भेज दी ।
प्रच्छन्न विप्रलब्धा, यथा--( सवैया )
(२६०) सूल से फूल सुबास कुबास सी भाकसी से भए भौन सभागे ।
केसव बाग महावन सो जुर सी चढ़ी जोन्ह सबै अँग दागे ।
नेह लग्यो उर नाहर सो निसि नाह घरीक कहूँ अनुरागे ।
गारी सो गीत बिरी बिष सी सिगरेई सिंगार अँगार से लागे ।२३।
शब्दार्थ--सूल = ( सं० शूल ) काँटा । कुबास = दुर्गंध । भाकसी =
(भस्त्रा) भाड़, भरसांई । भौन = महल । सभागे = अच्छे, मनभावने । बाग =
बगीचा, उपवन । महावन = घोर जंगल सा भयावना । जुर सी = ज्वर की
भाँति । जोन्ह = (ज्योत्स्ना) चाँदनी । दागे = जलाए । नाहर = सिंह ( की
भाँति त्रासद ) । निसि = रात्रि में । नाह = नाथ ( पति ) । घरीक = घड़ी
भर । निसि नाह = रात्रि में घड़ी भर के लिए अपने पति के कहीं अन्यत्र रम
जाने के कारण । गारी से = गाली की भाँति अप्रिय । बिरी = पान का बीड़ा ।
प्रकाश विप्रलब्धा, यथा--( कबित्त )
(२६१) देखत उद्घिजात देखि देखि निज गात,
चंपक के पात कछू लिख्यो है बनाइकै ।
सकल सुगंध टारि फूल-माल तोरि डारि,
दूतिका कों मारि पुनि बीरी बगराइकै ।
लै लै दीह साँस तजि बिबिध बिलास हास,
केसौदास ह्वै उदास चली अकुलाइकै ।
सेइकै संकेत सूनो कान्हजू सों बोलि ऊनो,
मोसों कर जोरि दूनो दूनो दुख पाइकै ।२४।
२२--कहि--बदि, करि । लब्ध--लब्धा । सो--सु । जानियै--जानिजै ।
२३--सभाग--सुभागे । गारी सो--गारी से । २४--टारि--ढारि । बीरी--बोरा ।
हास--ग्रास । बोलि--मान । कर०--जोरे कर, करचो जोर, करि जोसो । दूनो--
बोली दूनों ।

१५४ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—उदधिजात = चंद्रमा । गात = गात्र, शरीर । पता = पत्ता,
पंखुड़ी । बनाइ कै = भली-भाँति मन लगाकर । टारि = हटाकर, दूर करके ।
मारि = पीटकर । बगराइ कै = बिखेरकर, फैलाकर । दीह = दीर्घ । बिलास =
प्रसन्नता की चेष्टाएँ । सेइकै = अर्थात् वहाँ रहकर । ऊनो = उदास भाव की
बातें । दूनो = दोनो ही । दूनो = दूना, अत्यधिक ।
सूचना—इस कवित्त के प्रथम चरण के लेख के बारे में अनेक अटकलें
लगाई गई हैं । सरदार ने बड़ा लंबा चौड़ा वाग्विस्तार किया है । सीधी बात
इतनी ही है कि चंद्रमा को देखकर उसके शरीर में जो कामोद्दीपन हो रहा
था उसी के लिए उसने चंपकदल पर राहु का चित्र अंकित किया, जिससे
उसका तेज मंद पड़े । चंपकदल चुनने का कारण यह है कि उसके शरीर के
रंग से उसका साम्य है ।
अथ अभिसारिका-लक्षण—( दोहा )
(२६२) हित तें कै मद मदन तें, पिय पै मिलै जु जाइ ।
सो कहियै अभिसारिका, बरनी त्रिविध बनाइ ।२५।
शब्दार्थ—हित तें = प्रेम से (प्रेमाभिसारिका) । मद तें = गर्व से (गर्वा-
भिसारिका ) । मदन तें = काम से ( कामाभिसारिका ) ।
अथ स्वकीया अभिसारिका-लक्षण—( दोहा )
(२६३) अति सलज्ज पग मग धरै, वलत बधून के संग ।
स्वक्रिया को अभिसार यह, भूषन भूषित अंग ।२६।
सूचना—निम्नलिखित चार दोहे हस्तलिखित प्रति में नहीं हैं। सरदार
ने इन्हें अन्य का माना है--
परकीया अभिसारिका, यथा—( दोहा )
जनी सहेली सोभही, बंधूबधू सँग चार ।
मग में देइ बराइ डग, लज्जा को अभिसार ॥
सामान्या को अभिसार, यथा—( दोहा )
चकित चित्त साहस सहित, नीलवसनजुत गात ।
कुलटा संध्या अभिसरै, उत्सव तम अधिरात ॥
चहूँ ओर चितवै हँसै, चित चोरै सबिलास ।
अंगराग-रंजित नितहि, भूषन-भूषित भास ॥
कुसुम कंजु कर मंदगति, सखी-संग मग चार ।
सखी सहेली साथ बहु, बरनि नारि-अभिसार ॥
२५—पै-सों, को । २६—सलज्ज-सुलज्ज । पग०-पग डग धरै, डगमग
धरी, डगमग धरै । चलत-धरति । बधून-वधू । स्वक्रिया-स्वीया । यह-वह,
इह ।

सप्तम प्रभाव १५५
प्रच्छन्न प्रेमाभिसारिका, यथा—(कबित्त)
(२६४) लीनो हम मोल अनबोलें आई जान्यो मोह,
मोहिं घनस्याम घनमाला बोलि लाई है ।
देख्यो ह्वैहै दुख जहाँ देहऊ न देखी परै,
देखी कैसे बाट केसौ दामिनी दिखाई है ।
ऊँचे नीचे बीच-कीच कंटकनि परे पग,
साहस गयंद गति अति सुखदाई है ।
भारी भयकारी निसि निपट अकेली तुम,
नाहीं प्राननाथ साथ प्रेम जु सहाई है ।२७।
शब्दार्थ—हम = हमको । अनबोलें = बिना बुलाए । घनस्याम = हे
कृष्ण । घनमाला = काले बादलों का समूह । बोलि = बुलाकर । वाट = मार्ग ।
साहस = हिम्मत । गयंद = हाथी । गति = चाल । सहाई = सहायक ।
भावार्थ—(नायक और नायिका का संवाद ) ( नायक )—तुमने तो
मुझे मोल ही ले लिया है ? क्योंकि बिना बुलाए ही आईं । तुम्हारा प्रेम
मैंने जान लिया ।
(नायिका )—हे घनश्याम, मुझे तो काले बादलों की पंक्ति बुलाकर
लाई है ।
(नायक)—तब तो तुमने दुख देखा होगा (तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ होगा) ।
(नायिका )—जहाँ (जिस अँधेरी रात्रि में ) शरीर भी दिखाई नहीं
देता, वहाँ दुख क्या दिखाई देगा ।
( नायक )—तो फिर उसमें तुमने रास्ता कैसे देखा ?
( नायिका )—मार्ग तो बिजली ( के प्रकाश ) ने दिखा दिया ।
( नायक )—फिर भी चढ़ाव, उतार, कीचड़ और काँटों पर पैर पड़े होंगे
जिससे कष्ट मिला होगा ।
(नायिका )—साहस रूपी हाथी की सुखदायी चाल से आई हूँ ( कष्ट
मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता ) ।
(नायक)—महा भयंकर (डरावनी) रात्रि में भला तुम अकेली कैसे आईं ।
(नायिका )—हे प्राणनाथ, साथ में आपका प्रेम मेरा सहायक जो था ।
प्रकाश प्रेमाभिसारिका, यथा—(कबित्त )
(२६५) नैननि की अतुराई बैननि की चतुराई,
गात की गुराई न दुरति दुति चाल की ।
२७—लीनो-लीने । हम-हमै । आई-आए । मोह-माहि, नेह । लाई-
ल्याई । देखी कैसे-दीखी कैसे । परे-पीड़े । गति०-की सी गति सुखदाई ।
भयकारो-यह कारी । जु-जो ।

१५६ रसिकप्रिया

आपने चरित्रनि के चित्रत विचित्र चित्र,
चित्रिनी ज्यों सोहै साथ पुत्रिका गुवाल की।
चंद्र के समान चारु चाय सों चढ़ाएँ फिरै,
करिकै तिहारे मृगनैननि की पालकी।
कीजै पयपान अरु रखै पान प्रानप्यारे,
आई है जु आई अलबेली ग्वालि काल की।२८।

शब्दार्थ—अतुराई = आतुरता, तत्परता। न दुरति = छिपती नहीं।
द्युति = द्युति। चित्रत = बनाती हैं। पुत्रिका = पुत्री। गुवाल = ग्वाला।
चारु = सुंदर। चाय = प्रेम। पयपान = जलपान। काल की = कलवाली,
जिसकी चर्चा कल मैंने की थी, या आपने जिसे कल देखा था।

प्रच्छन्न गर्वाभिसारिका, यथा—( सवैया )
(२६६) लाड़िली लीली कलोरी लुरी कहँ लाल लुके कहँ अँग लगाइकै।
आजु तौ केसव कैसहूँ लेरुवै लागन देति न देखहु आइकै।
बेगि चलौ उठि आई लिवावन दौरि अकेलियै हौं अकुलाइकै।
भूलिहू गोकुल गाँव में गोबिंद कीजै गरूर न गाइ चराइकै।२६।

शब्दार्थ—लाड़िली = प्यारी। लीली = नीली, श्यामवर्णा की। कलोरी =
बिना बरदाई या ब्याई जवान गाय। लुरी = नवप्रसवा, थोड़े दिन की ब्याई हुई।
कहँ = को। लाल = हे कृष्ण। लुके = छिपे। कहँ = कहाँ। अंग लगाइकै = अपने
अंग लगाकर, अपने हाथ की करके। लेरुवै = बछड़े को। लागन देति न = थन
छूने ( पीने ) नहीं देती। अकेलियै॥ अकेले ही। गोविंद = गऊ के स्वामी
गोपालक। गरूर = गुमान, अभिमान।

प्रकाश गर्वाभिसारिका, यथा---( कवित्त )
(२६७) चंदन चढ़ाइ चारु अंबर के उर हारु,
सुमन-सिंगार सोहै आनंद के कंद ज्यों।
वारौ कोरि रतिनाथ बीन में बजावै गाथ,
मृगज मराल साथ धानी जगबंद ज्यों।
चौंकि चौंकि चकई सी सौतिन की दूती चलीं,
सौतैं भईं दीनी अरबिंद द्युतिमंद ज्यों।
तिमिर बियोग भूले लोचन चकोर फूले,
आई ब्रजचंद चलि चंदावलि चंद ज्यों।३०।


२८- अतुराई-आतुरई। दुरति-दुराई जात। के-कौ। चित्र-गति।
चढ़ाएँ०-चढ़ी फिरति। प्रानप्यारे-प्राननाथ। अलबेली-अनबोली। २६-
सवैया-कमल छंदु। कहं-कहु। कहं-कहाँ। अंग-आंग, आँगि। देखहु कैसहूँ।
उठि-चलि। लिवावन-बुलावन। अकेलियें-अकेलियों। ३०--के उर-को उर।
कोरि-क्रोरि। बीन-बीना। मृगज-मृगय। दीनी-दीन। द्युति-गति।

सप्तम प्रभाव १५७
शब्दार्थ--चारु = सुंदर । अंबर = वस्त्र । के उर = के बीच, भीतर
वस्त्रों के नीचे । सुमन = पुष्प । वारौं = न्यौछावर करूँ । कोरि = कोटि,
करोड़ों । बानी जगबंद = संसारपूज्या सरस्वती । दीनी = दुःखी । अरबिंद =
कमल । ब्रजचंद = श्रीकृष्ण । ज्यों = जैसे, तरह ।
भावार्थ--( सखी की उक्ति नायक प्रति ) शरीर में चंदन लगाए,
सुंदर ( श्वेत ) वस्त्र पहने, उन वस्त्रों के नीचे मोतियों के हार गले में डाले,
( श्वेत ) पुष्पों की माला वक्षःस्थल पर धारण किए वह आनंद की जड़ सी
शोभित होती है । ( उसकी सुंदरता पर ) करोड़ों रति न्यौछावर करती हूँ ।
हे नाथ, वह वीणा में आपका गुणगान करती है । उसके साथ मृगछौने तो हैं
ही, हंस भी जा रहे हैं, जिससे जगद्वंद्य शारदा सी जान पड़ती है । जिसे देख
कर (सौतों की) दूतियां चकित होकर चकई की भाँति भाँग चलीं और सौतें
कमलिनी की भाँति मुरझाकर दुःखित हुई अर्थात् कोई उसके सौंदर्य के सामने
ठहर न सकी ( चंद्रमा को देखकर चकई एवम् कमल मंद हो जाते हैं ) ।
अंधकार रूपी वियोग जाता रहा । नेत्र रूपी चकोर प्रफुल्ल हुए । हे ब्रजचंद,
वह चंद्रावली की भाँति चलकर चंद्र ( आप ) के पास आई है ।
अलंकार--उपमा से पुष्ट रूपक ।
सूचना--यहाँ 'दूती चौकि चलीं', 'सौतें दीनी भई' और 'वारौं कोरि
रति' पदों से नायिका के सौंदर्य की पराकाष्ठा सूचित होती है । वह वीणा
बजाकर प्रतिपक्षियों को चुनौती देती है, जिससे उसका गर्व प्रकट होता है ।
अतः गर्वाभिसारिका है ।
प्रच्छन्न कामाभिसारिका, यथा--( कवित्त )
(२६८) डरझत उरग चपत चरननि फन,
देखत बिबिध निसिचर दिसि चारि के ।
गनति न लागत मुसलधार सुनत न,
झिल्लीगन-घोष निरघोष जल-धारि के ।
जानति न भूषन गिरत, पट फाटत न,
कंटक अटक उर उरज उजारि के ।
प्रेतनि की पूछै नारि कौन पै तैं सीख्यो यह,
जोग कैसो सारु अभिसारु अभिसारिके ।३१।
शब्दार्थ--उरग = सर्प । फन = फण, सिर । दिसि ० = चारो दिशाओं
के । घोष = शब्द, ध्वनि । निरघोष = घोर ध्वनि । धारि = धारा । भूषन =
३१--चरननि ०-फन चरननि, चरननि फनि । सुनत न-बरषत । गिरत-
गिरन ।

१५८ रसिकप्रिया
गहना । उरज = स्तन । उजारि के = उजाड़नेवाले, कंटकबिद्ध । सारु =
तात्त्विक साधना ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) पैरों में सर्प उलझ जाते हैं, उनके
फण कुचल जाते हैं। अनेक निशाचर चारो दिशाओं में उसे देख रहे हैं।
मूसलाधार पानी बरस रहा है, पर वह उसे कुछ नहीं गिनती । झींगुरों का
शोर भी वह नहीं सुनती । जलधारा की प्रचंड ध्वनि भी उसे सुनाई नहीं
पड़ती । गहनों के गिरने का भी उसे पता नहीं चलता । काँटों से फँसकर वस्त्र
का फटना और छाती पर के स्तनों का कष्ट पाना भी उसे ज्ञात नहीं होता ।
प्रेतों की स्त्रियाँ उसकी इस एकाग्रता को देखकर पूछती हैं कि ऐ अभिसारिके
तूने योग-साधना के तत्व से पूर्ण यह अभिसार किससे सीखा है ?
प्रकाश कामाभिसारिका, यथा—( सवैया )
(२६६) गोप बड़े बड़े बैठे अथाइन केसव कोटि सभा अवगाहीं ।
खेलत बालकजाल गलीन में बाल बिलोकि बिलोकि बिकाहीं ।
आवति जाति लुगाईं चहूँ दिसि घूंघट में पहिचाननि छाहीं ।
चंद सो आनन काढ़ि कहा चली'सूझत है कछु तोहि कि नाहीं।३२
शब्दार्थ—अथाई = बैठक, गोष्ठी । अवगाहीं = कर चुके हैं, थहा चुके
हैं अर्थात् सभा में प्रवीण हैं। जाल = समूह । बाल = नवयुवती । बिकाहीं =
मुग्ध हो जाती हैं । लुगाई = स्त्रियाँ । छाहीं = छाया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) तू (इस समय) चंद्र-समान
मुख खोले कहाँ जा रही है ? तुझे कुछ दिखाई देता है या नहीं ? बड़े बड़े
( वयोवृद्ध ) गोप बैठकों में बैठे हैं। ऐसे गोप जिन्होंने करोड़ो ( अनेक )
सभाएँ की हैं। गलियों में बालकों का समूह खेल रहा है, जिन्हें देख देखकर
बालाएँ मोहित हो जाती हैं। चारो ओर स्त्रियाँ आ जा रही हैं। ऐसी स्त्रियाँ
जो घूँघट के भीतर की भी छाया पहचान लेती हैं। ( फिर भी तू निर्भय
चली जा रही हैं ! ) ।
(२७०) केसवदास सुतीन बिधि, बरनि स्वकीया नारि ।
परकीया द्वै भाँति पुनि, आठ आठ अनुहारि ।३३।
(२७१) उत्तम मध्यम अधम अरु, तीन तीन बिधि जान ।
प्रकट तीन सै साठ तिय, केसवदास बखान ।३४।
सूचना—स्वकीयादि ३ x पद्मिनी आदि ४ = (१२ + परकीया२ + सामान्य।
१ = १५) x स्वाधीनपतिकादि ८ = १२० x उत्तमादि ३ = सब ३६० !
३२—कोटि--कोरि । ३३—सु-रु ।

सप्तम प्रभाव १५६
अथ उत्तमा-लक्षण- ( दोहा )
(२७२) मान करै अपमान तें, तजै मान तें मान ।
पिय देखें सुख पावई, ताहि उत्तमा जान ।३५।
उत्तमा, यथा--( सवैया )
(२७३) होइ कहा अब के समुझे न तबै समुझे जब हे समुझाए ।
एक ही बंक बिलोकनि माँह अनेक अमोल बिबेक बिकाए ।
जानिपनो न जनावहु जी जनमावधि लौं उहि जानि हौ पाए ।
बातैं बनाइ बनाइ कहा कहौ लेहु मनाइ मनाइ ज्यों आए ।३६।
शब्दार्थ—अब के समुझे = इस समय समझने से । समुझाए हे = समु-
झाए गए थे । हौं = मैं । बंक बिलोकनि = टेढ़ी चितवन । माँह = में ।
अमोल = अमूल्य । बिबेक = ज्ञान । जानिपनो = ज्ञानीपना, चतुराई । जनमा-
वधि लौं = जन्म भर में, सारी जिंदगी लगाकर ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) जब मैंने आपको समझाया
तब तो आपने समझा नहीं, अब समझने से भी क्या लाभ ? ( अन्य नायिका
की ) एक ही टेढ़ी चितवन में आपके अनेक अमूल्य ज्ञान बिक गए । आपने
यह नहीं समझा कि वह अप्रसन्न हो जाएगी । आपका ज्ञानीपना समझ गई ।
उसे दिखाने की कोशिश मत कीजिए । सारी जिंदगी खपाकर तो उसे किसी
प्रकार आपने समझा है । उसके स्वभाव को पहचाना है । बातें बना बनाकर
कहने से क्या होगा ? जैसे उसे पहले मनाते रहे हैं उसी प्रकार फिर क्यों नहीं
मना लेते ?
अथ मध्यमा-लक्षण-( दोहा )
(२७४) मान करै लघु दोष तें, छोड़ै बहुत प्रनाम ।
केसवदास बखानियै ताहि मध्यमा बाम ।३७।
शब्दार्थ—बहुत प्रनाम = बहुत प्रणाम करने पर, पैरों पर गिरने से ।
मध्यमा, यथा - ( सवैया )
(२७५) भूलेहूँ सूधे नहीं चितयो इहिं कान्ह कियो लचि लालच केतौ ।
हाहा कै हारि रहे मनमोहन पाइ परे त्यों परेई रहे तौ ।
हौं तो यहै तब ही की बिचारति होतौ गुमान क्यों याहि धौं एतौ ।
लाँबी लटैं अरु पातरी देह जु नेक बड़ी बिधि आँखि न देतौ ।३८।
शब्दार्थ-लचि = नम्रतापूर्वक । हाहा कै = दीनता दिखाकर ।
३५-पिय-प्यौ । ३६-होइ-होहि । हे-हौं । जानिपनो-जानि परौ,
जान परचो । बातें-बात । ३७-छोड़ै-छोड़ो । छोड़ै ०-तजै मान तें मान ।
बखानियै-बखानिहु । ३८-मनमोहन-पुनि केसव । पाइ ०-प्यारी के पाइ । त्यों-
तो । बिचारति-बिलोकति । याहि धौं-छाहि सो । धौं-तो । एतो-केतो ।

१६० रसिकप्रिया
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, इस नायिका ने भूलकर
भी सीधी चितवन से श्रीकृष्ण की ओर नहीं देखा, यद्यपि वे बेचारे नम्रतापूर्वक
न जाने कितनी लालसाएँ करते रहे । वे बिनती करके भी थक गए, पैरों पड़े
तो पैरों पर पड़े ही रह गए । मैं तो तभी से यही विचार रही हूँ कि इसे
इतना घमंड आखिर क्यों हुआ । यदि कहीं ब्रह्मा इसे लंबी लंबी लटें, पतली
देह और बड़ी बड़ी आँखें न देता ( इन्हीं पर तो यह गुमान कर रही है )
तो इतना गुमान न करती ।
अथ अधमा-लक्षण—( दोहा )
(२७६) रूठै बारहिं बार जो, तूटै बेहीं काज ।
ताही सों अधमा सबै, कहि बरनत कबिराज ।३६।
अधमा, यथा—( सवैया )
(२७७) काटौं कपट्टु जु कान्ह सों कीजै री बाँटौं वे बोल कुबोल कसाई ।
फारौं जु घूँघट ओट अटै सोई डीठि फोरौ अध कों जु धँसाई ।
केसव ऐसी सखीन कों मारौं सिखै कै करैं हित की जु हँसाई ।
बारहि बार को रूसबो बारौं बहाऊँ सु बुद्धि बियोग-बसाई ।४०।
बचन—सखी की उक्ति नायिका से ।
शब्दार्थ—काटौं = काट दूँ । बाँटौं = पीस डालूँ । बाँटों वे बोल० =
उन कसाई कुबोलों की पीस डालू ँ ( बुरी बात कहना तू छोड़ दे ) । फारौं =
फाड़ डालूँ । ओट अटै = बाधा डाले ( चेहरा न देखने दे ) । फोरौं = फोड़
डालूँ । अध को० = जो दृष्टि नीचे ही देखती रहे ( श्रीकृष्ण की दृष्टि से
मिलकर प्रेमालाप न करे ) । हित = प्रेम । हित की० = प्रेम की हँसी कराए
( निर्द्वंद्व प्रेम करने में बाधा उपस्थित करे ) । बारौं = जला दूँ । बहाऊँ =
बहा दूँ, प्रवाहित कर दूँ । बियोग-बसाई = जो वियोग में बसती हो, जो
वियोग करानेवाली हो ।
( दोहा )
(२७८) इहि बिधि नायक-नायिका बरनहुँ सहित बिबेक ।
जाति काल बय भाव तें, केसव जानि अनेक ।४१।
अथ अगम्या नायिका—( दोहा )
(२७६) तजि तरुनी संबंध की, जानि मित्र द्विजराज ।
राखि लेइ दुख भूख तें, ताकी तिय तें भाज ।४२।
३६—बेहीं-बैठहि, बिनही । सों-कों । सबैं-बरन । कहि०-कहँ महा ।
४० - फोरौं-फुरौं । हित की-हित ही । रूसबो-रूसनो । सु-जु । ४१—
-रनहँ - बर्नों । जाति-देस । ४२-- जानि-जती ।

११ अष्टम प्रभाव १६१
शब्दार्थ—संबंध की = संबंध में पड़नेवाली ( भगिनी आदि ) । मित्र =
मित्र की पत्नी । द्विजराज = ब्राह्मण की पत्नी । राखि० = दुख पड़ने पर
जिसने रक्षा की हो उसकी पत्नी और जिसका या जिसने पालन-पोषण किया
हो उसकी पत्नी । भाज = भागो, बचना चाहिए ( प्रेम नहीं करना चाहिए) ।
(२८०) अधिक बरन अरु अंग घटि, अंत्यज जन की नारि ।
तजि बिधवा अरु पूजिता रमियहु रसिक बिचार ।४३।
शब्दार्थ—अधिक बरन = अपने से उच्च वर्ण की । अंग घटि = अपनी
जाति से नीची जाति की । अंत्यज = चांडाल । जन = दास ।
(२८१) यह संजोग सिंगार की केसव बरनी रीति ।
बिप्रलंभ सिंगार की रीति कहौं करि प्रीति ।४४।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायामष्ट-
नायिकासंभोगशृंगारवर्णनं नाम सप्तमः प्रभावः ॥७॥
अष्टम प्रभाव
अथ विप्रलंभशृंगार-लक्षण—( दोहा )
(२८२) बिछुरत प्रीतम प्रीतमा होत जु रस तिहिं ठौर ।
बिप्रलंभ सिंगार कहि बरनत कबि-सिरमौर ।१।
शब्दार्थ—प्रीतम = प्रियतम, नायक । प्रीतमा = प्रियतमा, नायिका ।
अथ विप्रलंभशृंगार भेद-वर्णन--( दोहा )
(२८३) बिप्रलंभ सिंगार को चारि प्रकार प्रकास ।
प्रथम पूर्ब-अनुराग पुनि, करुना, मान, प्रवास ।२।
तात्पर्य--विप्रलंभ के भेद-पूर्वानुराग, मान, प्रवास और करुण विरह ।
अथ पूर्वानुराग-लक्षण--( दोहा )
(२८४) देखतहीं दुति दंपतीहि, उपजि परत अनुराग ।
बिन देखे दुख देखियै, सो पूरब अनुराग ।३।
शब्दार्थ—दुति = कांति, सौंदर्य । दुख देखना = दुख पाना ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग, यथा--( कबित्त )
(२८५) फूल न दिखाव सूल फूलत है हरि बिनु,
दूरि करि माल बाल ब्याल सी लगति है ।
४३-अंत्यज-अक्षत ।
१--प्रीतमा-प्रीतमहि । सिंगार०-तासों कहैं । बरनत०-केसव कबि,
कहत रसिक । २-वर्णन-कथनम् । ३--देखियै-देखई ।

१६१ रसिकप्रिया
चँवर चलाव जिन बीजन हलाव मति,
केसव सुगंध बाय बाय-सी लगति है।
चंदन चढ़ाव जिन ताप सी चढ़ति तन,
कुंकुम न लाव अंग आग सी लगति है।
बार बार बरजत बाबरी है वारौं आनि,
बीरी न खवाव बीर बिष सी लगति है ।४।
शब्दार्थ- सूल फूलत = काँटे की तरह कसकते हैं, पीड़ा बढ़ती है। दूरि
करि = हटा दे । बाल = बाला, स्त्री । ब्याल = सर्प । बालब्याल = सर्पिणी,
नागिन । चँवर = मुछल । जिन = मत, नहीं । बीजन = (सं० व्यजन)
पंखा । मति = मत, नहीं । सुगंध बाय = सुगंधित वायु, सुगंधित पदार्थों के
संस्पर्श से सुगंधित होकर आनेवाली वायु । बाय = बाई (व्याधि) ।
ताप = ज्वर । 'ताप' शब्द का स्त्रीलिंग में व्यवहार ज्वर अर्थ में होता है ।
कुंकुम = केसर । न लाउ = मत लगा । अंग = शरीर में । बाबरी = पगली,
मूर्ख । वारों = बलिहार होती हूँ । आनि = आकर । बीरी = पान की
गिलौरी । बीर = हे सखी ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश पूर्वानुराग, यथा-(सवैया)
(२८६) केसव कसहूँ ईठनि डीठि ह्वै डीठ परे रति-ईठ कन्हाई।
ता दिन तें मन मेरे को आनि भई सु भई कहि क्योंहूँ न जाई ।
होइगी हाँसी जौ आवै कहूँ कहि, जानि हितू हित बूझन आई।
कैसे मिलौं री, मिले बिनु क्यों रहौं, नैननि हेत, हियें डर माई ।५।
शब्दार्थ - कैसहूँ = किसी प्रकार से । ईठनि = यत्नों से डीठि । ह्वै डीठ
परे = दृष्टि द्वारा देखे गए, ध्यान देकर उनका रूप देखा । रति-ईठ = प्रेम के
लिए इष्ट, प्रिय । कन्हाई = कृष्ण । आनि० = (मेरे मन पर) जो आ पड़ी
वह किसी प्रकार कही नहीं जा सकती । होइगी० = यदि कहीं कोई बात मुँह
से निकल गई तो मेरा उपहास होगा। हितू = हितैषिणी । हित = पथ्य,
अनुकूल कार्य अर्थात् उपाय । बूझन = पूछने के लिए । हेत = प्रेम । हियें =
हृदय में । माई = हे सखी ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग, यथा-( सवैया)
(२८७) एक समै बृषभानसुता सजनी-गन में जननी-सँग बैसी ।
जात उन्हें चितयो जिहिं रीति सु प्रीति हियें कहि जाइ न तैसी ।
४-फूलत-सूलति । मान बाल०-माला बाला ब्याल, मार ब्याल बाल ।
मति-लागै । ताप०--ताप सों तचति । ५-डीठि ह्वै-ईठि ते । परे--परेख ।
कन्हाई-कहाई । कहूँ-कछु !

अष्टम प्रभाव १६३
ता दिन तें जग की जुवतीनि की लागत केसव बात अनैसी ।
चाहि फिरचो चित चक्र चहूँ न कहूँ द्युति देखियै बा मुख कैसी ।६।
शब्दार्थ—बृषभानसुता = राधिका । सजनी = सखी । जननी = माता ।
बैसी = बैठी थी । चितयो = ( जाते हुए श्रीकृष्ण को राधिका ने ) देखा ।
रीति = भाँति । अनैसी = बुरी, भद्दी । चाहि फिरयो = देखकर चित्त लौट
आया । चक्र = दिशा, ओर । चहूँ = चारो ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश पूर्वानुराग, यथा = ( सवैया )
(२८८) भाँति भली बृषभानलली जब तें अँखियाँ अँखियानि सों जोरी ।
भौंह चढ़ाइ कछू डरपाइ बुलाइ लई हँसि कै बस भोरी ।
केसव काहू त्यौ ता दिन तें रुचि कै न बिलोकति केतौ निहोरी ।
लीलत है सब ही के सिंगार अँगारनि ज्यों बिन चंद चकोरी ।७।
शब्दार्थ—भाँति भली = भली भाँति, अच्छे प्रकार । लली = पुत्री,
लाड़िली । डरपाइ = डराकर, धमकाकर । बस कै = वश में करके । भोरी =
इन भोली भाली आँखों को । काहूँ त्यौ = किसी की ओर । रुचि कै = चाव से ।
केतौ = ( न जाने ) कितना अधिक । निहोरी = ( मैंने इन्हें ) मनाया । लीलत
है = खा जाती है । सब ही के = सखा-सखी, मित्रों के द्वारा किए जाने-
वाले सजावट के प्रयत्न । अथवा ही = हृदय । सिंगार = ( श्रृंगार ) सजावट,
प्रफुल्लता, उमंग ।
भावार्थ—(नायक की उक्ति सखी से) जब से वृषभानु की पुत्री (राधिका)
ने मेरी इन आँखों से अपनी आँखें भली भाँति मिलाई हैं और इन भोलीभाली
बेचारियों को भौंहें चढ़ाकर, कुछ डरा धमकाकर, हँसकर और वश में करके
अपने पास बुलाया तभी ( उस दिन ) से ये किसी की ओर रुचिपूर्वक देखती
ही नहीं । मैंने न जाने कितना मनाया ( पर व्यर्थ ) । जैसे बिना चंद्रमा के
चकोरी अंगारे लीलने लगती है वैसे ही ( राधिका के मुखचंद्र के बिना ) ये
भी मेरे हृदय की सारी उमंगें खाए जा रही हैं ( मेरे हृदय में प्रफुल्लता रह
ही नहीं गई है । )
अथ दशदशा-वर्णन— ( दोहा )
(२८६) अबिलोकनि आलाप तें मिलिबे कौं अकुलाहिं ।
होत दसा दस बिनु मिले केसव क्यों कहिं जाहिं ।८।
दशदशा-नामकथन—( दोहा )
(२६०) अभिलाष सु चिंता गुनकथन स्मृति उद्वेग प्रलाप ।
उन्माद व्याधि जड़ता भए होत मरन पुनि आप ।६।
६—संग-ढिग । जुवतीनि-बतियानि । की लागत-लगावत । बात-भाँति ।
चाहि-चाहैं । ७-काहूँ त्यौँ-क्यों हूँ सु । बिलोकति-निहारति ।

१६४ रसिकप्रिया
सूचना—इस दोहे के प्रथम और तृतीय चरणों में १३-१३ के बदले
१५-१५ मात्राएँ हैं।
अथ अभिलाष-लक्षण—(दोहा)
(२६१) नैन बैन मन मिलि रहे, चाहै मिलन सरीर।
कहि केसव अभिलाष यह बरनत हैं मतिधीर।१०।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न अभिलाप, यथा—( सवैया !
(२६२) सुधि बुद्धि घटी दुति देह मिटी दिनहीं दिन चाहिये बाढ़ति सी।
कछु केसव आपने पेट की पीर दुरावति है मुख काढ़ति सी।
बिसरयो सुख सखी भूख निसि नींद परी चितचाहन आढ़ति सी।
गिरि गो कछू गाँठि तें छूटि छबीली सुकाहें तें डोरति डाढ़तिसी।११।
शब्दार्थ—सुधि बुद्धि = सुधबुध, होश-हवास। घटी = कम हो गई।
दुति = द्युति, कांति। मिटी = दूर हो गई। दिनहीं दिन = प्रतिदिन। चाहिये०
= देह की कांति के मिटने का कोई कारण नहीं, प्रत्युत उसे और प्रतिदिन
बढ़ना ही चाहिए। पेट की० = हृदय की बात तू छिपा रही है, मुख से कहने
में संकोच सा कर रही है। बिसरयो = तुझे सुख भूल गया है। भूख नहीं रह
गई है और रात में तुझे नींद भी नहीं आती। परी चितचाहन० = चित्त की
लालसाओं को आश्रय की खोज पड़ी हुई है, वे टिकाव का स्थान चाहती हैं।
गिरि गो० = क्या तेरी गाँठ से खुलकर कुछ गिर गया है ? (तेरी कोई वस्तु
तो नहीं खो गई है?) काहे = क्यों। तैं = तू। डाढ़ति सी० = आग से जलती
हुई सी। तेरी चाल ऐसी जान पड़ती है मानो तेरे शरीर में आग सी लग गई
हो और उससे व्यग्र होकर तू छटपटाती हुई इधर उधर फिर रही हो।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश अभिलाष, यथा—(सवैया)
(२६३) जौ कहूँ देखें लगै दिखसाध दिखावतहीं दिनहीं दुख पैहौं।
या ही में केसव देखियै वा तन देखिहौं देखि सखी अधिकैहौं।
यों उनकी दुरि देखिहौं देह ज्यों अपनी देह न देखन दैहौं।
देखिबे कौं बहरावति मोहिं सु हौं ब. कहा कछु देखि ही लैहौं।१२।
शब्दार्थ—जौ कहूँ = यदि कहीं। देखें लगे दिखसाध = देखने पर देखने
का अभिलाष हो जाए तो। दिनहीं = दिन प्रतिदिन। या = इस। ही =
हृदय। बहरावति = फुसलाती है।
भावार्थ—(नायिका-वचन सखी प्रति) हे सखी, तू मुझे उनके दर्शन
कराने को कहती है, यदि कहीं देखने पर दर्शनाभिलाष जग पड़ा तो तेरे दिखाने
१०—मति-कवि। ११—घटी-पटी। पीर-बात। है--पै। चाहन--चाहत,
चाहति। १२-कहूँ--कहौं, कहौ। वा तन--वो तन, बोल न, बोलु न।
अधिकैहौं-अब कैहौं। दुरि--दुति। ज्यों--जो। दैहौं-सैहौं।

अष्टम प्रभाव १६५
का परिणाम यह होगा कि मैं दिन प्रतिदिन दुःख ही पाऊँगी । मैं तो अपने इ
हृदय में ही उनके शरीर को देख लेती हूँ। यदि उन्हें देखूँगी तो अधिकाधिक
देखने लगूँगी । इस प्रकार मैं उनके शरीर को छिपकर ही देखूँगी (उनके
रूप का ध्यान यहीं एकांत में कर लूँगी ) । अपनी देह तक मैं उन्हें न देखने
दूँगी । तू जो मुझे देखने के लिए फुसला रही है, मानो तेरे फुसलाने से मैं
अब कुछ उन्हें देख ही लूँगी (बड़ी दिखानेवाली आई है, जा तेरे दिखाने से
तो मैं देखने से रही ! ) ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न अभिलाष, यथा—( सवैया )
(२६४) पाइ परौं बलि जाउँ मनोहर आपुन सी न करौ अब ताहू ।
देखें अघात नहीं दिन के फिरि बारक लौं अनदेखें ही जाहू ।
मो सों कही सु कही अब केसव कैसहूँ कान्ह पत्याव न काहू ।
दाढ़हूगे जु कहूँक इति रुचि तातो है नेक सिराइ धौं खाहू । १३।
शब्दार्थ—मनोहर = मन को हरनेवाले (श्रीकृष्ण) । आपुन सी = अपने
समान बदनाम । ताहू = उसे (नायिका को) भी । अघात नहीं = तृप्त नहीं
होते । दिन के = दिन भर के समय में । बारक लौं = कई दिनों तक ।
पत्याव न काहू = किसी का ऐसा विश्वास मत करना । डाढ़हुगे = जलोगे ।
कहूँक = कहीं । रुचि = लालसा । तातो = गरम । नेक = जरा । सिराइ धौं
खाहु = कुछ ठंडा करके खाओ । धौं = तो ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे मनमोहन, आपने मुझसे
जो कहा सो कहा अब और किसी का विश्वास करके ऐसा मत कहिएगा । मैं
आपके पैरों पड़ती हूँ और बलिहारी जाती हूँ। अब उसे (नायिका को) भी
अपना सा मत बना डालिए । जब उसे दिनदिन भर देखकर आपकी तृप्ति नहीं
होती तो कहीं फिर कई दिनों तक बिना देखे ही न लौट जाना पड़े । उतावली
में पड़कर गरम ही गरम पीने के फेर में कहीं अपना कोई अंग न जला लें ।
गरम (दूध) को जरा ठंडा हो जाने दीजिए तब पीजिए ! (अभी प्रेम का
आरंभ है, इसी में इतनी उतावली ठीक नहीं) ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश अभिलाष, यथा—( सवैया )
(२६५) हैं कोइ माई हितू इनको यह जोइ कहै किहि बाइ बहे हैं ।
न्यायहीं केसव गोकुल की कुलटा कुलनारिन नाँउ लहे हैं ।
देखि री देखि लगाइ टकी इन सोनो सो घालिकै चाहि रहे हैं ।
'को है री को' जैसे जानत नाहिन काल्हि ही वाके संदेस कहे हैं।१४।
१३—आपुन०--आंपु समान । अब--पुनि । दिन--तिन । के--कौ । ही--न ।
कहूँक०--कहूँ को इती रसु, कहूँ बहुतो रुचि । १४—कोइ--कोउ । न्यायहीं--
न्यारही । चाहि-डाहि, डंरि । नाहिन--नाहिं ब ।

१६६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—माई = माता, सखी (संबोधन)। इनको = श्रीकृष्ण का।
हितू = कल्याण चाहनेवाला, हितूआ । कहे = अर्थात् पूछे । किहि बाइ बहे
हैं = किस वाह (प्रवाह) में बह रहे हैं, किस ढर्रे पर जा रहे हैं । न्यायहीं =
ठीक ही है । कुलनारि = कुलवती स्त्रियाँ । कुलटा० = कुलटाएँ जो कुलवती
स्त्रियों का नाम धरने लगी हैं वह ठीक है, क्योंकि जब इनकी यह करनी है
तो उन बेचारियों का नाम रखा ही जायगा, उनकी बदनामी कुलटाएँ करेंगी
ही । टकी = टकटकी (लगाकर) । इत = इधर की ओर । सोनो सो घालिकै
चाहि रहे हैं = 'सोना फेंककर देखना' ध्यान देकर देखने या घूरने के अर्थ में
आता है । देख कैसी टकटकी बाँधकर घूर रहे हैं । को है० = पूछते हैं कि तू
कौन है मानो जानते ही नहीं । अभी कल इन्हीं से मैंने उसके (नायिका के )
संदेश कहे हैं ।
सूचना—छपी प्रतियों में निम्नलिखित सवैया भी मिलता है जिसे 'सरदार'
ने केशव का नहीं माना है—
केसव नैननि लागिहै ज्यों वह मूरु ह्रै प्रेम अदृष्ट बढ़ावै ।
क्यों वह कामकला मिलै मोहि सु तौ मन मूढ़ उपाउ न पावै ।
कीजै कृपा बुधि दीजै बुधीसजू राधिका के उर में यह आवै ।
लागति ज्यों कबहुँ कबहुँ मुख चंपक ज्यों मुख सों मुख लावै ।
अथ चिंता-लक्षण—(दोहा)
(२५६) कैंसैं कै मिलियै, मिलें हरि कैसे बस होइ ।
यह चिंता चित चेत कै, बरनत हैं सब कोइ ।१५।
शब्दार्थ—मिलियै = मिलूँ । मिलें = मिलने पर । धौं = न जाने । चेत
कै = विचारकर ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न चिंता, यथा—(दोहा)
(२५७) आपुनहीं तन, आपुनो होत न देखें जाहि ।
आपुनहीं तें आपनो क्यों मन, करिहै ताहि ।१६।
शब्दार्थ—आपुनहीं = अपना ही । तन = शरीर । आपनो = अपना ।
जाहि = जिसे । आपनहीं तें = स्वयम् अपनी ओर से । करिहै = करेगा ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति मन के प्रति) हे मन, जिस नायक को
देखकर अपना ही शरीर अपने वश में नहीं रह जाता वे स्वयम् तेरे वश में हो
जाएँगे ऐसा कैसे संभव है ।
१५—कैसें० कैसे मिलिए । कैंसैं-कैसें धौं । बरनत०-रहै निरंतर सोइ ।
१६—आपुनहीं०-अपनोऊ तन, आपुनहों तू, अपुनउ तनु तू ।

अष्टम प्रभाव १६७
श्रीराधिकाजू की प्रकाश चिंता, यथा—(कवित्त)
(२९८) प्रेम भय भूप रूप सचिव सँकोच सोच,
बिरह बिनोद पील पेलियत पचिकै ।
तरल तुरंग अवलोकनि अनंत गति,
रथ मनोरथ रहैं प्यादे गुन गचिकै ।
दुहूँ ओर परी जोर घोर घनी केसौदास,
होइ जीति कौन की को हारै जिय लचिकै ।
देखत तुम्हें गुपाल तिहि काल उहि बाल,
उर सतरंज की सी बाजी राखी रुचिकै ।१७।
शब्दार्थ—भूप=राजा, बादशाह । रूप = भाँति । सचिव=मंत्री, वजीर ।
पील=हाथी, फील । पेलियत = जबर्दस्ती चलाया जाता है। पचिकै=परेशान
होकर । तरल = चंचल । तुरंग = घोड़ा । अवलोकनि = चितवन । अनंत
गति = अनेक प्रकार की चालें चलनेवाला; अनेक प्रकार के कटाक्षपात करने-
वाली । गचिकै = भली भाँति किलेबंदी करके । लचिकै = दबकर । बाल =
बाला, नायिका ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक से ) हे गोपाल, तुम्हें देखकर उसी
समय से उस नायिका ने शतरंज की सी बाजी बिछा रखी है। प्रेम और भय
राजा (बादशाह) हैं, संकोच और सोच फरजी (वजीर) हैं। विरह और
विनोद हाथी हैं, जो परेशान होकर चलाए जाते हैं। चितवन तथा अनेक
गति ही चंचल घोड़े हैं, मनोरथ ही रथ हैं, गुण ही प्यादे हैं जो पक्की मोरचे-
बंदी किए हुए हैं। दोनों ओर से जोरशोर की बाजी (लड़ाई) हो रही है।
देखो किसकी विजय होती है और कौन दबकर (मात होकर) हारता है।
सूचना—सरदार की टीका में उपमेय और उपमान पक्ष की संख्याओं
की गिनती मिलाने के लिए कई प्रकार के अर्थ पेश किए गए हैं। (१) रूप
को वजीर माना गया है, दो आकृति होने से दोनों वजीरों से उसकी संगति
बैठ जाती है। संकोच, सोच, विरह, विनोद चार हाथ हो गए। इन चारो
अवस्थाओं की चितवनें घोड़े हो गईं, इन्हीं चारो की दशा के मनोरथ
(अभिलाष) रथ (ऊँट) हो गए। बादशाह से घोड़े तक सोलह हुए। इन
सोलहों के गुण प्यादे हो गए । (२) विरह-विनोद या विप्रलंभ चार प्रकार
का होता है—पूर्वानुराग, मान, प्रवास और करुण । ये चारो हाथी हुए।
अवलोकनि अर्थात् दर्शन चार प्रकार के होते हैं—श्रवण, चित्र, स्वप्न और
प्रत्यक्ष । ये चार घोड़े हैं। मनोरथ या नीति चार प्रकार की—साम, दान,
१७—पील-फील । अवलोकनि-अबिलोकनि । प्यादे-पेदा, पै वा । हारै-
रहै । तिहि-तेही ।

१६८ रसिकप्रिया
दंड, भेद । साम = प्रियमिलन, दान=आनंददान, भेद = सखी को मिला लेना,
दंड = कुलकानि का नाश ये चार रथ हैं। गुण या श्रृंगार सोलह होते हैं—
उबटन, स्नान, वस्त्रधारण, केश संवारना, कज्जल, सिंदूर, महावर, तिलक,
तिल (गोदनाबिंदु), मेंहदी, अरगजा-लेप, आभूषण, पुष्पधारण, तांबूल और
मिस्सी । (३) प्रच्छन्न और प्रकाश भेद से विरह एवम् विनोद के दो दो रूप
होंगे । अतः हाथी चार हुए। इसी प्रकार चितवन संकोच और सोच के प्रकाश
प्रच्छन्न भेद से चार प्रकार की हुई। अतः घोड़े चार हुए। विरह एवम् विनोद
के मनोरथ के दो रथ भी इसी प्रकार चार हुए। इन सबके गुण सोलह हुए ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चिंता, यथा (कवित्त)
(२६६) केसौदास सकल सुबास को निवास तन,
कहिं कब भुकुटिबिलास त्रास छोलिहै ।
कैसो है सुदिन बड़भागी अनुरागी जिहिं,
मेरो दृग वाके संग लागि लागि डोलिहै ।
ऐसी हैहै ईस पुनि आपने कटाक्ष मृग-
मद घनसार सम मेरे उर श्रोलिहै ।
दीप के समीप पुनि दीपति बिलोकि वह,
चित्र की सी पूतरी सु क्योंहूँ हँसि बोलिहै ।१८।
शब्दार्थ—सुबास = सुगंध । निवास = वासस्थान । तन = शरीर ।
छोलिहै = छील डालेगी, दूर कर देगी । भृकुटि० = अपनी भौंहों की भंगिमा से
त्रास दूर करेगी । मृगमद = कस्तूरी । घनसार = कपूर । ओलिहै = डालेगी ।
भावार्थ—(नायक की उक्ति अपने मन से) (हे मन) जिसका शरीर
ही समस्त सुगंधों का वासस्थान है कह तो वह कब अपने भृकुटि-विलास से
मेरा त्रास दूर करेगी ? वह भाग्यशाली प्रेम से भरा सुदिन कब होगा जब मेरे
नेत्र उसके अनुगामी हो होकर चलेंगे। हे ईश्वर, क्या ऐसा होगा कि वह
कस्तूरी एवम् कपूर के समान अपने कटाक्ष मेरे हृदय में डालेगी। क्या ऐसा दिन
कभी आएगा जब किसी दीपक के पास रात में खड़ी उस चित्र की पुतली सी
नायिका की दीप्ति दिखाई पड़ेगी और किसी प्रकार वह हँसकर मुझसे बोलेगी ?
श्रीकृष्णजू की प्रकाश चिंता, यथा—( सवैया )
(३००) राधिका को जननी कौं जनी कोऊ क्योंहूँ स्वयंबर बात जनावै ।
देवकुमार से गोपकुमारनि मान दै दै बृषभान बुलावै ।
केसव कैसहु बाल भली वह माल सु मेरे हियें पहिरावै ।
तोहि सखी समदै सँग वाके सु क्यों यह बात सबै बनि आवै । १६।
१८—तन-मनु । जिहि-जब । मेरो-अंग, मेरी बीर । संग-संग संग ।
पुनि-निसि । १६—कौं-सों । जनावै-चलावै ।

अष्टम प्रभाव १६५
शब्दार्थ—( श्रीकृष्ण का वचन सखी से ) जनी = दासी । राधिका० =
राधिका की माता को कोई इस बात के लिए प्रेरित करे कि वह राधिका का
स्वयंवर रचे । देवकुमार = देवपुत्र, देवता । देवकुमार० = देवताओं के समान
अच्छे अच्छे कुलवाले गोपों को उस स्वयंवर में वरण के लिए स्वयम् वृषभानु
( राधिका के पिता ) आमंत्रित करें ( यह आमंत्रण मुझे भी मिले और मैं भी
जाऊँ ) । बाल = बाला, नायिका, राधिका । समदै = भेंट करे । कैसहु० =
उस स्वयंवर के समारोह में वह मेरे गले में जयमाल डाले । तोहि०=हे सखी,
फिर विदाई के समय भेंट में तुझे भी उसके साथ अर्पित करें । ये सब संयोग
किस प्रकार हों ।
अथ गुणकथन-लक्षण—( दोहा )
(३०१) जहँ गुनगन गुनि देहदुति, बरनत बचन बिसेषि ।
ताकहँ जानहु गुनकथन, मनमथ-मथन सु लेखि ।२०।
शब्दार्थ—गुनि = स्मरण करके । देह० = अंगदीप्ति, सौंदर्य । मनमथ-
मथन ० = कामव्यथा का विशेष उल्लेख करके ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुणकथन, यथा—( कबित्त )
(३०२) कीरति सहित नित केसव कुँवर कान्ह,
केवल अकीरति नृपति सोम मानियै ।
छुवत चंपकपात कुँभिलात जात तन,
अति हरषित गात हरिजू को जानियै ।
कोमल सुबासजुत प्यारे के परम पानि,
कंटककलित नील नलिन बखानियै ।
लोचन बिसाल चारु मदनगुपालजू के,
मदन-सरनि दरसन-रस हानियै ।२१।
शब्दार्थ-कान्ह = श्रीकृष्ण । सोम = चंद्रमा । अकीरति = क्षीण होना,
कलंकयुक्त होना, दिन में मलिन रहना आदि । परम = विशाल । पानि =
( सं० पाणि ) हाथ ।
भावार्थ-(नायिका की उक्ति आत्मगत) कुँवर कन्हैया तो सर्वदा कीर्ति-
सहित रहते हैं पर सोम राजा ( चंद्रमा ) केवल अकीर्तिसहित ( अतः दोनो
की समता क्या ? ) । श्रीकृष्ण का शरीर (सदा) प्रफुल्ल रहता है पर चंपक
पुष्प के दल तो स्पर्श मात्र से कुम्हला जाते हैं ( इसलिए चंपक उनके शरीर
के वर्ण की बराबरी नहीं कर सकता ) । प्रियतम ( श्रीकृष्ण ) के विशाल
२०-गुनि-मनि । ताकहँ०-तासों कहिये । मथन ०-मनु से लेखि ।
२१-सुबास-सुबाहु । रस-हित ।

१७० रसिकप्रिया
हाथ कोमल एवम् सुगंधित हैं पर कमल-नाल तो कँटीली होती है ( फिर दोनो
की समता कैसी ? ) । मदनगोपाल के नेत्र विशाल और सुंदर हैं पर कामदेव
के बाणों के तो दर्शन ही दुर्लभ हैं ( इसलिए यह उपमान भी ठीक नहीं )।
अलंकार—व्यतिरेक ।
श्री राधिकाजू को प्रकाश गुणकथन, यथा—( सवैया )
(३०३) खंजन हैं मनोरंजन केसव रंजन नैन किधौं मति जी की।
मीठी सुधा कि सुधाधर की दुति दंतन की किधौं दाड़िम ही की।
चंद भलो मुखचंद किधौं सखि सूरति काम कि कान्ह की नीकी।
कोमल पंकज कै पद-पंकज प्रान पियारे कि मूरति पी की।२२।
शब्दार्थ—मनोरंजन = मन को प्रसन्न करनेवाले । रंजन = रमानेवाले ।
मति = बुद्धि, वृत्ति । जी=अंतःकरण । सुधा = अमृत । सुधाधर की = अधर
की सुधा, अधरामृत । दुति = प्रकाश, शोभा । दाड़िम = अनार । नीकी = भली ।
पंकज = कमल । पी की = प्रिय की ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, खंजन पक्षी विशेष
मन का रंजन करनेवाले हैं अथवा प्रिय के नेत्र अंतःकरण की वृत्ति को विशेष
रमानेवाले हैं। वह अमृत विशेष मधुर है या प्रिय का अधरामृत । अनार के
दाने की शोभा विशेष आकर्षक है या उनके दाँतों की चमक । चंद्र विशेष
अच्छा है अथवा उनका मुखचंद्र । काम की मूर्ति अधिक अच्छी है या श्रीकृष्ण
की सुंदर मूर्ति । कमल विशेष कोमल हैं या उनके पदकमल । प्राण अधिक
प्रिय हैं या प्रिय की मूर्ति अधिक प्रिय है ।
सूचना—सरदार ने ‘पीकी’ का अर्थ ‘पीका’ के आधार पर निकाला है ।
वृक्ष में निकले नए पत्ते को ‘पीका’ कहते हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न गुणकथन, यथा—( सवैया )
(३०४) जौ कहौं केसव सोम सरोज सुधासुर भृंगनि देह दहे हैं।
दाड़िम के फल श्रीफल बिद्रुम हाटक कोटिक कष्ट सहे हैं।
कोक कपोत करी अहि केहरि कोकिल कीर कुचील कहे हैं।
अंग अनूपम वा तिय के उनकी उपमा कहूँ वेई रहे हैं।२३।
शब्दार्थ—सोम = चंद्रमा ( मुख)। सरोज = कमल ( नेत्रों ) सुधासुर=
राहु । दाड़िम = अनार ( दांत ) । श्रीफल = बेल ( कुच ) । विद्रुम = मूँगा
(होंठ) । हाटक = सोना ( शरीर का वर्ण, रंग ) । कोक = चकवा ( स्तन ) ।
कपोत = कबूतर ( ग्रीवा ) । करी = हाथी ( गति ) । अहि = सर्प (बाहें) ।
केहरि = ( सं० केसरी ) सिंह ( कमर ) । कोकिल = कोयल ( वाणी ) ।
२२—रंजन नैन ॰ इंगित् नैन । कि०-कै सुधारस । किधौं—सखी लखि ।
२३—केहरि-केसरि ।

अष्टम प्रभाव १७१
कीर = सुग्गा ( नासिका ) । कुचील = कुरूप, मलिन ।
भावार्थ- (नायक की उक्ति आत्मगत) यदि उसके (नायिका) के मुख की
समता चंद्रमा से दूँ तो उसे राहु जलाता है और यदि उसके नेत्र को कमल
कहूँ तो उसे भौंरे सताया करते हैं। अनार, बेल, मूंगा और सोना भी अपने
उपमेयों की समता नहीं कर सकते, क्योंकि ये भी अनेक ( करोड़ों ) कष्ट
सहते हैं । इसी प्रकार चक्रवाक, कबूतर, हाथी, सर्प, सिंह, कोयल और शुक
भी अपने-अपने उपमेयों की समता नहीं कर सकते, क्योंकि ये कुरूप हैं । उस
नायिका के समस्त अंग अद्वितीय हैं, उनकी समता उन्हीं से हो सकती है।
अलंकार- केशव ने इसे 'कविप्रिया' में दूषणोपमा के उदाहरण में रखा
है । यह एक प्रकार का अनन्वय ही है ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश गुणकथन, यथा- ( सवैया )
(३०५) लोचन बीच चुभी रुचि राधे की केसव क्योंहूँ सु जाति न काढ़ी ।
मानहुँ मेरें गही अनुरागनि कुंकुम-पंक अलंकृत गाढ़ी ।
मेरिये लागि रही तनुता जनु यों दुति नील निचोल की बाढ़ी।
मेरे ही मानो हियें कहँ सूँघति यों अरबिंद दियेँ मुख ठाढ़ी।२४।
शब्दार्थ -चुभी = धँस गई । रुचि = कांति । मेरे० = मेरे प्रेम से गृहीत हैं,
मेरे अनुरागों से युक्त हैं। कुंकुम-पंक = केसर के गाढ़े लेप से युक्त । तनुता =
शरीर का रंग (श्यामता) । नील निचोल = नाला वस्त्र । अरबिंद = कमल ।
भावार्थ- (नायक की उक्ति सखी से ) मेरे नेत्रों में राधिका की कांति
ऐसी गड़ गई है कि किसी प्रकार निकाले नहीं निकलती । केसर के गाढ़े लेप से
युक्त वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो मेरे ही प्रेम को धारण किए हुए हैं। उनके
नीले वस्त्र की शोभा तो ऐसी व्यक्त हो रही है मानो मेरे शरीर की ही श्यामता
उन्हें लग गई है। वे जो मुंह से कमल लगाए हुए खड़ी हैं (उसे सूँघ रही हैं)
वह ऐसा जान पड़ता है मानो मेरे हृदय को ही सूँघ रही हैं ।
अलंकार-उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा ।
अथ स्मृति-लक्षण- ( दोहा )
(३०६) और कछू न सुहाइ जहँ, भूलि जाहि सब काम ।
मन मिलिबे को कामना ताही स्मृति है नाम ।२५।
शब्दार्थ-सुहाइ न = अच्छा न लगे ।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न स्मृति, यथा- ( सवैया )
(३०७) बोल्यो सुहाइ न खेल्यो हँस्यो अरु देख्यो सुहाइ न दुख्व बढ़यो सो ।
नीकियौ बात सुनें समुझें न मनो मन काहू के मोहि मढ़यो सो ।
२४-क्यो हूँ सु-कैसहूँ । अलंकृत-कलंकित । २५-जाहि-जाइ । ताही-
ताको ।